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कविताओं में प्रतिरोध के मुखर स्वर

Posted On November - 10 - 2019

पुस्तक समीक्षा

सुभाष रस्तोगी

अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी कविता के कुछ ऐसे प्रमुख कवियों में से हैं, जिन्होंने बीती सदी के नौवें दशक में हिंदी कविता के मुहावरे में आमूल-चूल बदलाव उपस्थित किया। ऐसे कठिन समय में जब हिंदी कविता निरंतर आत्म केंद्रित होती जा रही थी, तब उन्होंने परंपरित भारतीय परिवार की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले माता, पिता, भाई-बहन और भौजाई के व्यक्तित्व की विराटता, व्यापकता, लेकिन निरीहता को हिंदी कविता के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। संवेदना के यह तरल चित्र आज भी हिंदी कविता की अमूल्य निधि के रूप में स्वीकारे जाते हैं। ऐसे ही संवेदना के कुछ हरियावल चित्र उदयप्रकाश, चंद्रकांत देवताले की हिंदी कविता की धरोहर के रूप में सामने आये हैं।
आज जब लोकतंत्र में कई गैर लोकतांत्रिक तरीकों से असहमति को दबाए जाने का एक सुनियोजित अभियान चल रहा है, तब अशोक वाजपेयी का यह सद्य: प्रकाशित सोलहवां संग्रह ‘कम से कम’ की कुल 28 कविताएं असहमति, प्रतिरोध और स्वतंत्रता, समता, न्याय की गहरी पक्षधरता के रूप में सामने आया है। इन कविताओं में नैतिक निर्भीकता, सच्चाई का तीखा बयान तो दर्ज है ही, अपने समवेत पाठ में आत्मनिरीक्षण इनका सबसे जरूरी तत्व है। देखें ‘खौफ’ कविता की यह पंक्तियां इस सच्चाई का एक जीवंत साक्ष्य हमारे समक्ष उपस्थित करती हैं—‘लिखो/ताकि अपनी मृत्यु के कई सदियों बाद/तुम्हारे वंशज यह पहचान पायें/कि भयावह राख के समय/उनके एक पुरखे ने याद रखने/दर्ज करने, बोलने की कोशिश की थी।’ कवि की मानें तो ‘कम से कम’ की कविताएं ज्यादा से ज्यादा मानवीय बने रहने का अभ्यास हैं। वे इसका साक्ष्य हैं कि कठिन से कठिन समय में कविता में मनुष्य बने रहने की संभावना की जगह होती है।’ देखें यह पंक्तियां जो इस सत्य का आईना बने रहने का साक्ष्य हैं—‘काल से हारता है जीवन, पर समय से नहीं/सच्चाई से हारते हैं सपने, पर अपमान से नहीं हम बहुत पहले जान गए थे कि हम जीत नहीं पायेंगे/और हमें पता था कि हमारी हार तय है। पर मनुष्य होने की भोली मूर्खता से हम फिर भी/यह मानते रहे कि चीजें बेहतर होंगी।’
कवि प्रतिबद्ध है कि ‘बस कैसे करूं/अभी कई बुझी हुई/मोमबत्तियों को फिर से जलाना है/थके-हारों को घर पहुंचाना है/गुलमोहर की शाखा पर बैठी चिड़िया से बात करना है/बस कैसे करूं?’
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लोकतांत्रिक तरीकों से कुछ इस तरह से अदृश्य पहरे बिठाये गये हैं कि यह तय करना भी मुश्किल हो गया है ‘कि जो दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक दे रहा है/वह कोई पड़ोसी है या कि कोई हत्यारा/जिसे पता चल गया है कि हम किस तरफ हैं।’
संग्रह के प्रारंभ में एक पंक्ति की कुछ नौ कविताएं संगृहीत हैं जो एक अभिनव प्रयोग के रूप में सामने आई हैं। इन कविताओं में व्यंग्य कमाल का है जो पाठक की संवेदना को गहरे में उद्वेलित कर देता है। देखें व्यंग्य की व्यंजना को चरितार्थ करती यह एक पंक्ति की ऐसी ही एक कविता, ‘अधेड़ आंखें, झुर्रियों भरा माथा, हम हर दिन नया-युवा संसार देखते हैं।’
उनकी इस संग्रह की कमोबेश सभी कविताएं प्रतिरोध के सत्य की पुख्तगी से पुष्टि करती हैं। देखें यह पंक्तियां—‘क्षमा करो नागरिको/कि नृशंसता, निरपराध को मारने की तुम्हारी अद‍्भ्ाुत वीरता में/मैं अपनी कायरता के कारण शामिल नहीं हूं।’
पुस्तक : कम से कम लेखक : अशोक वाजपेयी प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली पृष्ठ : 71 मूल्य : रु. 295.


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