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घर आ जा परदेसी…

Posted On November - 11 - 2019

विवेक शर्मा
उत्तर प्रदेश से अलग होकर ‘अपना उत्तराखंड’ का नारा बुलंद करने वाले यहां के लोगों को विकास के नाम पर विस्थापन मिला है। पर्यावरण और क्षेत्रीय लोगों की चिंता किनारे रखकर चल रहीं विद्युत परियोजनाओं ने हजारों लोगों को विस्थापित कर दिया है और हजारों एकड़ खेती योग्य भूमि बांध और विशाल जलाशयों की भेंट चढ़ गई। बेरोजगारी युवकों को पलायन के लिए मजबूर कर रही है। उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पलायन के चलते 2.85 लाख घरों में ताले लटक गए हैं और 968 गांवों को भूतहा (घोस्ट विलेज) घोषित किया जा चुका है। राज्य सरकार ने 17 सितंबर 2017 को पलायन आयोग गठित किया था, जिसका मुख्य कार्य राज्य से हो रहे पलायन संबंधी आंकड़े एकत्रित करना था। आयोग ने 13 जिलों की 7950 ग्राम पंचायतों में सर्वे कराया था।
जयसिंह रावत ‘जसकोटी’ की कविता ‘हर्चिगेनी डांड्यूं की सुरीली, नि दिखेणी मोरुयुं क घिंडुड़ी’ में पलायन पीड़ा के इस दर्द का अहसास महसूस किया जा सकता है।
‘डंडेली तिवरी सबी ह्वयेगी खंद्वार
पुंगड़ी पटली बांझे गयेनी स्यार।
गौ क गौ ह्यवगेनी खाली
पाणी जनि प्रदेश म ब्वग्नि च जवानी।
बच्या खुच्या गढ़ क द्वार पैर पसारी
बूढ़ बुढ़या वख काना छी जगवली।’
इसका मतलब है कि उत्तराखंड के मकान, तिवारे सब खंडहर बन गए हैं, गांव के गांव खाली हो चुके हैं और पानी की तरह जवानियां मैदानों की ओर बहती जा रही हैं। बस बचे हैं तो बचे खुचे दरवाजे, चलने में असमर्थ पैर पसारे बूढ़े–बुजुर्ग।
लोगों के पलायन का प्रदेश पर काफी असर पड़ रहा है। लोगों के गांवों से पलायन से कृषि भूमि को जाेतने वाले नहीं रहे, इससे कृषि भूमि बंजर होती जा रही है। सरकार मानती है कि राज्य गठन से अब तक 70 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो गई है। हालांकि, गैर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो बंजर कृषि भूमि का रकबा एक लाख हेक्टेयर से अधिक है।
इसके साथ ही, पलायन से पहाड़ का सिर्फ सामाजिक संतुलन ही नहीं, राजनीतिक संतुलन भी गड़बड़ा गया है। 2001 की जनगणना के आधार पर 2006 में हुए राज्य परिसीमन के तहत पहाड़ की 40 विधानसभा सीटों में से 6 सीटें जनसंख्या में कमी की वजह से कट गईं, ये 6 सीटें मैदानी क्षेत्र में बढ़ गईं। इस तरह अब पहाड़ों में सिर्फ 34 सीटें रह गईं और मैदान में 36 सीटें हो चुकी हैं, जबकि 9 जिले पहाड़ में आते हैं और मैदान में चार ही जिले हैं। पहाड़ों में पलायन की वजह से आबादी इसी तरह घटती रही तो 2026 के परिसीमन में और सीटें पहाड़ से कटकर मैदान में चली जाएंगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि राज्य विधानसभा में पहाड़ों का प्रतिनिधित्व कम रह जाएगा और इसका सीधा असर पहाड़ी क्षेत्रों, खासकर ग्रामीण इलाकों के विकास पर पर पड़ेगा।
लोगों के पलायन करने से अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के आसपास के गांव खंडहर में तब्दील हो गए हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा सवाल पैदा हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों के ये गांव देश की सीमाओं के लिए सुरक्षा ढाल की तरह थे। बाहरी घुसपैठ या आक्रमण की सूरत में सदियों से इन गांवों के बाशिंदे सेना व सुरक्षा बलों के लिए बीहड़ रास्तों और भौगोलिक स्थिति समझने का बड़ा सहारा बनते रहे हैं। भारत-चीन सीमा से जुड़ी 3,488 किलाेमीटर की वास्तविक नियंत्रण रेखा इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है। जुलाई 2017 में चमोली के बाराहोती क्षेत्र में चीनी सेना घुसपैठ कर चुकी है। 1962 की लड़ाई में ही चीन ने अक्साई चिन क्षेत्र पर कब्जा जमाया था।
