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तारीख का फेर और बधाई

Posted On November - 11 - 2019

अजित गुप्ता

हमारा जमाना भी क्या जमाना था! बचपन में 5-7 साल तक घर में ही धमाचौकड़ी करो और फिर कहीं स्कूल की बात माता-पिता को याद आती थी। कोई भी जाकर दाखिला करा देता था। एक भाई को कह दिया कि इसका भी स्कूल में नाम लिखा दो, भाई की अंगुली पकड़कर हम चल दिये स्कूल। फार्म में पूछा गया कि जन्म-तारीख क्या है? अब भाई को कहां याद कि जन्म-तारीख क्या है! पहले की तरह हैपी बर्थडे का रिवाज तो था नहीं, बस मां ने बताया कि फला तिथि है। भाई को जो याद आया वह लिखा दिया गया। तारीख भी और वर्ष भी। हमारी पढ़ाई शुरू हो गयी, एक जन्म तारीख हमारी भी लिख दी गयी, कागजों पर। दसवीं में जाकर पता चला कि बोर्ड परीक्षा के लिए उम्र कम है। तो आनन-फानन में नए कागजात मय जन्मपत्री बनाई गयी और अब हमारी जन्म तारीख बदल गयी।
मां कहती कि तुम्हारा जन्म देवउठनी ग्यारस को हुआ है और स्कूल कहता कि सितंबर में हुआ। जन्मदिन मनाने की प्रथा भी बड़ी हो रही थी। हमें तो लगता कि मां ने जो बताया है उसे ही जन्मदिन मानेंगे लेकिन स्कूल में जो दर्ज था लोग उसी दिन बधाई दे देते। इतना ही नहीं तिथि तो अपनी गति से आती और अंग्रेजी कैलेंडर से आगे-पीछे हो जाती, अब तिथि और तारीख में भी झगड़ा होने लगा। हमने फिर पंचांग को सहारा लिया और असली तारीख ढूंढ़ ही डाली। वास्तविक जन्मपत्री भी मिल गयी तो तारीख पक्की हो गयी।
लेकिन कठिनाई यह है कि सरकारी कागजों में जन्म-तारीख कुछ और है और हमारे मन में कुछ और। सरकारी कागजों की तारीख याद रहती भी नहीं, लेकिन कभी-कभी अचानक से कोई कह देता है कि जन्मदिन की बधाई! चुनाव आयोग का बीएलओ आया, उसने कहा कि मतदाता सूची ऑनलाइन हो रही है तो आपने जो बदलाव कराने हों वे करा सकती हैं, जन्म-तारीख की जब बात आयी तो ध्यान आया कि यहां तो सरकारी ही लिखवानी है।
ऐसी ही एक बार अमेरिका के इमिग्रेशन ऑफिसर के सामने हुआ। उसने आने का कारण पूछा, मैंने कहा कि बेटे से मिलने आयी हूं। फिर वह बोला कि ओह आपका जन्मदिन सेलीब्रेट होने वाला है, मैं एक बार तो चौंकी लेकिन दूसरे क्षण ही मुझे ध्यान आ गया और उसकी हां में हां मिलाकर आ गयी। लेकिन ठाठ भी हैं कि मैं जब चाहे बधाई स्वीकार कर लेती हूं। जन्मदिन मनाते समय अहसास जन्म लेता है कि चलो एक दिन ही सही, कोई हमें विशेष होने का अवसर तो देता है। धरती में हमारे आने की सूचना पर मां बहुत खुश थी, पिताजी भी खुश थे। हम उन्हीं की खुशी लेकर बड़े होते रहे और अब अपने जमाने की रीत के कारण दो-तीन जन्मदिन मना लेते हैं।
साभार : अजित09 डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम


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