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गर्म हवा

Posted On November - 2 - 2019

फ्लैशबैक

हिंदी फीचर फिल्म

शारा

फिल्म ‘गर्म हवा’ को हिंदी सिनेमा में आर्ट फिल्म मूवमेंट का प्रारंभिक हस्ताक्षर भी माना जाता है। प्रसिद्ध कहानीकार इस्मत चुगताई की कहानी पर बनी इस फिल्म की मुख्य भूमिका में बलराज साहनी थे, जिन्होंने सलीम का रोल अभिनीत किया। कैफी आज़मी की पत्नी शौकत आज़मी, सलीम मिर्जा की पत्नी बनी हैं। फारूख़ शेख की यह डेब्यू फिल्म है और बतौर निर्देशक सथ्यू की भी। फिल्म के आरंभ में ही शायर कैफी आज़मी का यह शे’र ‘गीता को कोई सुनता, न कुरान की, हैरां सा ईमान यहां भी वहां भी’ फिल्म की कथावस्तु पर रोशनी डालता है।
यह गर्म हवा है साम्प्रदायिक रंजिशों की, सियासत की और असहिष्णुता की जो 1947 के बाद भी दोनों तरफ बहती रही। विभाजन के बाद हुए दंगों के कारण जो मारकाट हुई, वे तो मर कर छूट गये लेकिन जो कमोबेश जिंदा थे, व न इधर के रहे, न उधर के। अपने ही मुल्क, अपने ही घर में रह रहे इन बाशिंदों को कभी मुहाजिर का सम्बोधन दिया गया तो भारत में भापे कहकर उनसे भेदभाव किया गया। और तो और यह जातिगत भेदभाव कमोबेश भारत व पाक में अब भी जारी है। यही कहानी का थीम है और सेंट्रल आइडिया भी। फिल्म के आरंभ में ही शायर कैफी आज़मी का शे’र ‘गीता को कोई सुनता, न कुरान की हैरां सा ईमान यहां भी वहां भी’ फिल्म की कथा-वस्तु पर रोशनी डालता है। जब हिंदी सिनेमा में श्याम बेनेगल सरीखे निर्देशकों ने अंकुर जैसी यथार्थ फिल्म बनाकर प्रगतिशील सिनेमा की नींव रखी, उसी समय सत्यजीत रे, मृणाल सेन व ऋत्विक घटक समानांतर सिनेमा में नये-नये प्रयोग कर रहे थे लेकिन ‘गर्म हवा’ बनाकर सथ्यू ने इस समानांतर सिनेमा को जो नया मिजाज दिया, वह शेष सिनेमाकारों के लिए बाद में रोशनी स्तम्भ बना। इस फिल्म के साथ ढेर सारी यादें, कितने विवाद जुड़े हैं। पहला विवाद खड़ा करने की वजह तो तथाकथित राजनीतिक समीक्षकों को सहज ही मुहैया हो गया कि इसकी मूल कहानी इस्मत चुगताई ने लिखी है। दरअसल, इस्मत चुगताई ने अपने ही रिश्तेदारों के बसने, उजड़ने की यह कहानी सथ्यू और शमा ज़ैदी को सुनाई थी। पाठकों को बता दूं कि फिल्म की पटकथा लेखन से जुड़ी शमा जैदी एम.एस. सथ्यू की धर्मपत्नी है और एम.एस. सथ्यू जाने-माने फिल्म आर्ट डायरेक्टर हैं और इप्टा नामक संस्था से जुड़े हैं। शमा जैदी भी वामपंथी विचारधारा की तेजतर्रार लेखिका हैं और फिल्म लेखन से जुड़ी हैं। बहरहाल, जब यह कहानी कैफी आजमी को सुनाई गयी तो उन्होंने फिल्म में अपने तजुर्बे डालकर कथानक को और भी सच्ची घटना में परिवर्तित कर दिया। फ्लैश बैक के पाठक जानते होंगे कि कैफी आज़मी को हिंदी मोशन पिक्चर्स में उर्दू साहित्य का परिचय कराने वाली शख्सियतों में से एक माना जाता है। इस फिल्म में जो जूता उद्योग फलता-फूलता दिखाया गया है, उसकी शूटिंग आगरा के एक मोहल्ले में हुई है। बहुत से शॉट फतेहपुर सीकरी के हैं। जैसे ही इस फिल्म को बनाने की घोषणा हुई, साम्प्रदायिक उपद्रवियों के बवाल के मद्देनजर कैमरा की दूसरी नकली यूनिट कहीं और रवाना कर दी गयी ताकि आगरा में शूटिंग शांतिपूर्वक हो सके। हल्के बजट से शुरू की गयी इस फिल्म का निर्माण सथ्यू ने महज 2,50,000 रुपये की रकम से शुरू किया। उनकी हैसियत रिकार्डिंग