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जावा द्वीप पर 60 घंटे

Posted On November - 2 - 2019

इंडोनेशिया को महज़ बाली समझने की भूल करने वाले सैलानियों की कमी नहीं है। और इस भुलक्कड़ी में कितने ही टूरिस्ट इंडोनेशिया के सबसे बड़े टापू यानी जावा के सौंदर्य से अनजान रह जाते हैं। इसी द्वीप पर राजधानी जकार्ता है जो आर्थिक और औद्योगिक पहियों पर दौड़ती है। सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में अपनी खास पहचान को सदियों से सुरक्षित रखता आया योग्य कर्ता भी है, जिसे इस देश की आत्मा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

अलका कौशिक

जकार्ता के सुकर्णो हत्ता हवाई अड्डे से महज़ 70 मिनट की उड़ान मुझे योग्य कर्ता ले आयी थी। जोग-जा (योग्यकर्ता या जोग जकार्ता को प्यार से इसी नाम से बुलाते हैं वहां के निवासी) पहुंचने भर की देर थी और मेरे पैरों की बेताबियों ने मुझे शहर की रौनकों से मिलवाने मालियोबोरो स्ट्रीट पर ला पटका था। यह इलाका योग्यकर्ता का कमर्शियल हब कहलाता है। मालियाबोरो स्टेशन सड़क के इस पार था और उस तरफ थी बाज़ार की सरगर्मियां। मैं स्टेशन से कुछ पहले सजे-धजे खड़े कैफे में ठहर गई थी। मालूम था कि मालियाबोरो की चहल-पहल थमने में अभी वक़्त है। दरअसल, कैफे के आउटडोर एरिया में हिजाब ओढ़े बैठी इंडोनेशियाई युवतियों की मोहक मुस्कान ने मुझे अटका लिया था। कुछ बुर्के में लिपटी थीं, एकदम अकेली, फ्रैंच प्रेस्ड कॉफी की चुस्कियों के बीच बहते वक़्त को अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर फना करती हुईं। इस बीच, कैफे से आती गिटार और बैंड की धुनों पर सवार स्वरलहरियों ने वहां बैठे हर किसी का ध्यान खींच लिया था। पल भर को मैं भूल गई थी कि दुनिया के किस भूगोल में खड़ी हूं! एकदम यूरोपीय समां था और वो बिंदास शाम यह जताने के लिए काफी थी कि उसकी फितरत में एशियाई तो कुछ भी नहीं था, सिवाय मुझ हिंदुस्तानी और आसपास दिख रहे इंडोनेशियाई चेहरों के। इंडोनेशिया के औपनिवेशिक अतीत से यों मुखातिब होना भला-भला सा लगा था। दुनिया के सबसे विशाल मुस्लिम देश का खुलापन मुझे पसंद आ रहा था।

जोग -जा की एक शाम

जोग-जा की उस शाम को और बेतरतीब बनाने के इरादे से मैं सड़क पार कर मालियाबोरो स्ट्रीट पर बढ़ गई थी। यहां सैलानियों को पीठ पर टांगे, दौड़ती घोड़ा गाडि़यां और बेचक (साइकिल रिक्शा) से सड़कें गुलज़ार थीं। बाइक- टैक्सियां भी सड़कों पर भागती नज़र आयी थीं। कहीं-कहीं तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा थी कि सड़क छोटी पड़ जाया करती थी, खासतौर से रेलवे स्टेशनों के बाहर। मोबाइल ऍप की मदद से इन्हें बुक कर कहीं भी दौड़ना आसान होता है। धीरे-धीरे शहर अपने सीने में बंद राज़ खोलने लगा था। नज़दीकी होटलों के नाइट बार और कैबरे हाउस मुझे अचंभित करने के लिए काफी थे। और इन कैबरे हाउसों की लोकप्रियता का आलम तो यह है कि शाम से ही इनकी बुकिंग नहीं करवायी तो रात में शो देखने की गारंटी नहीं रहती।

बाटिक की खरीददारी

मगर उस रोज़ तो इंडोनेशियाई बाटिक की खरीदारी का फितूर मेरे दिलो-दिमाग पर सवार था और इस स्ट्रीट पर लगभग हर दुकान बाटिक की बेइंतहा वैरायटी सजाए खड़ी थी। देसी-परदेसी खरीदारों से भरी हुई। करीब एक किलोमीटर लंबी इस स्ट्रीट के एक से दूसरे सिरे तक पहुंचने में मुझे पौने दो घंटे से भी ज्यादा वक़्त लगा! हर शोरूम मुझे लाजवाब लग रहा था। और मज़ा तो यह देखकर आ रहा था कि शोरूमों, डिज़ाइनर स्टोरों की नकल उनकी नाक के ठीक नीचे यानी बाहर सजे पटरी बाज़ार पर बिक रही थी, सस्ते दामों पर। चटख रंगों और दिलफरेब पैटर्न वाली बाटिक ड्रेसों में उलझना रास आ
रहा था।

वेजीटेरियन हैं तो….

