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कितना सोहणा है सोना

Posted On November - 3 - 2019

आलोक पुराणिक

त्योहारों के मौके पर भारत में सोना खरीदने का रिवाज़ है। हाल में सोने के भाव आसमान छू रहे थे पर अभी सोने के भावों में थोड़ी गिरावट आ रही है। एक वक्त सोने के भाव 40000 रुपये प्रति दस ग्राम से ऊपर जा चुके थे। आसार यूं हैं कि अब सोने के भावों में थोड़ी नरमी ही रहेगी। इसकी वजह यह है कि ग्लोबल स्तर पर हालात में अनिश्चितता थोड़ी सी कम हो रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि अनिश्चितता खत्म हो गयी है। पर यह ज़रूर है कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के आसार कम हो गये हैं और चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर में थोड़ी-सी शांति के आसार दिख रहे हैं।

सोने के भावों के हाल
18 अक्तूबर 2019 को वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन के आंकड़ों के मुताबिक सोने के भाव साल की शुरुआत से लेकर अब तक 21.22 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। एक महीने के आंकड़ों के हिसाब से सोने के भावों में करीब 1.67 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। एक साल के आंकड़े देखें तो साफ होता है कि 18 अक्तूबर 2019 को एक साल में सोना 20.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखा चुका था। तीन सालों में इसकी सालाना बढ़ोतरी का आंकड़ा उतना आकर्षक नहीं लगता।
यानी तीन सालों के हिसाब से इसने सालाना 8.55 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। पांच सालों के आंकड़े बताते हैं कि हर साल इसने 7.06 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखायी है।
यानी एक साल के आंकड़े देखें तो सोने की चमक बहुत तेज़ दिखायी देती है। पर जैसे-जैसे समय अवधि को विस्तार से फैलाकर देखें तो साफ होता है कि सोने के भावों में उतनी चमक नहीं रही है, जितनी हाल के वक्त में और खासकर एक साल में दिखायी दी है।
इसके मुकाबले शेयर बाज़ार के आंकड़े देखें तो बात उलटी दिखायी देती है। हाल के वक्त में, शेयर बाज़ार में तेज़ी उतनी नहीं दिखायी दी है, पर जैसे-जैसे समय सीमा का विस्तार करें तो शेयर बाज़ार तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा चमकदार दिखायी देता है। 18 अक्तूबर 2019 के आंकड़ों को देखें, तो मुंबई शेयर बाज़ार के सूचकांक सेंसेक्स ने साल की शुरुआत से 10.7 प्रतिशत की तेज़ी दिखायी है। इस अवधि में सोने के भाव 21.22 प्रतिशत उछल चुके हैं। यानी दोगुने से भी ज्यादा।

कीमतों में चमक
यानी की साल की शुरुआत से लेकर अब तक सोने के भावों की चमक बहुत तेजी का रुख दिखा रही है। साल की शुरुआत से ही तमाम ग्लोबल कारकों के मामले में अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति रोज़ ही अपने ट्वीट के माध्यम से हड़कंप मचाते रहते हैं। ट्रंप दोबारा जीतकर आये तो माना जाना चाहिए कि दुनिया पहले के मुकाबले और कई सालों के लिए अनिश्चितता में ज्यादा घिरी रहेगी। अनिश्चितता का सोने से गहरा रिश्ता है। सोने के भावों में हाल के वक्त की तेजी का मतलब यह नहीं है कि आने वाले दिनों में भी यह तेजी उतनी ही बनी रहेगी। सोने के भावों और शेयर सेंसेक्स की हाल की अवधि की तुलना भले ही यह निष्कर्ष निकाल दे कि सोने के भाव सेंसेक्स के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ते हैं, पर यह भी देखा जाना चाहिए दीर्घकाल यानी पांच और सात सालों की अवधि के आंकड़े बताते हैं कि सोने के भाव कुछ थोड़ी अवधि में तेज होकर दीर्घकाल में फिर उतनी तेजी नहीं दिखाते। पर यह भी देखना चाहिए कि ग्लोबल स्तर पर अनिश्चितता अगर कम नहीं होती तो सोने के भावों में नरमी नहीं आने वाली।

