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फोन में गुम हम-तुम

Posted On November - 17 - 2019

केवल तिवारी

दृश्य एक : कुशल कुमार शाम को ऑफिस से घर पहुंचे। तीन साल के अपने बच्चे का कोई रिस्पॉंस न देखकर खिन्न हो गये। कुछ दिन पहले तक ऑफिस से आते ही कुशल का बेटा पापा के कंधे पर झूलने लगता था। फिर उतरकर नटखट शरारतें करने लगता था। कभी ठुमक-ठुमक कर चलता और कभी पापा के लिए रखे पानी को खुद पी जाता। उसकी शरारतों से कुशल की तो जैसे थकान ही मिट जाती। लेकिन अब जैसे-जैसे बच्चा बड़ा हो रहा है, बदल रहा है। कभी वह टीवी में चल रही कार्टून फिल्मों में खोया रहता है तो कभी मम्मी के मोबाइल पर। पापा के ऑफिस से आने पर वह उनसे तभी लिपटता है जब वह अपना फोन उसे गेम खेलने के लिए देते हैं।
दृश्य दो : छुट्टी का दिन है। दोपहर को पूरा परिवार एक साथ खाने की टेबल पर बैठा है। लेकिन कोई किसी से बात नहीं कर रहा है। बीच-बीच में दो-तीन बच्चों की लड़ाई से पता चलता है कि परिवार साथ बैठा है। बच्चों में झगड़ा टीवी रिमोट को लेकर होता है। असल में खाने की टेबल के सामने ही टेलीविजन लगा हुआ है। उसमें कोई रियलिटी शो चल रहा है। बीच में ब्रेक आता है तो चैनल बदलने की लड़ाई शुरू हो जाती है। घर के मुखिया की इच्छा है कि खाने की टेबल पर घर-परिवार की बातें हों, बाकी लोग अपने अनुभवों को साझा करें, लेकिन ऐसा होता नहीं।
दृश्य तीन : रोहित को बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी मिलती है। वह फ्लाइट पकड़कर बेंगलुरु से दिल्ली आता है। थोड़ा-बहुत हालचाल जानने के बाद घरवालों के साथ उसकी ज्यादा बात नहीं होती और लगता है मानो दो पल में ही दो दिन बीत गये। कभी रोहित को लैपटॉप पर काम करना होता था और कभी घर के लोग अपने-अपने मोबाइल पर लगे होते। आभासी दुनिया में हर कोई इतना खोया होता है कि रिश्तों में प्यार के बोल के लिए वक्त न जाने कहां उड़ जाता है।
चौथा दृश्य : विमल एक शहर में घर से दूर अकेला रहता है। ऑफिस के अलावा जब वह घर पर रहता है तो सोशल मीडिया पर इस कदर व्यस्त रहता है कि घर वालों की हमेशा शिकायत रहती है कि फोन पर बात नहीं करता। उसने व्हाट्सएप पर तीन-चार ग्रुप बना रखे हैं। फेसबुक पर कई पेज हैं। जब से फेसबुक पर नये फीचर आये हैं वह ज्यादा ही व्यस्त हो गया है।
पांचवां दृश्य : शैलेश मोहन जी को इस बात का बहुत मलाल रहता है कि उनका बेटा जब भी घर आता है, उनके पास ज्यादा नहीं बैठता। बैठता भी है तो बस हूं-हां में बात करके चला जाता है। उनके बेटे के लिए भी वास्तविक से ज्यादा आभासी दुनिया महत्वपूर्ण हो गयी है। शैलेश चाहते हैं कि जब भी उनका बेटा घर आये तो कम से कम एक दिन में एकाध घंटा तो उनके पास बैठे। परंतु ऐसा होता नहीं है।
उपर्युक्त सभी जीवन व्यवहारों में रिश्तों के बदलने और गुम होने का दंश है। रिश्ते जो अब आभासी दुनिया में कहीं चले गये हैं। ऐसी दुनिया जिसमें बनावट है, आकर्षण है, परेशान करने वाला मनोविज्ञान है। यानी खूबसूरत रिश्तों का भी डिजिटलाइज़ेशन हो गया है। बेशक यह डिजिटलाइजेशन आज हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा हो गया हो, लेकिन हकीकत में जिंदगी का संतुलन गड़बड़ा रहा है। रिश्तों की दुनिया में बस एक खोखलापन ही है। इसमें सहेजना कम, डिलीट करना ज्यादा होता है। क्या एक पिता नहीं चाहता कि वह घर आये तो उसके बच्चे उसके कंधों पर झूलें। क्या परिवार को समर्पित लोगों की इच्छा नहीं होती कि आपस में हंसी मजाक हो। खाने की टेबल पर घर-परिवार की बात हो? क्या कोई माता-पिता या भाई-बहन नहीं चाहते कि कुछ दिन के लिए आया उनका बेटा, बेटी, भाई, बहन या कोई भी रिश्तेदार उनके साथ समय बिताये। क्या एक मां नहीं चाहती कि उससे दूर रह रहे उसके बच्चे उससे फोन पर बात करते रहें। चिट्ठियों का दौर तो अब खत्म हो गया, लेकिन क्या घर वाले नहीं चाहते कि अन्य आधुनिक माध्यमों से बच्चे घर वालों के लगातार संपर्क में रहें। लेकिन कहीं बच्चों के बिगड़ने में माता-पिता जिम्मेदार होते हैं तो कहीं काम, आभासी दुनिया और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने में हम लोग तब जागते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है।
हम भी दोषी
जानकार कहते हैं कि कई बार तो हमें पता नहीं चलता कि हमारी वजह से ही बच्चों में नकारात्मक प्रभाव आ गया है। माता-पिता जब व्यस्त होते हैं और बच्चे बीच में कुछ बोलते हैं तो वे उन्हें या तो मोबाइल पकड़ा देते हैं या फिर टेलीविजन पर कार्टून चैनल लगाकर सामने बिठा देते हैं। धीरे-धीरे यह एक लत की तरह बच्चों को लग जाती है।