बहरहाल, भूख ने बेहाल किया तो हम अपने शॉपिंग बैग समेटकर खानपान की मंज़िल की तलाश में हो लिए। इस इलाके को पैदल नापने की सलाह काम आयी थी और फुटपाथ पर स्ट्रीट फूड की रेलपेल तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। जावानीज़ पारंपरिक व्यंजनों की यहां भरमार थी, अनगिनत दुकानें, किओस्क, ठेलियां और फर्श पर बिछी दरियों-चादरों पर जमा कद्रदान। जवानों से लेकर उम्रदराज़ जोड़े, परिवार, अकेले-दुकेले पसरे हुए थे उन मेकशिफ्ट ‘डाइनिंग अड्डों’ पर और ताज़ा, गरमागरम व्यंजनों का लुत्फ उठा रहे थे। मगर मुझ वेजीटेरियन के लिए कुछ भी नहीं था, सिवाय उन नज़ारों के! उन्हें ही अपनी यादों में बंद किया और नज़दीकी रेस्टॉरेंट में शरण ली। और वहां भी नाउम्मीदी ही हाथ लगी। एवाकेडो जूस और कुकीज़ का वो डिनर यादों की एलबम में दर्ज हो चुका है। अब तक इतना तो समझ आ चुका था कि इंडोनेशिया का यह हिस्सा हम पर बहुत ज्यादा रहम दिखाने के कतई मूड में नहीं है। दिन में बाटिक एयरलाइंस की जिस उड़ान ने जकार्ता से यहां पहुंचाया था, उसमें भी फलों की एक नन्ही-सी कटोरी और कॉफी पीकर ही काम चलाना पड़ा था और सैंडविच में भरावन के नाम पर टुना फिश थी, सो उसे बिन छुए ही लौटा दिया था। वेजीटेरियन सैंडविच की मेरी फरमाइश पर उस व्योमबाला ने बिना माथे पर शिकन डाले दो टूक बता दिया कि उसके पास हमारे जैसे ‘अल्‍पसंख्यकों’ के लिए कुछ नहीं है।
रात के दस बज चुके थे और अब मेरे बदन पर थकान तारी थी। लेकिन बाज़ारों को, स्ट्रीट वैंडरों को, नाइटलाइफ को और उस आनंद और अनुभव को लूटने वाले दीवानों को रात के अंधेरे से जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा था। वीकेंड का आगाज़ हो चुका था और जोग-जा की सड़कों पर रौनकें बढ़ती ही जा रही थीं। इस बीच मैं अपने हेरिटेज होटल फिनिक्सा की तरफ कदम बढ़ा चुकी थी। जोग-जा की सड़कों पर उस पहली ही रात का आलम यह बताने के लिए काफी था कि युवाओं के दिलों से लेकर बदन तक पर इस्लाम ने इस देश में ताले नहीं जड़े हैं। इंडोनेशियाई समाज और खासतौर से युवा शराब, सिगरेट, ई-सिगरेट, बार, क्लब, वेस्टर्न म्यूजि़क, पहनावे और अपनी सोच तक में आधुनिक जीवन की तमाम खूबियों-खराबियों के संग जी रहे हैं। यह मुस्लिम समाज का एक अलग चेहरा था और आने वाले दिनों में मुझे इसे और नज़दीक से देखने का मौका मिलने वाला था।

