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दमदार कहानी ढूंढता हूं

Posted On November - 2 - 2019

हाल ही में रिलीज़ फिल्म ‘सांड की आंख’ नारी सशक्तीकरण, बुढ़ापे में भी कुछ करने का माद्दा रखना और स्पोर्ट्समैनशिप जैसी प्रेरणास्पद बातों पर आधारित है। फिल्म को निर्देशित किया है तुषार हीरानंदानी ने। तुषार हिंदी फिल्मों के लेखक हैं और उन्होंने क्लैपर बॉय के रूप में इंद्र कुमार की फिल्म ‘मन’ के सेट से शुरुआत की थी। उसके बाद लेखक-निर्देशक मिलाप जावेरी के साथ मिलकर मस्ती, क्यों हो गया ना, एबीसीडी, प्यारे मोहन और एक विलेन जैसी फिल्मों की स्टोरी लिखने में लग गए। वे कहते हैं कि दर्शकों को दमदार कहानियां पसंद आती हैं और फिल्म को कामयाबी की कसौटी पर कसने के लिये उन्हें उपदेश नहीं, मनोेरंजन देना होता है।

रूबरु

यश वालिया

तुषार हीरानंदानी

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘सांड की आंख’ के निर्देशक तुषार हीरानंदानी अपनी पत्नी और इस फिल्म की प्रोड्यूसर निधि परमार के साथ चंडीगढ़ पहुंचे। शूटर दादी चंद्र और प्रकाशी देवी की कहानी पर आधारित इस प्रेरणादायक फिल्म से उन्होंने अपने निर्देशन की शुरुआत की है। वे बालाजी मोशन पिक्चर्स के कंटेंट हेड के रूप में जुड़े रहे।
तुषार से उनकी डेब्यू फिल्म ‘सांड की आंख’ और बॉलीवुड में लेखक से निर्देशक की बदलती भूमिका जैसे कई विषयों पर बातचीत हुई।
आपने सेट पर क्लेपर बॉय से शुरुआत की। लेखन की ओर कैसे मुड़े?
दरअसल लिखने की प्रेरणा मुझे इंद्र कुमार से मिली। मैं शूटिंग के दौरान सेट पर बहुत सुझाव देता था तो मुझे कहा जाता था कि आप लेखक बन जाओ, ठीक रहोगे।
लेखन से निर्देशन की तरफ कैसे बढ़े?
दरअसल कई साल से आइडिया आते रहते थे लेकिन कोई ऐसी कहानी नहीं मिल रही थी जैसे ‘सांड की आंख’ वाली दादियों की कहानी है। ‘सत्यमेव जयते’ के सेट पर यह कहानी मेरे सामने आई और मैंने इसको पर्दे पर उतारने की ठान ली।
फिल्म को कैसा रिस्पॉन्स मिला है? आप इससे संतुष्ट हैं?
मेरा मकसद हमेशा फिल्म से मनोरंजन देना रहा, चाहे पहले लेखन के जरिए रहा हो या अब डायरेक्शन के जरिए। जिन-जिन फिल्मों को मैंने लिखा, उनमें सब में मनोरंजन प्रमुख रहा है। मैंने तो सिर्फ शूटर दादी की, उम्र की परवाह न करते हुए भी संघर्ष और कामयाबी की कहानी को दर्शकों के सामने पेश किया है और वह भी एक मनोरंजक फिल्म के रूप में, पूरी तरह से कमर्शियल।
मैं फिल्मों में कभी उपदेश नहीं देना चाहता।
दूसरे देशों में प्रदर्शन के लिए डबिंग कितनी ज़रूरी है?
डबिंग फायदेमंद हो सकती है पर बहुत महंगी है। सांड की आंख को अगर चीन में दिखाया जाएगा तो सबटाइटल साथ-साथ चलेंगे। एक तरह से डबिंग का अलग से पूरा प्रोसेस होता है जो बहुत कठिन और महंगा है। रही बात पूरे भारत में दिखाने की तो हिंदी से काम चल जाता है।
बॉलीवुड में ऑफबीट फिल्मों के चलन के बारे में क्या कहेंगे?
आजकल ऑफबीट और मेनस्ट्रीम का कोई अंतर कहानी के बारे में नहीं है। मैं मानता हूं कि फिल्में केवल अच्छी और बुरी हो सकती हैं। मामला केवल दर्शकों के मनोरंजन का और उनको पसंद आने का है।
फिल्म को बाज़ार में लाने से पहले मार्केट का ख्याल रखना कितना ज़रूरी है?
फिल्म बनाने के लिए मैं तो पैशन को महत्व देता हूं। कहानी में दम हो, फिल्म मनोरंजक हो, डायलॉग डिलीवरी बेहतर हो, दर्शकों को यही चाहिए। सांड की आंख को ही लें तो दर्शकों को जगदीप सिंह की संवाद अदायगी खूब भा रही है।
बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘सांड की आंख’ को पर्दे तक लाने में आपको 5 साल लगे। क्यों?
मैं अपनी प्रेरणा का स्रोत पत्नी को मानता हूं । इन्होंने मेरे जुनून को पूरा करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी । अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी तो ऐसे में भला कोई क्यों न अपनी मंजिल छू कर रहेगा। वहीं प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप, मेरी फिल्म की दोनों हीरोइनों, मेरी टीम के आर्ट डायरेक्टर रवि कैमरामैन जैसी लगभग पूरी टीम के सहयोग से ही मैं इस फिल्म को सिनेमाघर तक लाने में कामयाब हुआ।


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