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पराली का धुआं और मोबाइल की खीस

Posted On November - 7 - 2019

तिरछी नज़र

शमीम शर्मा

हरियाणा में सरकार क्या बनी कि सारे लोग बिल्कुल खाली से हो गये। जैसे परीक्षाओं के बाद विद्यार्थी खाली से हो जाते हैं। या लड़की की विदाई के बाद घर के सारे लोग निढाल यूं बैठ जाते हैं मानो गोड्डों में पानी पड़ गया हो। बहरहाल, चारों ओर सन्नाटा-सा छाया हुआ है। लाउडस्पीकरों का शोर, वोट मांगने वालों की कतारें, रैलियों की रौनक और मतदान करने की सरकारी व सामाजिक अपीलें सब शान्त हो गई हैं। जैसे कि मोबाइल साइलेंट मोड में चला गया हो। सारे नुक्कड़ और नाई की दुकानें चुप हो गई हैं जैसे मास्टर की तगड़ी डांट खाकर पूरी क्लास चुपचुपाती बैठ जाती है।
नई सरकार के गठन पर एक चिंतक ने टिप्पणी की है कि यह सरकार होम्योपैथिक दवा की तरह है क्योंकि पता ही नहीं चल रहा कि फायदा हो रहा या नुकसान। बस इसी आस में खाये जा रहे हैं कि रोग जड़ से मिट जायेगा। बाकी समय बतायेगा। बात समय की करें तो लगता है कि यह घड़ी धुएं और धुंध की है। सुप्रीम कोर्ट तक धुएं को लेकर तिलमिला रहा है पर स्कूली बच्चों को यह धुआं रास आ रहा है। दो दिनों की छुट्टियों का ऐलान सुनकर स्कूल के एक बच्चे ने कहा—शाबाश मेरे किसानों, पराली सुलगाते रहो, बच्चों को मौज मनवाते रहो। बच्चों ने कौन-सा गली या मैदान में फुटबाॅल-क्रिकेट खेलने जाना है। उन्होंने मम्मी-पापा के मोबाइल का धुम्मां ठाणा है। नौजवान तो पहले ही मोबाइल के मैदान में डटे खड़े हैं। दो दिनों से सभी महकमे वाले चिरमिराहट को झेलते हुये सरकार को कोस रहे हैं कि धुएं के डर से स्कूल तो बन्द कर दिये, उनकी आंखें क्या पत्थर की बनी हैं जो सारे दफ्तर खुले रखे।
ट्रेन में दो मुसाफिर बात कर रहे थे। एक बोला—मैं दावे से कहता हूं कि यह व्हाट्सएप हमें बहुत आगे ले जायेगा। दूसरे ने जिज्ञासावश पूछा कि वह कैसे तो जवाब मिला—मुझे ही देखो, तीन स्टेशन पहले उतरना था। कितना रोया होगा वह लड़का, जिसने दिवाली पर अपनी प्रेयसी को मोबाइल फोन गिफ्ट किया होगा और रात के तीन बजे तक सुनता रहा कि आपके द्वारा डायल किया गया नम्बर अन्य काॅल पर व्यस्त है।

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एक बर की बात है अक नत्थू की लुगाई मेले मैं खूगी। वो अपणे दोस्त गैल पुलिस मैं रपट लिखाण गया। पहचान बताते होये बोल्या— साढे पांच फुट लाम्बी, गौरी-चिट्टी, कजरारी आंख्या, तीखा नाक अर लाल टमाटर गाल। नत्थू का दोस्त बोल्या— ना रै, भाब्भी इसी तो कोनीं थी। नत्थू बोल्या— रै खूगी सा खूगी, ईब टोह तो सुथरी लेवां।


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