सोना और अनिश्चितता
सोने के भाव तब बहुत तेजी से बढ़ते हैं, जब अनिश्चितता का माहौल होता है। अनिश्चितता की करेंसी सोना है-आर्थिक जगत में यह कहावत चलती है। ट्रेड वॉर जब होता है तो किसी करेंसी में कमज़ोरी आने की आशंका होती है, किसी करेंसी में मजबूती आने की उम्मीद होती है। पर सोना ऐसा आइटम है, जिसमें तेज़ गिरावट आने की आशंका आम तौर पर नहीं होती है। अनिश्चितता में सोने की मांग बढ़ जाती है। अमेरिका और चीन के ट्रेड वार में मारधाड़ कुछ कम तो हुई है, पर इसके खत्म होने की सूरत दिखायी नहीं दे रही है। इसलिए संभव है कि आगामी महीनों में सोना फिर तेजी का रुख दिखा दे। सीरिया से जुड़े अमेरिका और रूस के टकराव बढ़ गये तो फिर दुनिया में एक अनिश्चितता का माहौल बन जायेगा। तो सोने का अनिश्चितता से गहरा रिश्ता है। अनिश्चितता में तमाम केंद्रीय बैंक सोने का भंडार बढ़ाने लगते हैं। जब ग्लोबल सोना बाजार में केंद्रीय बैंक सोना खरीदने जाते हैं तो जाहिर है भाव तेजी से ऊपर जाते हैं। केंद्रीय बैंक ग्राम या किलो में सोना नहीं खरीदते, वो टनों में खरीदते हैं।

केंद्रीय बैंक और सोना
अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ने के बीच दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीदारी बढ़ा दी है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया के सेंट्रल बैंकों ने 2019 की पहली छमाही में 374.1 टन सोने की खरीदारी की है। इसमें से भी 224.4 टन सोने की खरीदारी दूसरी तिमाही में हुई है। सबसे ज्यादा सोना खरीदने वालों में तुर्की, कजाकिस्तान, चीन और रूस के केंद्रीय बैंक शामिल हैं। भारत का केंद्रीय बैंक यानी आरबीआई भी सोने की खरीदारी में इनसे ज्यादा पीछे नहीं है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की जून की रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए वित्त वर्ष 2018- 2019 में 52.3 टन सोने की खरीदारी की थी। इसके साथ आरबीआई सबसे ज्यादा सोना रखने वाले दुनिया के 10 सबसे बड़े सेंट्रल बैंकों में शुमार हो गया।
तमाम केंद्रीय बैंक सोना इसलिए खरीदते हैं कि वो अपनी मजबूती को लेकर संदेश दे सकें। जिस केंद्रीय बैंक के पास जितना ज्यादा सोना होगा, उसकी हैसियत दुनिया में उतनी ज्यादा मजबूत मानी जायेगी। किसी और करेंसी में तेज उतार-चढ़ाव संभव है। सोने के भाव तेजी से नीचे नहीं जाते। सोना अपने आप में ग्लोबल करेंसी है। जितनी ज्यादा ग्लोबल करेंसी जिस केंद्रीय बैंक के पास होती है, उसकी वित्तीय क्षमता उतनी ही ज्यादा मजबूत आंकी जाती है। भारत समेत तमाम देशों के केंद्रीय बैंक लगातार सोने की खरीद में व्यस्त हैं।