लोक संस्कृति हो रही खत्म : पहाड़ से लोगों के पलायन से लोक संस्कृति के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। यहां पहले पुराने रीति- रिवाजों से शादी होती थी, लोग जुड़ते थे और उनके बच्चे पहाड़ी संस्कृति से रूबरू होते थे, लेकिन आज वे इनसे परे हैं। इसके अलावा, गांव में महिला दल और युवा मंगल दल होते थे, जो ग्रामीणों की मदद करते थे। खासकर जंगलों में आग रोकने से बचाते थे।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रौढ़ शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एसएस रावत का कहना है कि पलायन रोकने के लिए सरकार को रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की जरूरत है। जब तक सरकार इन तीनों समस्याओं को हल नहीं करेगी, पलायन नहीं रुक सकता। पलायन की वजह से लोग शहरों की तरफ रुख करने लगे हैं। गांव में लोग नहीं होने के कारण खेत बंजर हो गए हैं। पलायन की वजह से एडवेंचर कम होगा और पर्वतारोहण पर भी असर पड़ेगा। पहाड़ में पले-बढ़े बच्चे स्वरोज़गार के बारे में ज्यादा नहीं सोच पाते और सोचें भी कैसे, कभी उन्हें इस बात के लिए प्लेटफ़ॉर्म ही नहीं दिया गया। सरकार वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोज़गार योजना के साथ ड्राइवर बनने में ही साथ दे पाती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। उनका कहना है कि सरकार सबसे पहले युवाओं को रोजगार देने का काम करे।
वे कहते हैं कि पंचायत और सामाजिक संस्थाएं उत्तराखंड से शहर गये लोगों से एक बार गांव में वापस आने के लिए कहें। उन्हें घरों के रख-रखाव के लिए प्रेरित करें। सरकार बागवानी को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चलाए, जिससे पलायन पर काबू पाया जा सके।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर प्रो़ एमसी सती कहते हैं कि उत्तराखंड में पर्यटन के माध्यम से पलायन को रोका जा सकता है। सरकार को इस तरफ काम करना होगा। 4 धाम यात्रा के दौरान तीर्थ यात्री ऋषिकेश से सीधे केदारनाथ या बदरीनाथ ही रुकते हैं। सरकार को चाहिए कि आसपास के गांवों को भी पर्यटन के तौर पर विकसित करें, जिससे यहां के युवाओं को रोजगार मिल सके। इसके अलावा, आर्गेनिक फार्मिंग, औषधीय पौधों की खेती के बारे ग्रामीणों को जागरूक करके रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।
ग्रामीण विकास और पलायन आयोग उपाध्यक्ष डा़ एसएस नेगी का कहना है कि पहाड़ों से पलायन रोकने के लिए केवल स्वरोजगार की दिशा में उठाए कदम ही महत्वपूर्ण हैं। ऑफ सीजन कल्टीवेशन, एपल कल्टीवेशन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में होमस्टे, एडवेंचर टूरिज्म ऐसे क्षेत्र हैं, जहां रोजगार की असीमित संभावनाएं हैं और काफी लोगों ने इन क्षेत्रों में काम भी किया है। उन्होंने रूरल बीपीओ बीटूआर का भी जिक्र किया, जिससे 300 से 400 बच्चों को टेक्नोलॉजी से जोड़कर रोजगार सृजन किया जा सकता है।

