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फ्लैशबैक

Posted On November - 16 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म गुड्डी
शारा
कुसुम उर्फ गुड्डी (जया भादुड़ी बच्चन) एक मस्तमौला लड़की है। वह स्कूल में पढ़ती है। उसे फिल्मों का जबरदस्त क्रेज है। इतना क्रेज कि वह इसके लिए कभी-कभी स्कूल भी बंक कर देती है। उसे धर्मेंद्र पर क्रश है। उसे वह सुपरमैन लगता है जो कभी कोई गलती नहीं करता। फिल्मों के लिए क्रेजी होने के कारण उसे असली और नकली में फर्क करना भूल गया है। उसके परिवार वाले, दोस्त-मित्र उसकी इस आदत से परेशान हैं। वह पिता ए.के. हंगल, भाई-भाभी (सुमिता) के साथ शहर में रहती है और धर्मेंद्र की कोई फिल्म नहीं छोड़ती। उसके इस क्रश की पोलपट्टी तब खुलती है जब वह मुंबई जाती है, जहां उसकी भाभी का भाई नवीन (सुमित) उसे प्रपोज करता है लेकिन गुड्डी नवीन के प्रपोजल को यह कहकर ठुकरा देती है कि उसका धर्मेंद्र से प्यार चल रहा है। गुड्डी के इस जवाब को नवीन अपने अंकल (उत्पल दत्त) से साझा करता है। अंकल इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि गुड्डी तभी रास्ते पर लौट सकती है जब उसे वास्तविकता और मिथ्या का फर्क महसूस होगा। अब अंकल उत्पल दत्त अपने किसी दोस्त के ज़रिए धर्मेंद्र से संपर्क करते हैं।
वही उसे फिल्मी दुनिया के ग्लैमर की असली तस्वीर दिखाते हैं। वह उसे विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाते हैं कि चकाचौंध वाली इस दुनिया के पीछे कितनी कुरूपता है। आंखें खुलते ही गुड्डी नवीन से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है।
वर्ष 1971 में रिलीज़ गुड्डी ऋषिकेश मुखर्जी की बेहतरीन फिल्म थी। इस कथानक की टाइमिंग बिल्कुल सही थी। जब यह रिलीज हुई तो बिल्कुल ऐसे ही होता था। लड़कियां सिल्वर स्क्रीन के नायकों पर जान छिड़कती थीं। उनके स्टंट, उनका रहन-सहन, उनका मेकअप, उन्हें सब असली लगता था। इसलिए लोगों के रोल-मॉडल बदल गये थे। लड़कियां फिल्मों के नायकों को देखकर आहें भरती थीं। राजेश खन्ना को तो काला सूट तक पहनने की मनाही थी। सुना है लड़कियां अमिताभ बच्चन की जुल्फों पर फिदा थीं। दीवानगी इतनी थी कि लड़कियां अपने पसंदीदा हीरो की खातिर अपनी नसें काट लिया करती थीं। कहने को यह बात बचकाना थी लेकिन तब के समाज में किशोरों के साथ दिक्कत तो थी ही। यही कहानी है गुड्डी की।
‘गुड्डी’ जया भादुड़ी के फिल्मी करिअर के लिए सीढ़ी साबित हुई। इसने बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई की। हर जगह इसने एवरेज से ज्यादा बिजनेस किया जबकि बड़े शहरों में खूब हिट रही। इस फिल्म में पहले गुड्डी के पति के रूप में अमिताभ को लिया गया था लेकिन साथ ही बन रही तब अभिमान फिल्म में अमिताभ के पॉवरफुल हीरो के रोल को देखते हुए ऋषिकेश मुखर्जी ने यह रोल सुमित भांजा बांग्ला कलाकार से अदा करवाया। यह फिल्म बाद में तमिल में सिनेमा पैथियम के नाम से बनी, जिसमें कमल हासन ने हीरो का रोल किया था। तब की यह पहली ऐसी फिल्म थी, जिसमें कई कलाकारों ने अतिथि कलाकार की भूमिका अदा की थी। उसके बाद ही एक साथ कई अतिथि भूमिकाओं का रिवाज चला। इस फिल्म में राजेश खन्ना से लेकर दिलीप कुमार, विश्वजीत, विनोद खन्ना, अशोक कुमार, नवीन निश्चल, माला सिन्हा, शशिकला, ओमप्रकाश, प्राण, विम्मी, शत्रुघ्न सिन्हा, देवेन वर्मा तथा प्राण ने अतिथि कलाकार की हैसियत से एंट्री की थी।
अमिताभ बच्चन ने तो अतिथि बनना ही था क्योंकि तब रिश्तों की ऊष्मा ताजी-ताजी थी। इसके सभी गीत गुलज़ार ने लिखे थे, जिन्हें धुन से पिरोया था वसंत देसाई ने। ‘हमको मन की शक्ति देना’ इसी फिल्म का गीत है जो आज भी स्कूलों में बतौर प्रार्थना गाया जाता है।
‘दो आंखें बारह हाथ’ का ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ की धुन भी वसंत देसाई ने बनायी थी। इन्हें फिल्मी जगत में लाने वाले वी. शांताराम थे। इस फिल्म का एक अन्य गाना ‘बोले रे पपीहरा’ बिनाका गीतमाला 1972 की सालाना सूची में शामिल हुआ। इसके सभी गीत वाणी जयाराम ने गाये थे। इसमें जया भादुड़ी का अभिनय इतना बढ़िया था कि उनके आगे ढेर सारे अतिथि कलाकारों के चेहरे भी गौण पड़ गये। उन्हें इस फिल्म के लिए सर्वोत्तम एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवार्ड मिला। पद्मश्री जया भादुड़ी ने अपने फिल्मी करिअर के दौरान 9 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, जिनमें तीन बेस्ट एक्ट्रेस, 3 सपोर्टिंग तथा एक लाइफ टाइम एचीवमेंट के लिए था। वह लगातार चार बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा की सदस्य रही। उन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म ‘महानगर’ से एक बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की थी।
बतौर नायिका सिलसिला (1981) उनकी अंतिम फिल्म थी।
उनका फिल्मी सफर हजार चौरासी की मां से दोबारा शुरू हुआ। उसके बाद वह फिजा, कभी खुशी कभी गम, कल हो न हो सरीखी कमर्शियल फिल्मों में लगातार दिखीं।
बतौर वयस्क कलाकार गुड्डी उनकी पहली फिल्म थी। उसके बाद मिली, अभिमान, कोशिश, शोले, अनामिका आदि सुपरहिट मूवीज दीं।
निर्माण टीम
प्रोड्यूसर व निर्देशक : ऋषिकेश मुखर्जी
मूल कथाकार : गुलजार
पटकथा : ऋषिकेश मुखर्जी, डी.एन. मुखर्जी
गीतकार : गुलज़ार
संगीतकार : वसंत देसाई
सिनेमैटोग्राफी : द्वारका दिवेचा
सितारे : जया भादुड़ी बच्चन, धर्मेंद्र, उत्पल दत्त, एके हंगल आदि
गीत
बोले रे पपीहरा : वाणी जयराम
हरि बिन कैसे जीऊं : वाणी जयराम
हमको मन की शक्ति देना : वाणी जयराम एवं कोरस


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