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मिटी धुंध जग चानन होया

Posted On November - 10 - 2019

550वीं जयंती पर विशेष

जनमानस को धार्मिक, भाषायी व जातीय आडंबरों से मुक्त करके सहजता-सरलता व मधुरता से जीवन जीने की प्रेरणा देने वाले गुरु नानक देव का संपूर्ण जीवन मार्गदर्शक है। इस 550वीं जयंती पर उनके प्रति श्रद्धा का सैलाब बताता है कि उनकी शिक्षाएं 21वीं सदी में भी उतनी ही प्रासंगिक हैंं। मानव धर्म की गूढ़ शिक्षाओं को एकेश्वरवाद के रूप में सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाने में वह सफल रहे। गुरु नानक के जन्मदिन को प्रकाश पर्व के रूप में भी मनाया जाता है जो इस बार 12 नवंबर को है। सैकड़ों वर्ष पूर्व दिए उनके पावन उपदेशों का प्रकाश आज भी मानवता को आलोकित करता है ।

रमेश नैयर

भारत सहित विश्व के अनेक देशों में सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती बड़े उत्साह से मनायी जा रही है। कनाडा के इन आयोजनों में सिख समाज के साथ ही सरकार की भी सक्रिय भागीदारी है। कारण है वहां की तीन प्रमुख भाषाओं में पंजाबी का भी शुमार होना और शासन-प्रशासन में सिख मंत्रियों-अधिकारियों की प्रभावी उपस्थिति। गुरु नानक देव का जन्म 1469 में दीपावली के पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को तलवंडी में हुआ था। गुरु नानक देव की जन्मस्थली होने के कारण यह ननकाना साहेब के नाम से जाना जाने लगा। गुरु नानक देव जी के पिता मेहता कालू जी थे।
गुरु नानक देव के दो परम शिष्य थे भाई मरदाना और भाई बाला। गुरु नानक देव जी ने भारत के विभिन्न भागों के साथ ही अफगानिस्तान, फारस और अनेक अरब देशों का व्यापक भ्रमण किया। सभी जगह उनके प्रवचनों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग अनुयायी बनते गए। उन्होंने मूर्ति पूजा और विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना के स्थान पर एक ही निर्गुण ब्रह्म पर आस्था रखने का विश्वास जताया। उनका प्रसिद्ध और व्यापक रूप से प्रचलित ‘शबद’ है- ‘एक ओंकार सतनाम करता पुरखु निरभउ निरवैरु, अकाल मूरत, अजूनी सैभं गुर प्रसाद।। ’
इसका प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि हिंदुओं के साथ ही अन्य धर्मों के लोग भी उनके अनुयायी बनने लगे। अनेक सूफी संत भी उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए। भारत में इस्लाम के विस्तार पर कुछ इतिहासकारों का मानना है कि तलवार के बूते धर्मांतरण से कहीं ज्यादा लोग सूफियों के प्रभाव से मुस्लिम बने। गुरु नानक देव जी का उनसे कभी कोई सीधा टकराव नहीं रहा। उन्होंने उन्हें भी सिख पंथ में समाहित करने का प्रयास किया। संभवतः इसी दृष्टि से उन्होंने लिखा ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे। एक नूर से सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे।।’
इसके साथ ही उन्होंने साहस पूर्वक निर्दोंषों की हत्याओं की निंदा करने में कभी कोई कोताही नहीं बरती। मसलन जब बाबर की सेना ने भारत पर बर्बर हमले के दौरान बड़ी संख्या में कत्लेआम मचाया तो उन्होंने बाबर से कहा ‘ऐती मार पई कुरलाने, तैं की दर्द न आया।’ सिख धर्म में साहस, पराक्रम और बलिदान की जो इतनी लंबी परंपरा रही है, उसका सूत्रपात गुरु नानक देव जी के जीवनकाल में ही हो गया था।

