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बापू की सीख

Posted On November - 17 - 2019

शिल्पा जैन सुराणा

‘विदित, ये क्या किया तुमने फिर से बाथरूम का नल खुला छोड़ दिया?’ मम्मी ने विदित को गुस्से से कहा।
‘वो भूल गया था।’ विदित ने लापरवाही से कहा तो मम्मी को और गुस्सा आ गया।
‘विदित अब तुम बड़े हो गए हो, चीज़ों को बर्बाद करना अच्छी बात नहीं, कभी खाना झूठा छोड़ देते हो, कभी अपना सारा स्टेशनरी का सामान खोकर आ जाते हो, टीवी भी कभी ऑफ नही करते।’ मम्मी बोले जा रही थी।
‘ओहो मम्मी, आप हमेशा गुस्सा करती रहती हो।’ ये कह कर विदित ने गुस्से में बैग उठाया और बस स्टॉप की तरफ चला गया।
विदित इस साल पांचवीं कक्षा में आ गया था। विदित बहुत ही लापरवाह था। उसे लगता था कि उसके मम्मी-पापा बहुत ही कंजूस हैं जो उसे छोटी-छोटी बातों पर डांटते रहते हैं।
आज विदित की क्लास में हिंदी की टीचर महात्मा गांधी के बारे में पढ़ा रही थी।
‘ पता है बच्चो, गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे, वो लोगों को अपरिग्रह की शिक्षा देते थे, अपरिग्रह का मतलब होता है अनावश्यक चीज़ों का संग्रह नहीं करना। इसके साथ गांधी जी कभी भी चीज़ों को बर्बाद नहीं करते थे, वो एक पेंसिल को भी तब तक इस्तेमाल करते थे जब तक वो खत्म न हो जाये। गांधीजी कहते थे कि प्रकृति सबकी है और इसीलिए हमारे लिए ज़रूरी है कि हम उतना ही चीज़ों का इस्तेमाल करें, जितना हमारे लिए जरूरी है।’ टीचर बोल रही थी और सारे बच्चे ध्यान से सुन रहे थे। तभी घंटी बजी और लंच ब्रेक हो गया। विदित भी अपने दोस्त के साथ लंच बॉक्स खोल कर बैठ गया।
‘आज फिर मम्मी ने लौकी का परांठा डाल दिया।’ विदित ने मुंह बनाया और जा कर परांठा कूड़ेदान में डाल दिया। वो कैंटीन गया और चिप्स लेकर खाने लगा।
रात को विदित की मम्मी ने दूध दिया तो उसने चुपके से सबकी नजरें बचाकर उसे वाश बेसिन में फेंक दिया। जल्द ही उसे नींद आ गयी।
सुबह वो उठा तो बिल्कुल भौचक्का रह गया। वो तो अपने घर में सोया था, ये जंगल कहां से आ गया। वो मम्मी -पापा को आवाज़ लगाता रहा मगर ये क्या, कोई नजर ही नहीं आ रहा था।
सूरज सर पर था और धूप कड़क हो गयी थी। विदित के पेट मे चूहे कूदने लगे। वो एक पेड़ के पास गया। पेड़ पर सेब लटके थे, वैसे तो विदित को फ्रूट्स खाना बिल्कुल पसन्द नहीं था पर वो अब कर भी क्या सकता था। उसने बेहद कोशिश की पर एक भी सेब उसके हाथ न आया। प्यास से उसका गला सूखने लगा। तभी सामने उसे एक छोटा सा तालाब नजर आया। वो भाग कर गया और जैसे ही उसने तालाब के पानी में हाथ डाला, पानी पूरा नीचे चला गया।
अब विदित की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसे सामने से एक आदमी आंखों पर चश्मा लगाए, धोती पहने और हाथ मे डंडा लिए उसके पास चलते नजर आए। उसने ध्यान से देखा। ये आदमी तो बिल्कुल वैसे ही थे जैसा टीचर आज महात्मा गांधी के बारे में बता रही थी।
‘क्या हुआ बेटा, पानी नहीं पी पा रहे?’ उस बूढ़े व्यक्ति ने पूछा तो विदित की आंखों में आंसू आ गए।
‘हां, मुझे बेहद प्यास लगी है, पर मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा।’ विदित भीगी आंखों के साथ बोला।
‘विदित बेटा, प्रकृति हमारी अनमोल धरोहर है। इसका एक-एक कण कीमती है, चाहे वो पानी हो या पेड़-पौधे। यदि हमारे पूर्वज भी इसका अंधाधुंध दोहन करते तो क्या आज हम इनके बिना जीवित होते। ये हमारा फ़र्ज बनता है कि हम अपनी प्रकृति को आदर दें और इसकी दी हर सौगात का सम्मान करें।
‘हां बापू, मुझे माफ़ कर दो। मैं कोई भी चीज़ आज से वेस्ट नही करूंगा। मुझे माफ कर दो।’
‘विदित क्या बड़बड़ा रहे हो, उठो, स्कूल नहीं जाना क्या?’ मम्मी विदित को उठा रही थी। विदित ने आंखें खोलीं।
विदित ने देखा वो अपने घर पर है। वो कुछ देर सोचता रहा फिर ब्रश करने बाथरूम में गया तो उसने पानी चला दिया। उसे कुछ याद आया और उसने झट से पानी बंद कर दिया। आज मम्मी का दिया दूध का गिलास भी उसने बिना नखरे किये पी लिया। वो जब घर से बाहर आया तो उसने देखा कॉलोनी में लगे टैंक का नल किसी ने खुला छोड़ दिया है। वो भाग कर गया और नल बंद कर दिया।
विदित ने नल बंद किया और आसमान की तरफ देखकर कहा, ‘थैंक्यू बापू, मैं आपकी सीख हमेशा याद रखूंगा।’


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