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खून-पसीने के मोतियों से महका मोतीबाग

Posted On November - 8 - 2019

चर्चित चेहरा

अरुण नैथानी
जिस दौर में पहाड़ की पहाड़ जैसी चुनौतियों से बचकर लाखों लोग मैदानों में उतर आए हैं, उस दौर में विद्यादत्त शर्मा जैसे लोग भी हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर जंगल में मंगल रचा दिया है। पहाड़ों से सामंजस्य के साथ बारिश का पानी जुटाकर उन्होंने पत्थरों में फूल खिलाए हैं। बंजर भूमि में फसलें लहलहायी हैं। इस 83 साल की उम्र में भी वे थके नहीं हैं। पचास साल के इस पुरुषार्थ का स्पष्ट संदेश है कि यदि हम संकल्प कर लें तो बंजर इलाकों में भी समृद्धि की बयार लायी जा सकती है। पं. विद्यादत्त के पुरुषार्थ को नमन करते हुए उनके योगदान पर एक फिल्म ‘मोतीबाग’ बनायी गयी है। केरल में आयोजित डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल में मोतीबाग प्रथम पुरस्कार हासिल कर चुकी है। सितंबर में फिल्म का चयन ऑस्कर में प्रदर्शन के लिये हुआ है।
विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखंड स्थित पौड़ी जनपद के सांगुड़ा गांव के इस प्रगतिशील किसान ने पिछले 52 वर्षों में अपने इलाके को जीवंत बनाया है। पलायन का दंश झेल रहे पौड़ी जनपद के लिए उनकी पहल प्रेरणादायक है। उनका संदेश पर्यावरण व जल संरक्षण तथा पलायन रोकने को लेकर है। पहाड़ की माटी में रचे-बसे पं. विद्यादत्त के जीवन संघर्ष की आज उत्तराखंड और देश के अन्य पर्वतीय इलाकों में धूम है। दूरदराज के गांवों के लोग व स्कूली बच्चे उनकी प्रेरणादायक सफलता का राज जानने उनके गांव लगातार आते हैं। वे किसानों को उन्नत फसलों की जानकारी दे रहे हैं। उनका मानना है कि स्वरोजगार जनित योजनाओं के संचालन से बेरोजगारी कम होगी।
विद्यादत्त कहते हैं कि आज युवा रोजगार के लिए खेती छोड़ रहे हैं, लेकिन खेती स्वरोजगार का सबसे प्रभावी साधन हो सकता है। वे मानते हैं कि उन्नत किस्म के बीज से आधुनिक फसलों व सब्जियों की खेती की जाये तो यह लाभकारी हो जाता है। उद्यानीकरण स्वरोजगार का बेहतर जरिया साबित हो सकता है।
दरअसल, विकास खंड कल्जीखाल के सांगुडा में स्थित इस पर्यावरण अनुकूल जीवंत पाठशाला को महकाने में विद्यादत्त ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 52 वर्ष होम कर दिये। उन्होंने संदेश दिया कि पलायन की मार झेल रहे इलाके में समृद्धि कैसे लौटायी जा सकती है। वे उम्र के इस पड़ाव में प्राणप्रण से अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जुटे हैं। उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री उनके ऋषिकर्म को दर्शाती है।
विद्यादत्त के सतत प्रयासों से उपजायी गई एक 23 किलो वजन और चार फीट लंबी मूली की चर्चा पूरे देश में हुई। उनकी यह उपलब्धि राष्ट्रीय रिकॉर्ड दर्ज करने वाली संस्था लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज हुई है।
दरअसल, सूखे पहाड़ी इलाके में पानी का संकट देखते हुए विद्यादत्त के हौसले कम नहीं हुए। उन्होंने ‘मोतीबाग’ के लिए पानी जुटाने के लिये बारिश का पानी एकत्र करने का प्रयास किया। उन्होंने एक सुखदेई जलाशय बनाया और कड़ी मेहनत से अपने खेतों में सोना उगाया। ऐसे प्रयासों को स्कूली पाठयक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी इससे प्रेरणा ले। तभी पलायन रुकेगा। नि:संदेह मेहनत से लहलहाती यह खेती उन लोगों के लिये एक प्रेरक सबक है जो पानी की कमी और जानवरों के डर से खेती करना छोड़ रहे हैं।
वाकई विद्यादत्त की पहल प्रेरणादायक है। इस इलाके की हरियाली आंखों को सुकून देती है। उनके बहुचर्चित ‘मोतीबाग’ में जहां परंपरागत स्थानीय फल महक रहे हैं, वहीं सेब, खुमानी जैसे गैर परंपरागत फल भी गुल खिला रहे हैं।
अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिये विद्यादत्त ने वर्ष 1964 में सरकारी नौकरी छोड़ी और गांव लौटे। अपने बिखरे खेतों को चकबंदी के जरिये ढाई एकड़ के चक में बदला। जब वे गांव की पथरीली जमीन को उपजाऊ भूमि में बदलने की कवायद में जुटे तो लोग उनके प्रयासों को संदेह की दृष्टि से देखा करते थे। बारिश के पानी को एकत्र करना  और फिर नालियों के जरिये क्यारियों तक पहुंचाने का श्रमसाध्य कार्य किया। आज उनकी यही कर्मठता ग्रामीणों को नई पहचान दे रही है। देश में इस गांव की मिसाल दी जा रही है।
उम्र के आठ दशक पूरे कर चुके विद्यादत्त आज भी अपना सारा काम खुद करते हैं। खेती में नेपाली श्रमिक मददगार हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वे रासायनिक खादों से परहेज करते हैं।
विद्यादत्त शर्मा की इस जीवटता को महसूस करते हुए दर्जनभर डॉक्यूमेंट्री बना चुके और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्मल चंद्र डंडरियाल ने उनके योगदान पर ‘मोतीबाग’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनायी है। जो राष्ट्रीय शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत हो चुकी है। अब ऑस्कर के लिए इस डॉक्यूमेंट्री का चयन हुआ है। यह उत्तराखंड की पहली एेसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म है, जिसका चयन अकादमी अवॉर्ड के लिए हुआ है। फिल्म संदेश देती है कि हौसला हो तो मेहनत से पत्थरों में फूल खिल सकते हैं।


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