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कालापानी पर कूटनीति

Posted On November - 25 - 2019

केंद्र सरकार ने हाल ही में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद औपचारिक रूप से देश का एक नक्शा जारी किया। इसमें कालापानी और लिपुलेख इलाक़ों को भारत के अंदर दिखाया गया है। इसे लेकर नेपाल भड़का हुआ है। उसका दावा है कि ये इलाके उसके हैं। हालांकि, भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि नये नक्शे में नेपाल से लगे किसी सीमाई इलाके को संशोधित नहीं किया गया है। दरअसल, अब तक कालापानी विवाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का मुखर एजेंडा रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह नेपाली कांग्रेस के लिए भी राजनीति चमकाने का अवसर बन गया है…

पुष्परंजन

केपी शर्मा ओली की कुंडली में चैन से सोना नहीं लिखा है। उन्हें इस अग्नि परीक्षा से गुजरना है कि वास्तव में वे राष्ट्रवादी हैं। उन पर नेपाली कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउबा ने तंज़ किया है, ‘ओली का राष्ट्रवाद कालापानी पहुंचते ही समर्पणवाद में बदल जाता है। वे केवल चुनाव जीतने तक राष्ट्रवादी होते हैं।’ शुक्रवार को पोखरा की एक सभा में नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री देउबा की ऐसी टिप्पणी से ओली तिलमिलाये हुए हैं। देउबा ने पश्चिमी नेपाल के सबसे बड़े मेट्रो शहर पोखरा में ऐसा बयान देकर अपनी रणनीति ज़ाहिर कर दी है। नेपाली कांग्रेस कालापानी के बहाने कम्युनिस्ट सरकार पर हमलावर है। पश्चिमी नेपाल का यह इलाका कालापानी विवाद को लेकर अतिसंवेदनशील है, नेपाली कांग्रेस यहां अपनी ज़मीन उर्वर करने की ताक में है।
कुछ वर्षों से बोतल में बंद जिन्न को बाहर निकलने की कहानी, तीन सप्ताह पहले 2 नवंबर 2019 से शुरू होती है। उस दिन भारत सरकार ने नेपाल सीमा को दर्शाता एक नक्शा प्रकाशित किया था। नक्शे में ऐसा कुछ नया नहीं था, जिसे कहा जाए कि उसमें कोई स्थान जोड़ा, या हटाया गया। मगर, नेपाली मीडिया ने ऐसा हौवा खड़ा किया, गोया भारत ने पश्चिमोत्तर सीमा से लगे नेपाली हिस्से वाले दार्चुला, लिंपियाधुरा को निगल लिया है। इस रिपोर्ट के बाद स्वाभाविक था कि सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक पर आग लगती। केपी शर्मा ओली सरकार भी व्यापक विरोध को लेकर दबाव में थी। या यूं कहें, पहले आग लगाई, फिर उसमें स्वतः घिर गये।
वहां की मीडिया ने इतिहास-भूगोल को आधार बनाकर वे तमाम दावे किये, जिससे काली नदी के भारत वाले हिस्से को नेपाली भू-भाग मान लेने की ग़लतफहमी आम नेपालियों में पैदा होने लगी। 7 नवंबर को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्पष्ट किया कि नये नक्शे में नेपाल से लगे किसी सीमाई इलाके को हमने संशोधित नहीं किया है। इस नक्शे में पूरी एक्यूरेसी के साथ भारतीय भूभाग को चित्रित किया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का स्पष्ट आशय था कि नक्शे के पुनर्प्रकाशन में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। कश्मीर, लद्दाख के नक्शे को जारी करने का कारण तो समझ में आता है, मगर कालापानी से संबंधित नक्शे को जारी करना क्यों ज़रूरी था? इसका उत्तर भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से नहीं मिल रहा है।
नेपाल की ओली सरकार ने नक्शा जारी होने के 5 दिन बाद बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि नेपाल सरकार अपनी अंतर्राष्ट्रीय सीमा की रक्षा के लिये कृतसंकल्प है, मित्र देशों से सीमा संबंधी किसी विवाद को हम ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सुलझाने का प्रयास करेंगे। इस 5 दिनों की देरी से लगता है कि ओली सरकार जानबूझकर इस विवाद की आग को भड़काना चाह रही थी। काला पानी दरअसल प्रधानमंत्री ओली का पुराना एजेंडा रहा है। इसे कभी माओवादियों ने भी मुखर किया था। प्रधानमंत्री ओली नवंबर 2019 में कालापानी विवाद पर 10 दिन के भीतर 2 बार भड़काऊ बयान दे चुके हैं। पहले कहा कि भारत को कालापानी की एक इंच ज़मीन नहीं देंगे। 18 नंवबर को कहा कि उस इलाके में तैनात सेना को भारत हटा ले, वरना उन्हें हटाने की कार्रवाई हम करेंगे।
आखि़र, ओली किसके बूते इस तरह का बयान दे रहे हैं कि भारतीय सेना को हटाने की कार्रवाई हम करेंगे? उनका सरपरस्त चीन, इस समय कालापानी विवाद पर बिलकुल तटस्थ भाव से खड़ा है। कालापानी विवाद कोई साठ साल पुराना है। साठ वर्षों में चीन ने एक बार भी नेपाल की दावेदारी का समर्थन ऑन द रिकार्ड नहीं किया है। 1961, 1997 और 1998 ये तीन ऐसे कालखंड हैं, जो कालापानी विवाद की दृष्टि से उल्लेखनीय़ हैं। ‘नेपालः स्ट्रेटेजी फाॅर सर्वाइवल‘ के लेखक और जाने-माने अमेरिकी स्काॅलर लियो इ रोज़ ने माना था कि यह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का पुराना एजेंडा रहा है। यह ध्यान में रखने की बात है कि सितंबर 1961 में जब कालापानी विवाद उठा था, उस समय तत्कालीन सरकारों ने तय किया था कि द्विपक्षीय बातचीत के आधार पर हम इसे सुलझा लेंगे।
