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पुरुष वर्चस्व से जूझने की टीस

Posted On November - 10 - 2019

वीणा भाटिया

अजीत कौर आजादी के बाद उभरी पंजाबी की उन प्रमुख लेखिकाओं में से हैं, जिनका नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। अजीत कौर के लेखन का परिदृश्य बहुत ही व्यापक है। उनके लेखन में खास तौर पर स्त्रियों का संघर्ष और परिवार एवं समाज में उनकी दशा के विविध पहलुओं का चित्रण हुआ है।
उनके लेखन में परिवार और समंाज में पुरुष वर्चस्व से जूझती स्त्री का दुख-दर्द सामने आया है। उनकी कहानियां जीवन के वास्तविक अनुभवों से निकली हुई हैं। अजीत कौर का मानना है कि स्त्री की स्वतंत्रता एक न्यायपरक और शोषण से मुक्त समाज में ही संभव है। उन्होंने यह भी लिखा है कि सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता से स्त्री को आजादी नहीं मिल सकती। इसके लिए परिवार और समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे को तोड़ना होगा। सबसे बड़ी बात है कि इसे उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से समझा और अपने लेखन में अभिव्यक्त किया।
16 नवम्बर, 1934 में लाहौर में जन्मी अजीत कौर ने पढ़ाई के दौरान ही लेखन की शुरुआत कर दी थी। अजीत कौर का पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनके लेखन को व्यापक पहचान मिली। देश ही नहीं, विदेशों में भी उनकी कृतियां लोकप्रिय हुईं। उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं—‘कसाईबाड़ा’, ‘गुलबानो’, ‘बुतशिकन’, ‘न मारो’, ‘नवम्बर 84’, ‘काले कुएं’, ‘दास्तान एक जंगली राज की’। उपन्यासों में ‘धुप्प वाला शहर’ और ‘पोस्टमार्टम’। आत्मकथा इन्होंने दो खंडों में लिखी – ‘खानाबदोश’ और ‘कूड़ा-कबाड़ा’। ‘कच्चे रंगां दा शहर लंदन’ नाम से इन्होंने यात्रा वृत्तांत भी लिखा है। ‘तकीये दा पीर’ नाम से संस्मरणों की भी एक पुस्तक आई है। इनकी आत्मकथा ‘खानाबदोश’ का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। कई कहानियों पर टेलीविजन सीरियल भी बने।
अजीत कौर ने होश संभालते ही देश का विभाजन देखा। इस त्रासदी का उनके मन पर गहरा असर पड़ा। इसके बाद 1984 में सिखों का जो कत्लेआम हुआ, उसने उनकी आत्मा को झकझोर दिया। गुजरात में 2002 में हुए दंगों को उन्होंने मानवता पर एक बड़ा धब्बा कहा।
अजीत कौर की आत्मकथा ‘खानाबदोश’ और ‘कूड़ा-कबाड़ा’ को पढ़ते हुए यह समझा जा सकता है कि दर्द के समन्दर में पैठ कर या आग के दरिया से गुजर कर ही ऐसी कृति सामने आ सकती है।
अजीत कौर ने दिल्ली में फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर नाम की संस्था बनायी। इस संस्था के जरिए उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों के लेखकों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। उन्होंने 1987 से साउथ एशियन लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजन की भी शुरुआत की। अजीत कौर कहती हैं कि इस फेस्टिवल के आयोजन का उद्देश्य पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंधों में सुधार लाना था। इस फेस्टिवल का आयोजन हर साल होता है। अजीत कौर अपनी बेटी अर्पणा कौर के साथ एकेडमी ऑफ आर्ट एंड कल्चर नाम की संस्था का भी संचालन करती हैं।
आज 85 साल की उम्र में भी अजीत कौर पूरी तरह सक्रिय हैं। कुछ साल पहले उनकी किताब ‘लेफ्टओवर्स’ और ‘यहीं कहीं होती थी जिन्दगी’ आई थी। साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित लेखिका की सृजन यात्रा जारी है।


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