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झूठ से कर लें तौबा

Posted On November - 17 - 2019

सुभाष चन्द्र

बचपन से यही सुनता आया हूं कि झूठ बोलना पाप है। शिष्टाचार की बुनियादी बातों में यह बात बहुत मायने रखती है कि बचपन से ही सच बोलने की आदत बच्चों में डालनी चाहिये। घर में हो या स्कूल में, हर जगह सच ही कहा जाये। लेकिन, जैसे-जैसे हाथों में मोबाइल की संख्या बढ़ती गई है, लोग झूठ भी बोलने लगे हैं। रहते कहीं हैं और कहते हैं कहीं की बात। आखिर क्यों? मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ तो परिस्थितिवश लोग झूठ बोलते हैं और कुछ की आदत बन जाती है।
कई एक्सपर्टस भी कहते हैं कि मोबाइल फोन झूठ बोलने की संस्कृति को बढ़ा रहा है। एक निजी कंपनी में काम करने वाला हरीश कहता है कि कई बार ट्रैफिक के कारण ऑफिस पहुंचने में लेट हो जाता हूं, तो झूठ बोलना पड़ता है।
आखिर क्या करूं?
देखा गया है कि मार्केटिंग क्षेत्र में काम करने वाले लोग मोबाइल पर अधिक झूठ बोलते हैं। इसके कारण भी हैं। असल में, समय की पाबंदी के बीच एक ही समय में कई लोगों को एक साथ काम निपटाने की जद्दोजहद में ग्राहक को संतुष्ट करना बेहद मुश्किल होता है। सभी को संतुष्ट करने के लिहाज से अपनी स्थिति और काम के बारे में झूठी जानकारी दी जाती है। अब यह प्रोफेशनल मजबूरी कब पर्सनल आदत बन जाती है, लोगों को पता ही नहीं चलता।
झूठ बोलना पाप है…
बचपन से यही सिखाया जाता है कि झूठ बोलना पाप है। कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि बच्चे का झूठ बोलना इस बात का संकेत है कि उसका ज्ञान संबंधी विकास पटरी पर है। उम्र के साथ बच्चे बेहतर तरीके से झूठ बोल पाते हैं। झूठ बोलने के दौरान दूसरे पक्ष के दिमाग, उसकी सोच को समझने के तरीके को थ्योरी ऑफ माइंड कहा गया है। बचपन में हम सबने सुना होगा कि झूठ बोलना पाप है। इसके बावजूद हम झूठ से परहेज़ नहीं करते क्योंकि कहीं न कहीं यह हम इनसानों के डीएनए का हिस्सा है।
शोध बताते हैं कि भाषा की उत्पत्ति के कुछ वक्त बाद ही झूठ बोलना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन गया।
क्या है झूठ का मनोविज्ञान
सोशल मीडिया के युग में यह बात गौर करने लायक है। कुछ झूठ की सच्चाई जानते हुए भी हम उस पर यकीन करते हैं। इससे हमारी दूसरों को धोखा देने की और हमारी खुद की धोखा खाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। सोशल मीडिया की ही बात करें तो शोध के मुताबिक हमें उस झूठ को स्वीकारने में तनिक संकोच नहीं होता जो हमारी ही सोच को और मजबूत करता है।
दरअसल, झूठ बोलने की अनिवार्यता को पहली बार करीब दो दशक पहले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोविज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफेसर बेला डे पॉलो ने ऑन रिकॉर्ड किया था। है न हैरत की बात। देखा जाए तो लोग कई कारणों से झूठ बोलते हैं। कुछेक सोचते हैं कि इस भौतिकवादी और प्रतियोगात्मक दुनिया में आगे बढ़ने के लिए उन्हें मजबूरन अपनी योग्यताओं के विषय में झूठ बोलना पड़ता है।
दूसरे लोग ग़लतियों या अपराध को झूठ से छिपाने की कोशिश करते हैं और कुछ रिपोर्टों में गोलमाल करते हैं, ताकि ऐसा लगे कि उन्होंने वह कार्य किया है जो असल में उन्होंने नहीं किया होता है।
ऐसे में झूठ बोलने के इस मनोविज्ञान से बचना और बचाना काफी मुश्किल हो जाता है। बेहतर है कि कई मामलों में झूठ से बचने के लिये चुप्पी भी साधें। कभी-कभी किसी को मुसीबत बचाने के लिये बोला गया झूठ सही साबित होता है।


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