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दो गुरुओं के चरणों से पावन अमर यादगार

Posted On November - 17 - 2019

जितेंद्र अग्रवाल
मीरी-पीरी के मालिक छठे गुरु श्री हरगोबिंद साहिब और दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों से पावन अमर यादगार के रूप में शोभायमान है अंबाला स्थित गुरुद्वारा मंजी साहिब। गुरु हरगोबिंद जी यहां दो बार रुके थे। वहीं, गुरु गोबिंद सिंह जी यहां आये थे।
गुरु हरगोबिंद जी पहली बार 1617 ईस्वी में मुगल बादशाह जहांगीर के बुलावे पर अमृतसर से दिल्ली जाते वक्त इस स्थान पर दो दिन रुके। इस दौरान यहां के लोग गुरु जी से मिलने पहुंचे और इस इलाके में पीने के पानी की कमी के बारे में बताया। गुरु हरगोबिंद जी ने उन्हें एक स्थान
बताया और मिलकर खुदाई करने को कहा। ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को आजाद करवाकर वापस अमृतसर जाते समय गुरु जी दोबारा यहां रुके और यह जानकर बेहद खुश हुए कि गुरसिखों ने मिलकर बाउली खोदने का काम पूरा कर लिया है।
गुरु जी के चरणों से पावन हुए उस स्थान पर गुरसिखों ने एक स्मारक मंच, मंजी साहिब की स्थापना की, जहां गुरु जी बाउली के पास रुके थे। यह बाउली आज भी मौजूद है। पौराणिक बाउली के चलते इसे गुरुद्वारा बाउली साहिब भी कहा जाता है।
समय के साथ यह बाउली गाद से भर गयी थी। मिसलों के शासन के दौरान निशानवालिया मिसल के सरदार मेहर सिंह ने बाउली को साफ कराया और मंजी साहिब के स्थान पर गुरुद्वारे का निर्माण कराया। नाभा के महाराजा हीरा सिंह ने 20वीं शताब्दी की शुरुआत में इसका पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद समय-समय पर यहां कारसेवा चलती रही। वर्ष 1950 में इस गुरुद्वारे को भव्य रूप दिया गया। बाबा हरबंस सिंह द्वारा भी कारसेवा में विशेष योगदान दिया गया।
गुरुद्वारे के भीतर खूबसूरत मीनाकारी व चित्रकारी की गई है। गुरुद्वारे के साथ एक सरोवर का भी निर्माण किया गया है। यहां प्रत्येक संक्रांति पर हजारों श्रद्धालु आते हैं। इस स्थान पर हर वर्ष गुरु हरगोबिंद साहिब के प्रकाश पर्व पर तीन दिन का विशाल दीवान सजता है।
यह गुरुद्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। इस क्षेत्र को कैथ माजरी कहा जाता है। चंडीगढ़ से इसकी दूरी करीब 48 किलोमीटर है। अंबाला शहर का रेलवे स्टेशन मात्र 3 किलोमीटर और अंबाला छावनी जंक्शन करीब 8 किलोमीटर दूर है।


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