संबंधों को सींचता भी है
हाल के दिनों में एक कहानी फेसबुक पर चल रही थी कि एक लड़की अपने मायके आई होती है। वह गौर करती है उसकी मां सुबह, दोपहर और शाम जब भी खाना बनाती है, अपने फोन से उस भोजन का फोटो खींचती है और उस फोटो को व्हाट्सएप के जरिये वह दूसरे शहर रह रहे अपने बेटे को भेजती है। वह अपनी मां से कारण पूछती है तो कहती है कि बेटे ने ऐसा करने को कहा है क्योंकि वह कैंटीन का खाना खाकर ऊब गया है और घर के भोजन की फोटो देखकर ही उसे राहत मिलती है और वह फोटो देखकर कैंटीन का खाना खा लेता है। बेटी को यह बात बेहद अजीब लगती है। वह अपने भाई को फोन करती है कि यह क्या तमाशा है। बेटा कहता है, ‘दीदी तीन साल पहले जब हमारे पिताजी का निधन हो गया था तो मां बिल्कुल टूट चुकी थी। पिताजी की तेरहवीं करने के बाद मैं चला आया था। छह माह बाद जब मैं घर आया तो देखा कि मां तो अपने प्रति बेहद लापरवाह हो गयी है। कभी एक टाइम खाना बना लेती है, कभी दो दिन में एक बार बनाती है। मैं जब तक वहां रहा मां ने रुटीन से खाना बनाया। बाद में यहां आकर मैंने ही मां से कहा कि मुझे तीनों वक्त के भोजन की फोटो भेजना, तब से मां अपने लिए कम से कम खाना तो बनाने लगी है।’ भाई का यह जवाब सुनकर बहन सुबकने लगती है।
यह एक कहानी है, लेकिन कई जगह रिश्तों में सोशल मीडिया से भावुक पहलू भी जुड़े हैं। परिवार से जुड़े ग्रुप बने हैं। एक साथ 30-100 रिश्तेदारों को सूचना मिल जाती है। इसी तरह अनेक जगह बुजुर्ग लोग अकेले रह रहे हैं और उनकी संतानें किसी दूसरी जगह। वहां सुबह-सुबह शाम ये लोग अपनी संतानों से वीडियो कॉल करते हैं, सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से जुड़ते हैं, इस सबसे उनका समय बेहतरीन तरीके से पास होता है।
संतुलन में ही समझदारी
जानकार कहते हैं कि आभासी दुनिया और हकीकत की दुनिया में संतुलन बनाए रखने में ही समझदारी है। आज की दुनिया में अपडेट रहना ज़रूरी है, ऐसे में सोशल मीडिया ज़रूरत भी है। आज लाइफ मैनेजमेंट गुरु कहते हैं कि सोशल मीडिया को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। इसके बजाय हम बीच-बीच में डिजिटल ब्रेक लें। यानी कभी-कभी निश्चित अवधि के लिए इससे दूर हो जायें। इससे ज्यादा ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों पर नजर रखें। जानकार कहते हैं कि सोशल मीडिया पर सक्रिय बच्चों पर बेहद नकारात्मक असर पड़ रहा है। उन्हें एक खास उम्र के बाद ही और बहुत ज़रूरी होने पर इंटरनेट की सुविधा दी जानी चाहिए।
ऑनलाइन गेम्स से रखें दूर
जानकार कहते हैं कि बच्चों को ऑनलाइन गेम्स से दूर रखे जाने की जरूरत है। ऑनलाइन गेम्स में जहां उनके मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, वहीं कई उल्टी-सीधी साइट्स तक भी बच्चों की पहुंच हो जाती है। स्कूलों में भी बच्चों को ऑनलाइन गेम्स से दूर रहने की अभिभावकों से अपील की जाती है।
चलता रहे शब्दों का सिलसिला
जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारीख का कहना है कि रिश्तों की गर्माहट बनाए रखने के लिए आवाज और शब्दों का सिलसिला चलता रहना चाहिए। ‘दैनिक ट्रिब्यून’ से बातचीत में डॉ. पारीख ने कहा कि पहले चिट्ठियों का दौर था, फिर सोशल मीडिया हावी हुआ। सोशल मीडिया में भी अब शब्दों के बजाय इमोजी (अलग-अलग मनोदशाओं के संकेतक ) आ गये। आपने किसी को प्रणाम कहना हो तो आपने हाथ जोड़ने का एक इमोजी भेज दिया। यानी प्रणाम शब्द वहां से गायब हो गया। इसी तरह फोन पर या आमने-सामने बात करने के बजाय या तो मैसेज कर दिया या फिर सोशल साइट्स पर किसी चीज को लाइक कर अपनी खुशी जता दी जाती है। यहां पर आवाज़ कहीं गुम हो गयी। डॉ. पारीख का कहना है कि शब्द और आवाज़ का यह गायब होना ही रिश्तों में दूरी बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि जब भी परिवार एक साथ बैठा हो, उस वक्त फोन, टीवी आदि सब दूर होने चाहिए। बस आपसी बात होनी चाहिए। रिश्तों में गर्माहट बनाए रखने के लिए हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझना होगा और बातचीत करते रहना होगा। गुस्सा हो, प्रेम हो, अपनापन हो, त्योहार की उमंग हो, हमें सबका अहसास करना और कराना होगा। अपने मनोभावों का अहसास कराना बेहद ज़रूरी है।


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