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कमज़ोर कहानी लचर निर्देशन

Posted On November - 16 - 2019

असीम चक्रवर्ती

कृष्णा अभिषेक ने एक फिल्म बनाई है ‘मैं मरना चाहता हूं।’ इस फिल्म की सर्वेसर्वा उनकी पत्नी कश्मीरा शाह हैं, जिन्होंने इस फिल्म में अपने छोटे भाई को हीरो बनाया है। जिस फिल्म की राइटर-डायरेक्टर कश्मीरा शाह है, उसका क्या हश्र होगा? इसके बारे में कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है। फिलहाल यह फिल्म किसी भी तरह से बिकने का नाम नहीं ले रही है।

साज़िद का तमाशा
असल में इन दिनों कैसे-कैसे मंजर सामने आने लगे हैं कि कोई भी फिल्म डायरेक्ट करने लगा है। यह फिल्म निर्देशन का सबसे खराब दौर चल रहा है। जिसके चलते कैप्टन आॅफ द शिप यानी फिल्म का डायरेक्टर महज़ कठपुतली बनकर रह गया है। अब जैसे कि हाल ही में दर्शकों को साजिद नाडियाडवाला की बेसिर-पैर की काॅमेडी फिल्म ‘हाउसफुल-4’ को लेकर माथा पीटते हुए देखा गया। काॅमेडी के नाम पर ऐसी प्रस्तुति दर्शक पहले भी काफी झेल चुके हैं। तीन-चार लोगों के संयुक्त प्रयास से इस फिल्म की सारी स्कि्रप्ट सिर्फ टॉयलेट ह्यूमर के आसपास घूमती है।

कहां गया स्वर्णिम दौर
ऐसे में पुरानी फिल्मों के उस स्वर्णिम दौर की याद ताज़ा हो जाती है,जब फिल्म की स्कि्रप्ट को भगवान की तरह पूजा जाता था। मगर हाल फिलहाल के वर्षों में फिल्म की स्कि्रप्ट का पतन निरंतर हुुआ है। जाहिर है इस पतन के लिए निर्देशक ही पूरी तरह से जि़म्मेदार हैं। ज्यादा उदाहरण न देकर इसके लिए ज्यादा नहीं, हाल के एक वर्ष की फिल्मों का जायज़ा लेना ही बेहतर होगा। साहो, जजमेंटल है क्या, जग्गा जासूस, हैरी मेट सेजल, फितूर, केदारनाथ, हाॅफ गर्लफ्रेंड, मुन्ना माइकल, फैन, ट्यूब लाइट, रईस, बेगम जान, ओके जानू, मेरी प्यारी बिंदु , डियर जि़ंदगी, राब्ता, गेस्ट इन लंदन, इंदु सरकार किन-किन फिल्मों का जिक्र करें। इन सारी फिल्मों की विफलता में बेतरतीब स्िक्रप्ट का बड़ा हाथ था। अब ताज़ा रिलीज़ हाउसफुल-4, साहो, जजमेंटल है क्या भी ऐसी निकृष्ट फिल्में साबित हुई हैं।

फिल्म शुरू होने से पहले ही पूरी
हिंदी फिल्मों के एक बड़े निर्माता के संबंध में एक रोचक घटना का जिक्र करना बहुत ज़रूरी है। कुछ साल पहले जब स्पिलबर्ग अपनी फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ की धमाकेदार सफलता के बाद आराम फरमा रहे थे,उनके एक मित्र ने पूछा था-आप अपनी नयी फिल्म कब शुरू कर रहे हैं? तब स्पिल का जवाब था-वह तो नब्बे प्रतिशत पूरी हो चुकी है। मित्र को उनसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। क्योंकि उसने कभी नहीं सुना था कि स्पिल अपनी फिल्म की शूटिंग शुरू कर चुके हैं। इसलिए उसने फिर जिज्ञासा व्यक्त की-पर तुम्हें तो कभी शूटिंग करते हुए नहीं सुना। इस पर स्पिल का जवाब बहुत चौंकाने वाला था-बाउंड स्िक्रप्ट के साथ ही हर शाॅट की बोर्डिंग फाइनल कर ली है। अब तो सिर्फ बीस प्रतिशत काम ही बाकी है,जो मुझे शाॅट लेकर ही पूरा करना है।