ईश्वर के प्रति गुरू का नज़रिया

गुरु नानक देव का मानना था कि प्रभु को पाने और जीवन को सार्थक करने के लिए घर-बार छोड़ कर जंगलों में भटकने की ज़रूरत नहीं है। उनका कहना था कि समाज की मुख्यधारा से कट कर ईश्वर की तलाश करने वालों का श्रम व्यर्थ जाता है। गुरु नानक देव जी बहुत कठिन समय में प्रकट हुए थे। व्यापक हिंदू समाज दोहरी व्याधियों से जूझ रहा था। पहली बड़ी व्याधि थी समाज में व्याप्त जात-पात और छुआछूत की कुरीति। दूसरी थी सांप्रदायिक टकराव। गुरु नानक देव ने सामाजिक एवं धार्मिक संघर्षों को नियंत्रित करने के लिए दो स्तरों पर काम करने को महत्व दिया। पहला यह कि समाज से जातिवाद और धर्म के आधार पर व्याप्त आडम्बर को समाप्त करना। दूसरा सभी का एक ही निर्गुण ब्रह्म होने के नाम से धार्मिक सामंजस्य स्थापित करना। गुरुवाणी के माध्यम से उन्होंने आत्मनिरीक्षण के साथ ही प्रभु का नाम जपने एवं ध्यान को महत्व दिया। उसके लिए उन्होंने घर परिवार छोड़ने और उपासना के लिए पारिवारिक दायित्वों से कट कर निठल्ले बैठने की प्रकृति को अनुचित माना। उन्होंने साफ तौर पर कहा, ‘ईश्वर हमारे हृदय में ही है… पुष्प मध्य ज्यों बास बसत है, मुकर माहि जस छाई। तैसे ही हरि बसे निरंतर, घट ही खोजो भाई।।
गुरु नानक देव जी ने सहज और सरल भाषा में मानव धर्म की गूढ़ शिक्षाओं को बताया। एकेश्वरवाद उनकी वाणियों में सर्वत्र मिलता है। राम-नाम को उन्होंने महत्व देते हुए कहा ‘राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है।।’ परंतु मूर्ति पूजा का कभी समर्थन नहीं किया। निर्गुण ब्रह्म में उनकी सघन आस्था थी। उन्होंने कहा था ‘गुरुवाणी ब्रह्मज्ञान से उपजी आत्मिक शांति के लिए उपयोगी है। यह लोककल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मधुर व्यवहार और विनम्रता को जीवन में उतारना मन की शांति तथा ब्रह्म की प्राप्ति में समान रूप से उपयोगी हैं। तब किसी प्रकार के कर्मकांड की जरूरत नहीं रह जाती। उनके उपदेशों को संकलित करने के लिए गुरु ग्रंथ साहेब का सृजन उनके जीवनकाल में शुरू हो गया, जिसे पांचवें गुरु अर्जुन देव ने पूर्ण करके गुरुमुखी में लिपिबद्ध किया। इसमें हिंदी, बृजभाषा, लाहिंदी-पंजाबी, खड़ी बोली, संस्कृत और फारसी के शब्द प्रचुरता में हैं। गुरु ग्रंथ साहेब को नानक नामलेवा समाज आदिग्रंथ की मान्यता देता है।
सिख पंथ के अनुयायियों की बड़ी संख्या आरंभ में अविभक्त भारत के पंजाब में थी। इसके साथ ही नानक-नामलेवा सिंध एवं अन्य प्रदेशों में इसका प्रचलन बढ़ता गया। हिंदू तथा सिखों में कभी कोई भेद नहीं रहा। सिख पंथ को मानने वाले पंजाबी अध्यवसायी और परिश्रमी रहे हैं। हिंदू समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियों और वर्जनाओं को फलांग कर उन्होंने भारत के विभिन्न भागों सहित अनेक विदेशी राष्ट्रों में आजीविका तलाशने में कभी कोई गुरेज नहीं किया। पश्चिमी देशों में भी उनकी प्रभावी उपस्थिति है। कनाडा के रक्षामंत्री सहित तीन अन्य विभागों के मंत्री सिख हैं। वहां पंजाबी भाषा को तीसरी राजभाषा की संवैधानिक मान्यता दी गई है। यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीति तथा प्रशासन में भी उनकी उल्लेखनीय भागीदारी है। भारतीय सशस्त्र सेना तथा वायुसेना में व्यापक उपस्थिति रहती आई है। इसे गुरु नानक देव पर व्यापक लोक आस्था का प्रभाव माना जाना चाहिए कि भारत के जन्मजात शत्रु पाकिस्तान का खालिस्तान के नाम से पंजाब में विभाजनकारी आतंकवाद का षड्यंत्र विफल हो गया। 1970 के दशक के अंतिम महीनों में सरहद पार से प्रशिक्षित दहशतगर्दों द्वारा भड़काई गई हिंसा अंततः विफल हो गई। गुरु नानक नामलेवा हिंदुओं और सिखों को बांटा नहीं जा सका। इनके अलावा सिंधी समाज भी गुरु नानक देव जी का भक्त है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में यद्यपि उनका जबरिया धर्म परिवर्तन करने की घटनाएं आए दिन समाचारों में रहती हैं। वे लगातार भारत में विभाजन के समय से बसे सिंधी समाज के पास आने का हरसंभव प्रयास करते रहते हैं। भारत के सिख जब कभी भी पाकिस्तान की धार्मिक यात्रा पर जाते हैं तो आईएसआई उन्हें बरगलाकर खालिस्तान के निर्माण के लिए उकसाती रहती है परंतु विवेकशील सिख और राष्ट्रभक्त सिख सारे षड्यंत्र को समझते हुए उनकी बातों को अनसुना कर देते हैं।

