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जनादेश के मायने

Posted On November - 11 - 2019

जन संसद

आईना दिखाया
हरियाणा विधानसभा चुनाव में जनता ने बता दिया है कि लोकसभा व विधानसभा चुनाव के मुद्दों में बड़ा अंतर होता है। सरकार के अधिकांश मंत्रियों का हार जाना दर्शाता है कि जनता में नाराजगी थी। सरकार वैसे ईमानदारी का ढिंढोरा पीट रही थी पर कोई काम धरातल पर नजर नहीं आया। सरकारी तंत्र पर सरकार की पकड़ कमजोर रही, जिससे आला कर्मचारी व जनता परेशान थी। भाजपा ने टिकट वितरण में कार्यकर्ताओं की अनदेखी की। कांग्रेस समय रहते अपने संगठन में बदलाव कर देती तो परिणाम कुछ और होते।
सोहन लाल गौड़, कैथल

विभाजित निर्णय
मतदाता मनोहर लाल खट्टर की कारगुजारियों से खुश नहीं थे। विडंबना यह है कि भाजपा और जजपा, जो चुनावों से पहले एक-दूसरे का विरोध करते रहे, अवसरवादी राजनीति को अपनाते हुए शासन चलाएंगे। कांग्रेस पहले के मुकाबले में बेहतर पार्टी बनकर सामने आई है। चुनावों से पहले पार्टी की कमान पूर्व मुख्यमंत्री, भूपेंद्र सिंह हुड्डा तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा को दे दी गई। कांग्रेस को आपसी मतभेद मिटाकर, एकजुट होकर पार्टी के हित के लिए काम करना होगा। त्रिशंकु विधानसभा का होना, लोगों के विभाजित निर्णय को ही बताती है।
शामलाल कौशल, रोहतक

अप्रत्याशित नहीं
हरियाणा की नब्बे सीटों वाली विधानसभा में पचहत्तर पार की उम्मीदों को तब गहरा धक्का लगा जब सत्ताधारी दल को जरूरी बहुमत का आंकड़ा न मिल पाया। यह राजनीति है, जहां धुर-विरोधी की बैसाखी भी सत्ता की सीढ़ी बन जाती है। चुनावी फैसले चौंकाने वाले भले हैं, मगर अप्रत्याशित कतई नहीं है। जिन राष्ट्रीय मुद्दों ने लोकसभा की सभी सीटें दिलाईं, अचानक वही मुद्दे आत्ममंथन की चुनौती देने लगे हैं। जनादेश के मायने यह हैं कि मतदाता राजनीतिक तौर पर जाग उठा है, मगर परिपक्वता का अभाव भी साफ़ दिखाई देता है। लिहाज़ा विकास की आड़ में बार-बार बदलती चाल, चरित्र, चेहरों के हाथों जनादेश का संकुचन होना तय है।
एमके मिश्रा, रातू, झारखंड

मोहभंग हुआ
भाजपा के जनाधार का सिकुड़ना तथा कांग्रेस, जजपा की विजय का कारण जातीय ध्रुवीकरण के अतिरिक्त खट्टर सरकार से आम जनता का मोहभंग होना भी है। ग्राउंड लैवल पर कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्री, नेता सत्ता के नशे में चूर रहते थे। सीएम विन्डो केवल लीपापोती रही। वास्तव में मंत्री किसी को मिलते ही नहीं थे। इसीलिए जनता ने गठबंधन की सरकार के लिए वोट दिया ताकि सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार हो सके।
एम.एल. शर्मा, कुरुक्षेत्र

जनादेश के विरुद्ध
हरियाणा विधानसभा चुनाव नतीजे बयां करते हैं कि जनादेश सत्तापक्ष के लिए मुफीद नहीं रहा है, जब कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा जजपा एक-दूसरे के खिलाफ मुखर थे। इसके पीछे व्यक्तिगत स्वार्थ छिपा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। जनता ने सत्तापक्ष के खिलाफ विपक्ष को जनादेश इसलिए नहीं दिया कि वह सत्तापक्ष से हाथ मिलाकर मतदाताओं के फैसले की तौहीन करे। यदि जजपा चाहती तो अन्य विरोधी दलों का साथ देकर जनता के जनादेश का आदर कर सकती थी। जजपा का भाजपा से हाथ मिलाने के पीछे क्या स्वार्थ होंगे, यह तो जजपा को ही मालूम होगा।
रूप सिंह नेगी, सोलन

जनादेश के सबक
भाजपा के लिए फिलहाल स्थिति यह है कि मतदाताओं ने उसे इतना कमजोर नहीं किया कि उसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। वहीं न ही विपक्ष को इतना मजबूत किया है कि उसे सत्ता सौंप दी जाए। राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा जनादेश के विश्लेषण के बीच यह कहा जा रहा है कि राज्य में भाजपा की सत्ता वापसी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। इसे कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। वहीं कांग्रेस के प्रदर्शन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। ऐसे में इस जनादेश से निकले संदेश को समझने के लिए हरियाणा के राजनीतिक हालात को भी समझना होगा। टिकटों का गलत आवंटन भी भाजपा की हार की एक प्रमुख वजह बना है।
अमन सिंह, बरेली, उ.प्र.

पुरस्कृत पत्र
घोषणाएं हकीकत बनें
हरियाणा विधानसभा चुनाव में जनता सत्ताधारियों को यह संदेश देने में कामयाब रही कि अब केवल जुमलेबाजी से काम नहीं चलने वाला। जनता अब अपनी मूलभूत समस्याओं जैसे रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि गंभीर समस्याओं का समाधान चाहती है। एक-दूसरे की धुर-विरोधी भाजपा-जजपा का सत्ता के लिए हाथ मिलाना सत्तामोह, अवसरवादिता और सिद्धांतविहीन राजनीति का सर्वोत्तम उदाहरण है। कांग्रेस की पराजय का कारण उसको अपने वंशवादी राजनीति से उबर नहीं पाना। इसके अतिरिक्त उसका जमीनी स्तर पर संगठन न होना है।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उ.प्र.


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