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ब्लड प्रेशर में रामबाण है योग

Posted On November - 9 - 2019

दीप्ति

हमारे शरीर की धमनियों में जो रक्त दौड़ता है, उसको दौड़ने की गति हृदय से मिलती है जो दिन-रात पम्पिंग मशीन की तरह कार्य करता है। इसे दिल का धड़कना भी कहते हैं। हृदय के दबाव से रक्त धमनियों में पहुंचता है और सारे शरीर में भ्रमण करते हुए वापस हृदय में लौट आता है। हृदय रक्त को शुद्ध करके वापस धमनियों में भेज देता है। रक्त पर हृदय की पम्पिंग का जो दबाव पड़ता है, इसे रक्तचाप कहते हैं। जब कुछ कारणों से यह दबाव बढ़ता है तो इसे उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) कहते हैं और यदि दबाव कम होता है तो इसे निम्न रक्तचाप (लो बीपी) कहते हैं।
उच्च रक्तचाप आरामतलब वर्ग का रोग है। जैसे बुद्धिजीवी, वकील, लेखक, अधिक धन-धान्य से संपन्न व्यक्ति एवं चिंतनशील वैज्ञानिक आदि। एलोपैथिक औषधियों का अंधाधुंध प्रयोग भी इस रोग का कारण है। गांवों की अपेक्षा यह रोग शहरों में अधिक पाया जाता है।

शीतली प्राणायाम
प्राणायाम (आक्सीजन) के बिना जीवन संभव नहीं है। शीतली प्राणायाम से तन-मन शीतल होता है इसलिए इसे शीतली प्राणायाम कहते हैं।
विधि : पद्मासन या सुखासन की मुद्रा में बैठ जाएं। दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखें। आंखें बंद करके मन-मस्तिष्क को शांत करें। जीभ के दोनों किनारों को ऊपर की ओर मोड़कर गोल नली के समान बना लें और फिर श्वास को अपने मुंह से लें। जब तक आप श्वास रोक सकते हैं यथासंभव रोकें और उसके बाद दोनों नाकों के छिद्र से श्वास बाहर निकाल दें। यह एक चक्र खत्म हुआ, इसी प्रकार इस क्रिया को नए साधकों को कम से कम 10 बार करना चाहिए।
नोट : कफ प्रकृति के व्यक्ति को इस प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। दमा और टांसिल के रोगियों को इस प्राणायाम का अभ्यास कुशल योग शिक्षक के नेतृत्व में करना चाहिए।

अनुलोम-विलोम
योगियों ने इस प्राणायाम का नाम नाड़ी शोधन प्राणायाम या फिर अनुलोम-विलोम प्राणायाम इसलिए रखा है क्योंकि इसके अभ्यास से हमारे शरीर की 72 हज़ार नाड़ियों की शुद्धि होती है।
विधि : अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाईं नासिका से प्रारम्भ करते हैं। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी नासिका को बंद करके बाईं नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर अनामिका व मध्यमा से वाम स्वर को बंद करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-प्रश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व बाहर निकाले व अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द, मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाईं नाक से श्वास पूरा अंदर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाईं नाक को बंद करके बाईं नासिका से श्वास बाहर छोड़ने चाहिए। यह एक प्रकिया पूरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना चाहिए। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करें। फिर पुनः प्राणायाम करें। इस प्रकार तीन मिनट से प्रारम्भ करके इस प्राणायाम को 10 मिनट तक किया जा सकता है।
नोट : इस प्राणायाम को सभी लोग कर सकते हैं। इसे करते समय मुंह से श्वास नहीं लेना चाहिए। किसी भी प्रकार की असुविधा होने पर प्राणायाम का अभ्यास न करें। श्वास की गति धीमी रखें। कमर, पीठ, रीढ़ और गर्दन बिल्कुल सीधी रखें।

सुप्त पवन मुक्तासन
पवन का अर्थ होता है वायु यानी जिस आसन के करने से पवन शरीर से मुक्त होती है। वह कहलाता है सुप्त पवन मुक्तासन।
विधि : पीठ के बल लेट जाएं, पैरों को फैला लें। उसके बाद अपना दाहिना घुटना मोड़कर सिर की तरफ ले आएं। अब घुटने को नाक से स्पर्श कराते हुए अपने सिर को उठा लें। जांघ से पेट को दबाने का प्रयास करें। हाथ-पैर या तो जमीन पर रहें या फिर जमीन से थोड़ा ऊपर उठ जाएं। कुछ देर इस अवस्था में रुकें और फिर धीरे- धीरे जमीन पर आ जाएं। इसी प्रकार से यह क्रिया दूसरे पैर से भी करें। इस अभ्यास को दोनों पैरों से 5-7 बार अवश्य करें।
नोट : स्लिप डिस्क, हाई ब्लड प्रेशर के पुराने मरीज, हृदय रोगी और साइटिका के रोगी योग शिक्षक की देखरेख में इसे करें।

शवासन
शवासन या फिर ‘शिवासन’ अर्थात यह कल्याणकारी आसन है। इस आसन में हमारे शरीर की आकृति शव-नुमा या फिर मरे हुए व्यक्ति जैसी होती है, इसलिए हमारे योगियों ने इसका नाम ‘शवासन’ रखा है।
विधि : पीठ के बल लेट जाएं और दोनों पैरों में जितना हो सके, दूरी बना लें। पैर के पंजे बाहर और एडि़यां अंदर की तरफ हो रखें। दोनों हाथों को सीधा कर लें। अंगुलियों को मोड़ लें और गर्दन सीधी रखें। आंखें बंद करें और पैर के अंगूठे से सिर तक का भाग ढीला छोड़ दें। अब ध्यान अपनी सांस प्रक्रिया पर लगाएं। महसूस करें कि दोनों नासिकाओं से श्वास अंदर-बाहर आ रही है। कुछ देर बाद सीने और नाभि पर ध्यान लगाएं। मन से सारे विचार निकाल दें और आपका ध्यान सिर्फ शरीर पर लगाएं।
नोट : आसन के दौरान अपनी आंखें बंद ही रखें। योगासन करते हुए शरीर को ढीला छोड़ देना जरूरी है।

शिशु आसन
यह आसन करने से बैठने की मुद्रा शिशु के भांति हो जाती है। इसी वजह से योगियों ने इस आसन को शिशिु आसन का नाम दिया है।
विधि : अपनी एडि़यों पर बैठ जाएं। अपने हिप्स को एडि़यों पर रखते हुए आगे की ओर झुकें और माथे को ज़मीन से लगाएं। भुजाओं को शरीर के साथ ज़मीन पर रखें और हथेलियों को आकाश की ओर रखें। यदि ऐसा करने में दिक्कत हो तो एक के ऊपर एक हथेली रखकर अपना माथा उन पर रख सकते हैं। धीरे से छाती को जंघा की ओर दबाएं और कुछ देर रुकें। मेरुदण्ड का ध्यान रखते हुए धीरे-धीरे उठकर अपनी एडि़यों पर बैठ जाएं और विश्राम करें।


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