केस स्टडी

एक बार निकले तो फिर वापसी नहीं
पौड़ी गढ़वाल के गांव केष्टा के राजेंद्र केष्टवाल जब 22 साल के थे तो उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया था। रोजगार के चक्कर में वे गुजरात चले गये थे। जब वो 25 साल के हुए तो शादी हो गई। उनकी पत्नी उनकी मां के साथ गांव में रहनी लगे। राजेंद्र जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। जब बच्चों ने 12वीं की परीक्षा पास कर ली तो उनकी पढ़ाई का संकट खड़ा हो गया। राजेंद्र की इतनी कमाई नहीं थी कि वह पौड़ी गढ़वाल के किसी बड़े कॉलेज में अपने बच्चों को पढ़ा सकें। अंत में वह अपने बच्चों को लेकर गुजरात आ गये, लेकिन उनकी 80 वर्षीय मां दर्शनी देवी वहीं रुक गई। लेकिन कुछ समय बाद मां बीमार पड़ गई। उन्हें अपनी मां को भी लेकर गुजरात अाना पड़ा। अब उनके घर पर ताला जड़ा है। घर वीरान हो गया और देखभाल करने वाला भी कोई नहीं। राजेंद्र और उसकी मां दर्शनी देवी को आज भी पहाड़ की याद सताती है, लेकिन मजबूरी में गुजरात में ही रहना पड़ रहा है। ये अकेले राजेंद्र की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के हजारों युवाओं की कहानी है।

हर दिन 33 लोग छोड़ रहे गांव
उत्तराखंड में पलायन की समस्या दिनों-दिन विकराल रूप धारण कर रही है, जिससे साल दर साल गांव के गांव वीरान हो रहे हैं। पिछले दस साल से हर दिन औसतन 33 लोग गांवों से जा रहे हैं। यह खुलासा खुद राज्य सरकार की रिपोर्ट में हुआ है।

70 फीसदी युवा बाहर
उत्तराखंड के 13 जिलों में 5,31,174 पुरुष और 3,38,588 महिला बेरोजगार रजिस्टर्ड हैं। इनमें ग्रेजुएट पुरुष बेरोजगार 1,08,248 और महिला ग्रेजुएट 1,11,521 हैं। प्रदेश छोड़कर बाहर जाने वाले 42 फीसदी लोगों की उम्र 26 से 35 के बीच है। 25 साल से कम आयु के 28 फीसदी लोग दूसरे राज्यों में गए हैं। यानी 70 फीसदी युवा राज्य से चले गए।

हिमाचल अलग इसलिए
गढ़वाल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर प्रो़ एमसी सती ने बताया कि हिमाचल और उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति में काफी अंतर है। उत्तराखंड में 70 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल है, जबकि हिमाचल के केवल 25 प्रतिशत भू भाग में जंगल है। हिमाचल में बागवानी सेे काफी आय हो जाती है और वहां टूरिज्म के अवसर हैं। उत्तराखंड में बागवानी के लिए सबसिडी की कोई योजनाएं नहीं हैं।

सरकार बोली- शुरू की हैं योजनाएं
प्रदेश सरकार के सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत का कहना है कि वीरान पड़े गांवों को आबाद करने के लिए सरकार ने योजनाएं शुरू की हैं। 95 विकास खंडों में वीरान गांव भी खूब चमक बिखरेंगे। वहां पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा और पर्यटकों को पहाड़ी व्यंजनों का स्वागत चखाया जाएगा। गांवों से लगातार हो रहे पलायन को थामने के लिए सरकार ने हर ब्लाॅक में किसानों को केंद्र में रखकर एक मॉडल गांव बनाने का निर्णय लिया है। सभी तरह की सुविधाओं से लैस मॉडल गांव के आधार पर अन्य गांवों को भी धीरे-धीरे इसी तर्ज पर विकसित किया जाएगा। किसानों को कृषि के लिये एक से 5 लाख रुपये तक का लोन बिना ब्याज दिया जाएगा। स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए 1500 डाक्टरों की नियुक्ति की गई है और अन्य स्टाफ भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

3200000 लोगों ने छोड़े पहाड़ 285000 घरों पर लटके हैं ताले
राज्य के 734 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं और यहां कोई नहीं रहता। पलायन करने वालों में 70% लोग गांवों से गए तो वहीं 29% ने शहरी इलाकों से पलायन किया है। पलायन के कारण राज्य के 565 गांवों में वर्ष 2011 के बाद 50% आबादी घटी है, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे छह गांव भी शामिल हैं। उत्तराखंड से पलायन कर चुके अधिकतर लोग अपने घरों से देवता भी ले गये हैं।


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