उपकरण खरीदने की भी नहीं थी, इसलिए तमाम फिल्म को मौन ही शूट किया गया। बाद में फिल्म के किरदारों की आवाज को डब किया गया। शमा जैदी ने कॉस्ट्यूम और प्रोडक्शन विभाग संभाले थे। चूंकि सथ्यू काफी समय से मुंबई में इप्टा से जुड़े थे, इसलिए इप्टा के कलाकारों ने ही अधिकांश फिल्म के किरदार निभाये। यह वही फिल्म है, जिसकी शिवसेना के नेता बाल ठाकरे ने स्क्रीनिंग रोक दी थी। उन्हें एतराज था कि फिल्म में हिंदुओं को साम्प्रदायिक और असहिष्णु दिखाया गया है। लेकिन फिल्म देखने के बाद वे शांत हो गये। यह फिल्म दो बार रिलीज हुई। पहले तो यह सेंसर बोर्ड से ओ.के. नहीं हो पायी। साल-छह माह बाद आखिर फाइल खिसकी तो सेंसर बोर्ड पूरा ओ.के. करने पर रिलीज़ तो हुआ लेकिन सियासत के कारण इसे कुछ ही सिनेमाघरों तक सीमित रहना पड़ा। लिहाजा कई साल डिब्बे में बंद रहने के बाद इसे 2014 में दोबारा रिलीज किया गया। फिल्म इतनी अच्छी थी कि इसे हर वर्ग का भरपूर सहयोग मिला। बलराज साहनी की मां का रोल पहले मशहूर ग़ज़ल गायिका तथा जावेद अख्तर की बुआ बेगम अख्तर अभिनीत करने वाली थीं। लेकिन उसकी जगह बदर बेगम को लिया गया। मिर्जा हवेली के सारे दृश्यों की शूटिंग आगरा स्थित पीपल मंडली में आर.एस. लाल माथुर की पुरानी हवेली में हुई थी। मोतियाबिंद होने के कारण लगभग पूरी तरह अंधी थी और कैफी को वैसा ही किरदार चाहिए था। वह फिल्मों में काम करने के लिए सोलह साल की उम्र में मुंबई भाग गयी थी। उन्होंने कुछ देर वाडिया मूवीटोन फिल्मों में काम किया फिर पैसा इकट्ठा करके वापस आगरा आ गयी, जहां उन्होंने चकला खोल लिया। देखिये किस शिद्दत से उन्होंने अपना रोल किया है‍। निर्देशक ने उन्हीं के मुंह से फिल्म का सेंट्रल आइडिया बयान करवाया है। उनकी आवाज को बाद में रीना पाठक ने डब किया है। बलराज साहनी तो अपनी आवाज की डबिंग करने के अगले दिन ही चल बसे। उन्हें फिल्म देखनी भी नसीब नहीं हुई। साउंड ट्रैक में जो कव्वाली ‘मौला सलीम चिश्ती’ शामिल की गयी है, उसे वारसी बंधुओं के अजीज अहमद वारसी ने गाया है। उधार मांग कर शुरू की गयी फिल्म तकनीकी रूप से सही न बन पाने के कारण 2009 में दोबारा फेस लिफ्टिंग के लिए शुरू की गयी तो इसका लाखों का बजट करोड़ों में पहुंच गया। फिर जब 14 नवंबर, 2014 को इसे रिलीज किया गया तो यह देश के 70 सिनेमाहॉलों में एक साथ चली। और हर दर्शक इसके निर्देशन का दीवाना हो गया। चलते-चलते आपको बता दूं कि चेतन आनंद की फिल्म हकीकत के आर्ट डायरेक्टर भी सथ्यू ही थे, जिन्होंने बाद में ‘सूखा’ नामक आर्ट फिल्म बनायी थी। उनका मंचित किया गया नाटक ‘दारा शिकोह’ आज भी दूसरे नाटक मंचों को तकनीकी निर्देशन मुहैया कराता है। समीक्षकों का गर्म हवा के बारे में कहना है कि विभाजन के बाद साम्प्रदायिक असहिष्णुता पर बनी यह बेहद उम्दा फिल्म है और फिल्म में कहानी भी विभाजन के बाद शुरू होती है। कैमरा आगरा में जूता व्यवसाय से जुड़े मिर्जा मुस्लिम परिवार पर आ टिकता है। इस परिवार में दो बेटे हैं। छोटे बेटे के सुपुर्द पैतृक जूता कारोबार है जो बाप-दादाओं के तौर-तरीकों से चला आ रहा है। सलीम बने हैं बलराज साहनी और उनके बड़े भाई हलीम सियासत का कारोबार करते हैं। वह मुस्लिम लीग के प्रधान भी हैं जो संस्था मुस्लिम आधारित देश पाकिस्तान बनाने की वकालत करती रही है। हलीम के बेटे