स्कि्रप्ट दिमाग में
बर्फी के बाद खुद की तारीफ में लिप्त निर्देशक अनुराग बसु से फिल्म की स्कि्रप्ट का जिक्र चलने पर बहुत इतराते हुए कहा था कि वह कभी फिल्म की बाउंड स्कि्रप्ट नहीं लिखते हैं और न ही उन्हें बाउंड स्कि्रप्ट के साथ फिल्म बनाना पसंद है। मगर उनकी फिल्म ‘जग्गा जासूस’ का जो हश्र हुआ है, उसके बाद से कोई निर्माता उनका प्रोजेक्ट तक नहीं सुनना पसंद कर रहा है।

गलती मानने को तैयार नहीं
निर्देशक इम्तियाज अली की ‘हेरी मेट सेजल’ और आनंद एल राय की ‘जीरो’ की भारी विफलता के बाद एक बड़े डिस्ट्रीब्यूटर ने बड़ी रोचक टिप्पणी की थी-इन डायरेक्टर से हमें बचकर रहना पड़ेगा। ये बिना स्कि्रप्ट के एक बकवास फिल्म बनाकर हमें उबा देते हैं। ठीक भी है शाहरुख-अनुष्का और कैट जैसे धाकड़ एक्टर को लेकर भी यह एकदम बोरिंग फिल्म बनाते हैं। शाहरुख तो अब इन डायरेक्टरों से इतने खफा हैं कि उन्होंने पिछले दस माह से इनसे मिलने तक की ज़हमत नहीं उठाई है।

संतुलित स्कि्रप्ट की जीत
अभिनेता रितिक रोशन की इस बात के लिए तारीफ होनी चाहिए कि वह अमूमन अपनी फिल्म की स्कि्रप्ट को लेकर बहुत सजग रहते हैं। यही वजह है कि उनकी हाल फिलहाल की सब्जेक्ट बेस्ड फिल्म ‘सुपर-30’ भी सच्चाई शिद्दत से बयान करती है। इसके चलते ही उनकी पिछली एक हल्की-फुल्की थ्रिलर फिल्म ‘काबिल’ भी 120 करोड़ का बिजनेस आसानी से कर लेती है। वैसे रितिक ने मोहनजोदड़ो जैसी फ्लॉप फिल्म में भी काम किया है, पर इस फिल्म की स्कि्रप्ट पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं उठता है। यह फिल्म सिर्फ अपनी धीमी प्रस्तुति की वजह से पिटी। रितिक की इस समझ पर उनके व्यावसायिक निर्देशक पिता राकेश रोशन का बड़ा हाथ
रहा है।

शाहरुख की बड़ी-बड़ी बातें
शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि शाहरुख फिल्म की स्कि्रप्ट की बात बढ़-चढ़कर करते हैं। पर उनका पूरा फिल्म करिअर देख लीजिए, चक दे इंडिया, पहेली जैसी एकाध फिल्मों की बात जाने दें तो उन्होंने ऐसी फिल्मों में ज्यादा काम किया, जिनमें उनका मैनरिज्म तो हावी रहा, पर स्कि्रप्ट गायब थी। ‘हैरी मेट सेजल’ ही नहीं, ‘फैन’, ‘डियर जिंदगी’, ‘रईस’ फिल्मों ने भी इस मामले में उन्हें ज़बरदस्त धोखा दिया है।
सतर्क हैं अक्षय
दर्शक अभी से यह उम्मीद कर रहे हैं कि अक्षय कुमार की नयी फिल्म गुड न्यूज़ कितनी भी साधारण हो, इसमें भी सुव्यस्थित ढंग से एक कहानी देखने को मिलेगी। इधर कुछ वर्षों से, खासतौर से ऐसा देखने को मिल रहा है कि अक्षय अपनी फिल्म की स्कि्रप्ट को लेकर बहुत सजग हैं। इसके लिए उनकी फिल्म बेबी, एयरलिफ्ट, जाॅली एलएलबी-2 का उदाहरण दिया जा सकता है। बावजूद इसके अपनी नई फिल्म ‘हाउसफुल-4’ में उनके निर्देशक साजिद नाडियाडवाला उन्हें पूरी तरह से मूर्ख बना देेते हैं।