विश्व विरासत मंदिरों की नगरी

कभी-कभी नींद को भी मुल्‍तवी करना पड़ता है। जैसे उस रोज़ किया था जब बोरोबुदूर बौद्ध मंदिर से बाल-सूर्य की अठखेलियां देखने की योजना थी। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है, विश्व धरोहर है और इंडोनेशिया के सक्रिय ज्वालामुखी मेरापी की राख ने इसे दुनिया की नज़रों से सालों तक ओझल कर दिया था। फिनिक्स से हमारा कारवां रात डेढ़ बजे चल पड़ा। खाली सड़कों पर बिछे अंधेरे और पुतलियों में जमा नींद ने मुझे फिर सुला दिया था। करीब पौने चार बजे आंख खुली और अब सामने फैली रौनकों से मुखातिब थी। किनारे ही एक रेस्टोरेंट से बोरोबुदूर में प्रवेश के लिए टिकटें ली गईं और उसके बाद हम मंदिर की राह हो लिए। ब्रह्म मुहूर्त में मिचमिचाती आंखों से एक अनदेखी बौद्ध स्मारक की सीढ़ियां नापने वाले हमारे जैसे सिरफिरों की कोई कमी नहीं थी। पत्थरों की ऊंची-ऊंची सीढ़ियां फांदने के बाद स्तूपों के एक नन्हे संसार में मैंने खुद को पाया। मेरे साथी ट्रेवल ब्लॉगर ने अपने कम्पास से दिशाबोध के बाद एक स्तूप से पीठ टिकाकर फिर एक झपकी की तैयारी कर ली थी। सूर्योदय होने में पूरे पचास मिनट बाकी थे। अलबत्ता, धुंध और अंधेरे में लिपटी उस सुबह ने मुझे रोमांचित कर डाला था और नींद का आखिरी कतरा भी अब तक मेरी आंखों से निचुड़ चुका था। उन सरकते लम्हों में मैंने याद किया शैलेंद्र वंश के उन सम्राटों को जो स्तूपों का यह अद्भुत, विराट संसार आने वाली पीढि़यों के लिए रचकर कभी के कूच कर चुके हैं।

विशाल बौद्ध विहार

लगभग 750-850 ई. में इस विशाल बौद्ध विहार को बनाया गया था, गोलाकार चबूतरों पर करीब 504 छोटे आकार के स्तूपों के भीतर बौद्ध प्रतिमाएं विराजी हैं जबकि मध्य में एक बड़े आकार वाला गुंबदनुमा स्तूप है। इंडोनेशिया में हिंदू राजवंशों के सिमटने और जावा में इस्लाम के हावी होने के बाद यह स्मारक धीरे-धीरे लोगों की स्मृतियों से ओझल होने लगा। कुछ सदियों के मौन और कुहासे के बाद 19वीं सदी में बोरोबुदूर मंदिर ने फिर से दुनिया को अचंभित करना शुरू किया। मरम्मतों के कई दौर चले और बीते कुछ वर्षों में यूनेस्को की देखरेख में चले संरक्षण अभियानों के बाद बोरोबुदूर एक बार फिर बौद्ध तीर्थयात्रियों और सैलानियों की मंजिल बन चुका है।
इस बीच, पूर्व के आकाश ने नारंगी चोला ओढ़ लिया था और सूरज की सवारी आ लगी थी। इंतज़ार तकते सैलानियों के कैमरे डिवाइस काम में जुट चुके थे। जोग-जा का पहला सूर्योदय ही इतना दिव्य होगा, मैंने सोचा नहीं था। निगाहों के रास्तेे होते हुए वो नज़ारे स्मृृति में पैठ बना चुके थे। अब लौटने की घड़ी थी। लौटते कदम बेमकसद लग रहे थे। लेकिन प्रम्बानन मंदिर का आकर्षण हावी था। हम उस सवेरे की दिव्यता को और खींचते हुए इंडोनेशिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसर को देखने निकल पड़े। यह पूरे 240 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है, जिनका निर्माण इंडोनेशिया के संजय वंश के काल में 9वीं शताब्दी में हुआ। इस विशाल मंदिर परिसर में हिंदू देवताओं की त्रिमूर्ति—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित मंदिर है। मंदिरों के ऊंचे, लंबे शिखरों, मूर्तियों, दीवारों पर उकेरे मोटिफ और प्रतिमाओं आदि को देखकर एक बार आप भूल जाओगे कि आप हिंदुस्तान से बाहर खड़े हो। यह भी यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थल है, जिन्हें देखने दुनियाभर से पर्यटक खिंचे चले अाते हैं। शिव मंदिर की सी‍ढ़ियां चढ़ते हुए अपने आजू-बाजू मुझे कितने ही इंडोनेशियाई दिखे, हिजाब में लिपटी उन औरतों को देखकर मुझे हैरानी हुई थी और तभी ख्याल आया था कि मैं दुनिया के उस अद्भुत देश में हूं, जिसका धर्म इस्लाम है और संस्कृति में राम-रामायण बसते हैं। प्रम्बानन में शाम को रामायण शो देखने शाम को फिर लौटे थे। कहते हैं कि इंडानेशियाई रामायण बैले नहीं देखा तो क्या देखा।

