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जागेंगे श्रीहरि, मंगल कार्यों का होगा श्रीगणेश

Posted On November - 3 - 2019

पं. भानुप्रतापनारायण मिश्र

दिवाली के पंच पर्वों के बाद अब बारी है मांगलिक कार्यों के श्रीगणेश की। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी (8 नवंबर) से विवाह जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। पुराणों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार माह के लिए शयन करने चले जाते हैं। इस दौरान सनातन धर्म के अनुयायी विवाह, नया मकान बनाने जैसे शुभ कार्य नहीं करते। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को श्रीहरि के जाग उठने का दिन माना गया है। इसीलिए इसे देवोत्थान, देवउठनी और देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इसी दिन से मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। उपासकों को विधि-विधान से श्रीहरि को जगाना चाहिए। श्री हरि को जगाते समय इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिये-
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमङ्गलं कुरु॥
अर्थात- ‘हे गोविन्द! उठिये, उठिये, हे गरुड़ध्वज! उठिये, हे कमलाकान्त! निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मंगल कीजिये।’
मान्यता है कि इस एकादशी का उपवास करने से हजार अश्वमेध एवं सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।
तुलसी विवाह का दिन : देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने के बाद पहला शुभ कार्य होता है तुलसी विवाह। पुराणों में तुलसी को विष्णुप्रिया, हरिप्रिया कहा गया है। श्रीहरि के स्नान, नैवेद्य, आचमन, चंदन, पुष्पमाला आदि सब में तुलसी शामिल है। कार्तिक शुक्ल नवमी से एकादशी तक निराहार व्रत करने का विधान है। तुलसी विवाह के लिए एकादशी के दिन गोधूलि बेला यानी शाम के समय आंगन या पूजा घर में लकड़ी के पीढ़े पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर तुलसी का गमला रखें। तुलसी के गमले के चारों तरफ गन्ने का मंडप बना लें। तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाकर, चूड़ी आदि अर्पित करके दुल्हन की तरह शृंगार करें। फिर गणेश आदि देवताओं एवं श्रीहरि के विग्रह शालिग्राम का पूजन करें। शालिग्राम को गमले में रखें। शालिग्राम और तुलसी पर दूध में भीगी हल्दी लगाएं। गन्ने के मंडप पर भी हल्दी का लेप कर पूजन करें। फिर तुलस्यै नमः मंत्रोच्चारण के साथ षोडशोपचार पूजन करें। दक्षिणा के साथ एक नारियल टीका के रूप में रखकर शालिग्राम-तुलसी जी की सात परिक्रमा की जाती है। दीप-कपूर से आरती करें। अगले दिन द्वादशी पर दान-दक्षिणा कर व्रत पूरा होता है। जिनके बेटी नहीं है, वे तुलसी विवाह कर कन्यादान का पुण्य कमा सकते हैं। जिन पर शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही है, उन्हें तुलसी विवाह संपन्न करवाने से बड़ा लाभ होगा।


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