सोने की मांग में मज़बूती का भविष्य
ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड बैंकिंग ग्रुप (एएनजी) ने सोने की खरीदारी के इस ट्रेंड के आगे भी बरकरार रहने की संभावना जताई है। ग्रुप ने एक नोट में कहा, ‘मौजूदा परिस्थितियों में इमर्जिंग मार्केट्स की करंसीज पर दबाव बढ़ने की काफी संभावना है। ऐसे में रूस, कजाकिस्तान, तुर्की और चीन डॉलर के दबाव को कम करने के लिए अपने पोर्टफोलियो में सोने की मात्रा बढ़ा सकते हैं।’ नोट में कहा गया है कि इस साल दुनिया भर के केंद्रीय बैंक 650 टन से ज्यादा सोने की खरीदारी कर सकते हैं। ज़ाहिर है यह मांग भी सोने की कीमतों पर असर डालेगी।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से तमाम केंद्रीय बैंक ज्यादा सोना खरीदते हैं। उन्हें लगता है कि सोने के भाव बढ़ेंगे, तो उनके भंडार भी ज्यादा मजबूत होंगे। ग्लोबल मंदी में तमाम कारोबार, तमाम अर्थव्यवस्थाएं भले ही सुस्त हो जायें, पर सोने में सुस्ती नहीं आती। बल्कि मंदी वाली अर्थव्यवस्थाओं में सोना तेजी से दौड़ता है। इस बात का उदाहरण भारत में देखा जा सकता है।

मूडीज़ का अनुमान
ग्लोबल एजेंसी मूडीज़ इंवेस्टर्स सर्विसेज़ ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान 6.20 से घटाकर 5.80 प्रतिशत कर दिया। मूडीज़ के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती से काफी प्रभावित है और इसके कुछ कारक लंबे समय तक असर डालने वाले हैं। मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सुस्ती का कारण निवेश में कमी है। सिर्फ मूडीज़ ही नहीं, तमाम दूसरे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में भी भारत की भविष्य की विकास दर को पहले के मुकाबले कम आंककर दिखाया है। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था में एक मंदी का भाव पक्के तौर पर देखा जा रहा है। मंदी और अनिश्चितता में सोने की चमक बढ़ जाती है। मसला सिर्फ भारत की मंदी का नहीं है, सोने की ग्लोबल मांग बढ़ रही है, जैसा तमाम केंद्रीय बैंकों की स्वर्ण खरीद से पता लगता है।

ग्लोबल मंदी का असर
भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती का ताल्लुक ग्लोबल मंदी से भी है। हाल में आये निर्यात के आंकड़े भी सुस्ती का रुख दिखा रहे हैं। सितंबर में भारत का निर्यात 6.57 फीसदी घटकर 26 अरब डॉलर पर रहा। निर्यात में कमजोरी की बात करें तो सितंबर में पेट्रोलियम, इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स, लेदर, केमिकल और रत्न एवं आभूषण जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कमजोरी दर्ज की गयी। सुस्त ग्लोबल अर्थव्यवस्था में जाहिर है कि तमाम आइटमों के खरीदार कम ही मिलेंगे। ऐसी सूरत में तमाम कारोबारों में जब मंदी का रुख दिख रहा हो तब तमाम निवेशक, तमाम उद्योगपति अपनी रकम को कहीं और लगाने के बजाय सोने में लगाना सुरक्षित समझते हैं। सोने में जब रकम जाती है तो सोने की मांग बढ़ती है। सोने की मांग बढ़ती है तो उसके भाव ऊपर की ओर जाते हैं। इसलिए मंद होती अर्थव्यवस्था में भी सोने के भावों में तेजी दिख जाती है। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) ने अपने हालिया आकलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को 3.6 पर्सेंट से घटाकर 3.5 पर्सेंट कर दिया था। तेजी से छलांग लगाती चीनी अर्थव्यवस्था तमाम संकटों का सामना कर रही है और उसके विकास की रफ्तार तीन दशकों में सबसे कम है। तो कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं कि सोने के भावों में निकट भविष्य में तेज़ी का रुख कायम रहेगा। सोने की चमक निकट भविष्य में तेज़ी से कम होती दिखायी नहीं देती क्योंकि ग्लोबल अनिश्चितताओं के कम होने के आसार ज्यादा दिखायी नहीं देते।


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