शुक्रवार, 22 नवंबर 2019 को नेपाली दैनिक ‘कांतिपुर’ में ध्रुव कुमार का ‘कालापानी ः अ फेट अकम्प्ली’ शीर्षक से एक आलेख छपा। इसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं। 26 साल से भारत-नेपाल के बीच जारी सीमांकन सर्वे अभी समाप्त नहीं हुआ है। लेखक के अनुसार, ‘भारत-नेपाल संयुक्त प्राविधिक समिति ने 26 वर्षों का समय लगाकर 182 स्ट्रीट मैप के साथ 98 प्रतिशत रेखांकन का कार्य संपन्न किया है। इसमें दो फीसद कार्य कई वर्षों से बाक़ी है।’ वो अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ? इस सवाल को घ्रुव कुमार ने उठाया है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा नक्शे को लेकर है। ध्रुव कुमार की मानें, तो नेपाल ने 1816 में हुई सुगौली संधि को आधार मानकर उसके अनुच्छेद 3 को बहस के केंद्र में रखा है। लेखक के अनुसार, ‘अनुच्छेद तीन में काली नदी पूर्व के भू-भाग को नेपाल का हिस्सा माना गया है। ध्रुव कुमार ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि यदि ऐसा था तो नेपाल सरकार को अबतक ऐतिहासिक प्रमाण को आधार बनाकर भौगोलिक व राजनीतिक मानचित्र प्रकाशित करना चाहिए था, जो अब तक देखने को नहीं मिलता। ध्रुव कुमार के मुताबिक, ‘लिम्पियाधुरा पूर्व के भूभाग का अस्तित्व तक नेपाल के मानचित्र में देखा नहीं गया।’
भारत के पक्ष में जो बात सबसे मज़बूत है, वह 1950 की संधि को देखने के बाद साफ हो जाती है। 1950 में हुई भारत-नेपाल संधि के अनुच्छेद आठ में स्पष्ट कहा गया है कि इससे पहले ब्रिटिश इंडिया के साथ जितने भी समझौते हुए, उन्हें रद्द माना जाए। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण बिंदू है, जो कालापानी के सारे दावे पर पानी फेर देता है। नेपाल चाह कर भी इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ले जाने की स्थिति में नहीं है। 1992 में चीन और भारत ने लिपुलेख दर्रे से व्यापारिक मार्ग खोला था। कैलास मानसरोवर के जाने के वास्ते भी इस मार्ग का इस्तेमाल होता रहा है। मई 2015 में प्रधानमंत्री मोदी चीन गये थे, उस समय लिपुलेख में एक व्यापारिक पोस्ट खोले जाने पर सहमति हुई थी। नेपाल ने तब भी इस पर असहमति दर्ज़ की थी। 9 जून 2015 को नेपाल की संसद ने एक प्रस्ताव के ज़रिये चीन और भारत के बीच इस मार्ग को खोले जाने पर आपत्ति की थी। उस समय नेपाली कांग्रेस के नेता सुशील कोइराला प्रधानमंत्री थे।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में अवस्थित लिपुलेख दर्रा उस भू-सामरिक त्रिकोण पर है, जहां तिब्बत, भारत और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। महाकाली नदी पर अवस्थित नेपाल वाले हिस्से को ‘कालापानी’ और ‘दार्चुला’ बोलते हैं, और सीमा पार भारत में इसका नाम है, ‘धार्चुला’! 1962 के युद्ध के बाद से यहां पर इंडो-तिब्तन फोर्स की तैनाती भारत ने कर रखी है, नेपाल इसे हटाने की मांग कई बार कर चुका है। यहां पर जून से सितंबर के बीच व्यापार के वास्ते मार्ग खुला रहता है। डोकलाम विवाद के बाद कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए जून 2017 में नाथू-ला मार्ग को बंद कर लिपुलेख दर्रे को खोला गया है।
नेपाल किसी भी सूरत में कालापानी विवाद को बनाये रखना चाहता है। डोकलाम विवाद के समय चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने धमकी दी थी कि यदि डोकलाम संकट का समाधान भारत नहीं करता है, तो चीन कालापानी में दखल देना आरंभ करेगा। कालापानी पर नेपाली दावेदारी वाली बात को ओली आगे बढ़ायें, इस पर नेपाल के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों ने सहमति व्यक्त की थी। डेढ़ साल पहले 23 जून 2018 को पीएम ओली पेइचिंग में थे। अपनी चीन यात्रा के दौरान पीएम ओली ने कालापानी पर नेपाली हक पाने का सवाल भी उठाया था।
अब तक कालापानी विवाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का मुखर एजेंडा रहा है, लेकिन कुछ वर्षों से यह नेपाली कांग्रेस के लिए भी राजनीति चमकाने का अवसर बनता जा रहा है। नेपाली कांग्रेस के प्रमुख व पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा का राष्ट्रवाद स्वतःस्फूर्त रूप से नहीं जगा है। उनके पूर्ववर्ती स्वर्गीय सुशील कोइराला इसका बीजारोपण संसद तक में कर गये थे। 10 दिन पहले नेपाली कांग्रेस के सांसद दिल संग्रोला ने बयान दिया है कि नेपाल की जनता कालापानी, लिपुलेख और लिपिंया धुरा को कभी भी भारतीय नक्शे में देखना स्वीकार नहीं करेगी। ऐसा लगता है, नेपाली कांग्रेस ने राष्ट्रवादी चेहरा बनाने के वास्ते कालापानी को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ इस खेल में पीछे क्यों रहें? पश्चिमी नेपाल के दांग में ‘प्रचंड’ ने पत्रकारों से कहा, ‘कालापानी पर एकतरफा फ़ैसला लिया गया था। ओली सरकार और राजनीतिक दल इसे गंभीरता से लें।’ अर्थात, आग कहां से फैली है, उसे ढूंढ़ने के लिए इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है!