जोग-जा में एडवेंचर की खुराक

अगला दिन जोगजा के समुद्रतटों, गुफाओं के नाम रहा। एडवेंचर की तिकड़ी पूरी हुई दोपहर बाद मेरापी ज्वालामुखी देखने के साथ। ज्वालामुखी फिलहाल शांत है। बीते 500 सालों से यह लगातार दहाड़ता आया है। आखिरी बार करीब 18 महीने पहले इसकी गर्जना सुनी गई थी। तब से यह शांत खड़ा है और आज इसके आसपास ‘ज्वालामुखी पर्यटन’ खड़ा हो चुका है।
इंडोनेशिया में कुदरत की हर शै मौजूद है, एकदम बिंदास अंदाज़ में। इसे तो देखकर ही समझा जा सकता है। जैसे प्रम्बानन के आंगन में बिखरे पड़े बड़े पत्थरों को देखकर ही उस भूकंपीय गर्जना का अनुमान हो सकता है, जिसने कभी इन मंदिरों को जमींदोज़ कर डाला था। बाद में, उन पत्थरों को चुनकर, दोबारा मंदिर गढ़े गए, फिर भी मूल योजना के मुताबिक उन्हें बनाने में अभी बरसों लगेंगे।
जोग-जा में बिताए साठ घंटों की यादों को समेटकर हम तीसरे दिन योग्यकर्ता एयरपोर्ट आ लगे थे। यहां से सिंगापुर और फिर अपने वतन लौट आए हैं। क्या वाकई लौटे हैं हमारे मन ?

इंडोनेशिया—यह भी जानें

राजधानी-जकार्ता, जो कि इंडोनेशिया के सबसे बड़े द्वीप जावा में है।
राष्ट्रीय भाषा—बहासा इंडानेशिया, अंग्रेज़ी लगभग सभी प्रमुख पर्यटन ठिकानों पर समझी जाती है।
इंडोनेशिया और भारत के बीच सीधी उड़ान सेवा नहीं है। आप एयर एशिया, सिंगापुर एयरलाइंस, गरुड़ एयरलाइंस से सिंगापुर/मलेशिया होते हुए बाली, जकार्ता, मेदान वगैरह पहुंच सकते हैं।
भारतीय यात्रियों के लिए इंडोनेशिया में 30 दिनों की अवधि तक मुफ्त, सिंगल एंट्री वीज़ा ऑन एराइवल की सुविधा है। इंडानेशिया में पोर्ट ऑफ एंट्री पर ही इमीग्रेशन डेस्क पर आपके पासपोर्ट में वीज़ा छूट की मुहर लगा दी जाती है।
1 रुपया यानी 198.86 रुपियाह (इंडोनेशियाई)। भारतीय ट्रैवलर्स यहां खुद को लखपति महसूस कर सकते हैं।
इंडोनेशिया करीब 18600 द्वीपों का समूह है। लगभग 600 द्वीपों पर ही इनसानी जीवन है जबकि बाकी सभी निर्जन टापू हैं।
भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और परिणामस्वरूप सुनामी जैसी आपदाएं इंडोनेशिया में आम हैं।
मुस्लिम प्रधान इंडानेशिया में बाली हिंदू प्रधान द्वीप है।
मौसम—उष्ण जलवायु। मुख्य रूप से दो मौसम होते हैं—बारिश के महीने (वैट सीज़न) अक्तूबर-नवंबर से मई-जून तक बारिश और खुशनुमा मौसम (ड्राई सीज़न) जुलाई से सितंबर तक।
पहनावा—इंडोनेशिया इस्लामिक देश है लेकिन पर्यटकों पर पहनावे को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। आप अपने सामान्य कपड़ों में यहां घूम सकते हैं, धार्मिक स्थलों पर जाएं तो शरीर को पूरा ढकने वाले वस्त्र हों, महिलाओं के लिए कहीं भी सिर ढकने की बंदिश नहीं है।
इंटरनेट और मोबाइल
अपने मोबाइल कनेक्शन पर इंटरनेशनल रोमिंग करवाकर आएं या लोकल सिम खरीद लें जो आसानी से मिलती है। आमतौर पर होटलों-रेस्तराओं में मुफ्त वाई-फाई सुविधा मिलती है।
खरीदारी—बाटिक के कपड़े, हैंडीक्राफ्ट सस्ते मिल जाते हैं।
खास—इंडोनेशिया में आपको कभी भी ऐसा नहीं लगेगा कि आप अपने देश से दूर आए हैं। चेहरा-मोहरा और रंग हम भारतीयों से मिलता-जुलता है तो सड़कों पर ट्रैफिक का हाल भी हमारे जैसा ही है!


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