शब्बीर खान कितना बोर करेंगे
‘मुन्ना माइकल’ में टाइगर श्राफ नहीं चले। मगर ‘वाॅर’ में वह बच निकले। पर इसमें लेखक आदित्य चोपड़ा, शब्बीर टायरवाला जैसे लेखकों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जिन्होंने एक अंट-शंट-सी कहानी को किसी तरह से खड़ा कर दिया। वैसे इस फिल्म के निर्देशक सिद्धार्थ स्कि्रप्ट के मामले में एकदम शून्य हैं। पर टाइगर के प्रिय निर्देशक शब्बीर खान की बात करें तो उनका साथ मिलने के बाद ऐसा ही होगा। आखिर टाइगर कब तक एक नाकाबिल निर्देशक शब्बीर खान की अधपकी स्कि्रप्ट के साथ आगे बढ़ेंगे। उल्लेखनीय है कि शब्बीर खान को प्रमोट करने के लिए बड़े निर्माता साजिद नाडियाडवाला आगे रहते हैं। हीरोपंती के बाद उन्हें नए दौर के स्टार टाइगर श्रॉफ का बड़ा सहारा मिला था। पर अब ऐसा नहीं लगता कि ‘बागी’, ‘मुन्न्ना माइकल’ के बाद टाइगर उन्हें और ज्यादा दर्शकों को बोर करने का
मौका देंगे।
करण की समझ
स्कि्रप्ट का जिक्र चलने पर निर्देशक करण जौहर अपनी निर्देशित दो फिल्मों कुछ-कुछ होता है और कभी खुशी कभी गम की स्कि्रप्ट का कसीदा पढ़ने लगते हैं। पर अब तो वह बातें अतीत बन चुकी हैं। अब तो करण निर्मित और निर्देशित फिल्मों की स्कि्रप्ट बहुत बकवास होती है। यहां तक कि उनकी पिछली फिल्मों ए दिल है मुश्किल, कलिंगा की स्कि्रप्ट बेहद लचर थी। सच तो यह है कि फिल्म वर्ल्ड में उनका निर्देशन ग्राफ निरंतर गिरा है। पर उनकी पहुंच हैै, इसलिए उनकी निर्मित एक बी ग्रेड की फिल्म ‘कपूर एंड संस’ को भी बेस्ट स्कि्रप्ट का अवार्ड मिल  जाता है।

‘हाफ गर्लफ्रेंड’ क्यों लुढ़की
चेतन भगत का नाॅवेल ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ पढ़ने में बहुत रोचक लगता है। पर फिल्म की स्कि्रप्ट बहुत बकवास है। निश्चित तौर पर इसके लिए निर्देशक मोहित सूरी को जि़म्मेदार ठहराया जाएगा। ज़ाहिर है इस फिल्म के बाद मोहित की निर्देशन क्षमता पर सवालिया निशान उठने लगे हैं।

कहां चूक रहे हैं सलमान
‘ट्यूब लाइट’ की भारी विफलता के बाद ‘भारत’ की औसत सफलता से यह बात साफ हो चुकी है कि अब सलमान को अपनी फिल्म की स्कि्रप्ट पर बहुत ज्यादा ध्यान देना होगा। सिर्फ उनका स्टारडम फिल्म को बचा नहीं सकता। ‘भारत’ में उनकी गांधीवादी इमेज को दर्शकों ने पूरी निर्दयता के साथ खारिज कर दिया। उन्हें तो अब ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी मजबूत स्कि्रप्ट वाली फिल्में चाहिए,जो उनकी इमेज से परफेक्ट मेल खाए।

नीरज का कंट्रोल
एक दूसरे निर्देशक हैं नीरज पांडे। इनकी स्कि्रप्ट सेंस की जितनी भी तारीफ की जाए, कम है। अपनी पहली फिल्म ‘वेडनसडे’ के बाद से ही फिल्म की स्कि्रप्ट की लगाम को उन्होंने बहुत अच्छी तरह से पकड़ रखा है। यकीन न हो तो उनकी सिर्फ एक फिल्म ‘बेबी’ को देख लीजिए। इतनी उलझी हुई कहानी को उन्होंने कितनी कसी हुई पटकथा में बांधा था। इसे कहते हैं स्कि्रप्ट और निर्देशक का कमाल। मगर यही नीरज ‘अय्यारी’ में बुरी तरह चूक गए। उम्मीद है कि अपनी अगली फिल्म जो ‘चाणक्य’ पर बेस्ड है, उसमें वह ऐसी चूक करने से बचेंगे।

स्कि्रप्ट पर भरोसा
चलते-चलते एक बात और…अब तक जितनी भी कल्ट क्लासिक फिल्में बनी हैं,उनमें चुस्त पटकथा का अहम योगदान रहा है। यही वजह थी कि नये दौर के निर्देशक सूरज बड़जात्या भी यह करिश्मा दोहरा पाए। मगर ‘मैंने प्यार किया’ और ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद वह इस बात को भूल गए, जिसका नतीजा ‘प्रेम रतन धन पायो’ के तौर पर सामने आया।


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