काली नदी का उद‍्गम स्थल
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में अवस्थित कालापानी उस त्रिकोण पर है, जहां चीन और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। यह इलाका काली नदी का उद्गम स्थल है। भारत-नेपाल की अधिकतर सीमाएं नदियों से बंटी हैं। काली नदी पार नेपाल का दार्चुला ज़िला है और इस पार भारत का हिस्सा धारचुला। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले के अंतर्गत आने वाला धार्चुला नगर पंचायत है। 1962 के युद्ध के बाद से इस जगह पर इंडो-तिब्बतन पुलिस की तैनाती है। तिब्बत की तरफ जाने वाला लिपुलेख दर्रा यहां से 17 किलोमीटर की दूरी पर है। दरअसल, नेपाल की दावेदारी पश्चिमी सीमा से लगे साढ़े 5 वर्ग किलोमीटर वाले ‘लिपु गद‘ को लेकर है। वह चाहता रहा है कि सामरिक महत्व वाला लिपुलेख दर्रा इस बहाने उनके हिस्से आ जाए, जिससे तिब्बत के लिए सबसे निकट का मार्ग नेपाल को हासिल हो जाए। इससे उलट भारतीय सर्वे अधिकारी 1830 का नक्शा पेश करते रहे, जिसमें पिथौरागढ़ उस ज़माने के अल्मोड़ा ज़िले में आता था। कालापानी और पिथौरागढ़ 1830 के दौर में अल्मोड़ा ज़िला प्रशासन द्वारा नियंत्रित होता था, ये सारे दस्तावेजी प्रमाण उभयपक्षीय बातचीत में प्रस्तुत होते रहे।