प्रेरक प्रसंग
पहला प्रसंग: गुरु नानक देव जी को अपने परिवार की आजीविका के लिए कई बार दूसरों के यहां काम भी करना पड़ा। अपने बहनोई जैराम जी के माध्यम से वे सुल्तानपुर लोधी के नवाब के शाही भंडार की देखरेख करने लगे। उनके बारे में एक प्रसंग बहुत प्रचलित है। वह इस प्रकार है कि जब वे तराजू से अनाज तोल कर ग्राहक को दे रहे थे तो गिनते-गिनते जब ग्यारा, बारा, तेरा पर पहुंचे तो उन्हें कुछ अतींद्रि अनुभूति हुई। वह तोलते जाते थे और तेरा के बाद तेरा फिर तेरा…और सब तेरा ही तेरा कहते गए। आम धारणा है कि पहली बार ईश्वर का ज्ञान उन्हें उसी समय हुआ और वह मानने लगे जो कुछ है वह परमबह्म्र का है, मेरा क्या है?

दूसरा प्रसंग
इसी प्रकार एक और रोचक प्रसंग है कि अपनी यात्रा के दौरान वह एक धर्मस्थल की तरफ पैर करके लेट गए। उस धर्म के अनुयायियों ने इस पर आपत्ति की तो गुरु नानक ने कहा मेरे पैर उस दिशा में कर दो जहां ईश्वर का कोई निवास स्थल नहीं है। कहते हैं वे जिस तरफ गुरु नानक के पैर उठाकर करते उसी दिशा में वह धर्मस्थल दिखता। आशय यह कि ईश्वर जैसे प्रत्येक जीव में है वैसे ही हर दिशा में भी है। इन सीधी-सरल बातों के कारण सभी धर्मों और पंथों के लोग प्रभावित होने लगे। उनके दो-तीन उद्धरण देना प्रासंगिक होगा।
सुपने ज्यों धन पिछान, काहे पर करत मान। बारु की भीत तैसें, बसुधाकौ राज है।।’ मुरसिद मेरा मरहमी, जिन मरम बताया। दिल अंदर

दीदार है, खोजा तिन पाया।।
पीर पैगम्बर औलिया, सब मरने आया। नाहक जीव न मारिये, पोषनको काया।।

तीसरा प्रसंग
गुरु नानक देव जी के जीवन के दो और प्रसंग हैं। एक यह कि गुरदासपुर में अपनी यात्राओं के दौरान उनकी भेंट नाथपंथी योगी भांगर नाथ के साथ हुई। दोनों में धार्मिक परिसंवाद भी हुआ। जब गुरु नानक देव जी के तर्कों को काट सकने में नाथपंथी योगी विफल हो गये तो वह कुछ तांत्रिक क्रियाओं का सहारा लेने लगे। इस पर मुस्कुराते हुए गुरु नानक देव जी ने कहा कि भाई ईश्वर तक पहुंचने का सीधा सरल रास्ता है प्रेम और सहजता से काम लेना। यही ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र माध्यम है, तंत्र-मंत्र से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

चौथा प्रसंग
एक बार जब गुरु नानक देव जी मरदाना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने पानी में डुबकी लगा दी और दो-तीन दिन तक पानी में ही समाए रहे। आम धारणा है कि उन्हीं दिनों में फिर से उनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ। सभी लोग मानने लगे कि उनका पानी में डूबकर देहांत हो गया है, परंतु वे तीसरे दिन अचानक नदी की सतह पर प्रकट हो गए। वहीं पर उन्होंने बेर का एक बीज धरती में बो दिया जो आज बहुत बड़े पेड़ के रूप में विकसित हो चुका है। कपूरथला के सुल्तानपुर लोधी में बेर के उस पेड़ के पास भव्य गुरुद्वारा बेर साहेब उपस्थित है।


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