काजिम की सगाई सलीम की बेटी अमीना (गीता) से हो रखी है। सलीम के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा वकार पिता के साथ उनके पैतृक धंधे में मदद करता है। छोटा बेटा सिकंदर (फारूख शेख) विद्यार्थी है जो चाहता है कि भारत में ही रहकर सरकार की आंखें खोली जाएं। हम पाकिस्तान क्यों जाएं? हलीम सपरिवार पाक चला जाता है और सलीम अपना वतन छोड़कर जाने को तैयार नहीं। लिहाजा अमीना की शादी खटाई में पड़ जाती है फिर उसे बीमार बूढ़ी मां को भी तो देखना है जो अपना मुल्क नहीं छोड़ना चाहती। हलीम का चोरी-छिपे वतन छोड़कर जाना सलीम के सामाजिक रुतबे को प्रभावित करता है। उसे मुस्लिम स्वीकार नहीं करते और हिंदू संशय की नजरों से देखते हैं। उसका फलता-फूलता व्यवसाय पायदान पर आ जाता है। जो लाल, सेठ उसके आगे-पीछे घूमते थे, वही उसे ऋण देने के लिए मना कर देते हैं क्योंकि वह मुस्लिम है और उन्हें डर है कि देश छोड़कर चला जाएगा। सलीम का घर नीलाम कर दिया जाता है। उसे कोई किराये पर घर देने के लिए तैयार नहीं। उधर, हलीम का बेटा काजिम अमीना से मिलने के लिए बिना पासपोर्ट के भारत आ जाता है। वह स्वदेश लौटने से पूर्व अमीना से शादी करना चाहता है कि उसे भारत की पुलिस गिरफ्तार कर लेती है। उसे वापस पाक भेज दिया जाता है और अमीना टूट जाती है। उसके जीवन में दोबारा बहार आती है जब शमशाद जो सलीम के साले का बेटा है, से उसकी सगाई हो जाती है। लेकिन वह भी देश के हालात को देखते हुए पाक चले जाते हैं। लेकिन शमशाद की शादी की बात पाक के किसी सियासी नेता की बेटी से होने की खबर सुनते ही अमीना खुदकुशी कर लेती है। यह एक ऐसा पल है जब सलीम सपरिवार पाक जाने की तैयारी कर लेता है लेकिन उनकी बीमार मां अपनी हवेली छोड़ने को तैयार नहीं क्योंकि सलीम पर पुलिस देशद्रोह का केस दायर कर चुकी थी, और उसे न चाहते हुए भी भारत छोड़ना पड़ रहा था। लेकिन उसका बेटा नहीं चाहता कि किसी समुदाय, संप्रदाय से डरकर मादरे-वतन छोड़ा जाये। रास्ते में उनकी घोड़ागाड़ी जुलूस में घिर जाती है। इस जुलूस में वही लोग शामिल हैं जो हुक्मरानों के जुल्मों के सताये हैं लेकिन अपनी समस्याओं का हल यहीं रहकर करना चाहते हैं। भीड़ सिकंदर को उनके साथ चलने के लिए उकसाती है तो सलीम बेटे समेत खुद भी जुलूस का हिस्सा बन जाते हैं।

पुरस्कार

एकेडमी अवार्ड्स : बैस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म पुरस्कार के लिए 1974 में भारत की ओर से भेजी गयी फिल्म।
कांस फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन पॉम के लिए नामांकन।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार : राष्ट्रीय अखंडता के लिए सर्वोत्तम फीचर फिल्म का नरगिस दत्त पुरस्कार।
फिल्म फेयर अवार्ड्स : बेस्ट डायलॉग कैफी आज़मी को।
बेस्ट स्क्रीन प्ले अवार्ड शमा ज़ैदी व कैफी आज़मी को।
बेस्ट स्टोरी अवार्ड इस्मत चुगताई को।

निर्देशन : एम.एस. सथ्यू

प्रोड्यूसर : अबू सिवानी, ईशान आर्य, एम.एस. सथ्यू
मूल कथा : इस्मत चुगताई
पटकथा लेखन : शमा ज़ैदी, कैफी आज़मी
संगीतकार : बहादुर खान
गीतकार : कैफी आज़मी
सिनेमैटोग्राफी : इशान आर्य
सितारे : बलराज साहनी, फारूख शेख, दीनानाथ जुत्शी, शौकत अली, ए.के. हंगल और गीता सिद्धार्थ, जलाल आगा।


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