विवाद का आधार  सुगौली संधि
बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले में एक विधानसभा क्षेत्र है, सुगौली। भारत-नेपाल के इतिहास की चर्चा जब भी होती है, इस जगह के ज़िक्र के बिना अधूरी मानी जाती है। यहां 2 दिसंबर 1815 को ब्रिटिश भारत और नेपाल के अधिकारियों ने सीमा विवाद को समाप्त करने के वास्ते एक संधि की थी, जिसे सुगौली संधि के नाम से हम सब जानते हैं। इस संधि के 3 महीने बाद, संधि के कार्यान्वयन के लिए 4 मार्च 1816 को नेपाल के मकवानपुर में नेपाल की ओर से चंद्रशेखर उपाध्याय और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने सुगौली संधि के दस्तावेज एक-दूसरे को सौंपे थे। ये कागज़ात भी 1961 के बाद वाली भारत-नेपाल उभयप़क्षीय बैठकों में रखे जाते। सुगौली संधि के अस्तित्व में आने तक पूर्व में दार्जिलिंग और तिस्ता, दक्षिण-पश्चिम में नैनिताल, पश्चिम में कुमाऊ राजशाही, गढ़वाल राजशाही, और बाशहर जैसे क्षेत्र नेपाल के अधीन आते थे। इन क्षेत्रों को 25 वर्षों में समय-समय पर युद्ध के दौरान नेपाल ने जीता था, जिसे संधि के बाद उसे ब्रिटिश भारत को लौटाना पड़ा। बदले में ब्रिटिश इंडिया ने नेपाल को मेची से पिथौरागढ़ तक तराई की लंबी पट्टी सौंपी थी। इसमें ऐतिहासिक कपिलवस्तु का एक बड़ा हिस्सा और पूर्व में मिथिलांचल का प्रशस्त उपजाऊ भूभाग नेपाल के हिस्से आ गया। मगर, इससे नेपाल का पेट भरा नहीं। एक सदी बीत जाने के बाद, सुगौली संधि की तमाम शर्तों पर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने किंतु-परंतु की राजनीति शुरू की। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पौडेल ने 2013 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में स्वीकार किया कि नेपाल-भारत के बीच 54 स्थानों पर जो सीमा विवाद है, उसकी जड़ें सुगौली संधि से जुड़ी हैं। प्रोफेसर पौडेल ने ज्ञान दिया कि इस विवाद को निपटाने के वास्ते हम संयुक्त राष्ट्र की मदद क्यों न लें? इससे समझा जा सकता है कि नेपाल का थिंक टैंक पहले से एक ख़तरनाक इरादे की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था। ये ख़तरनाक इरादे बस एक ही नुक्ते से ध्वस्त हो जाते हैं, वह है 1950 की भारत-नेपाल संधि का अनुच्छेद आठ। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि इससे पहले ब्रिटिश इंडिया के साथ जितने भी समझौते हुए, उन्हें रद्द माना जाए।


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