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कई अपराध, एक सजा के खिलाफ शीघ्र सुनवाई

Posted On November - 29 - 2019

नयी दिल्ली, 28 नवंबर (एजेंसी)
सुप्रीमकोर्ट भ्रष्टाचार और आतंकवाद के विशेष कानूनों के तहत विभिन्न अपराध के लिये सुनायी गयी सजा एक साथ भुगतने की जगह बारी-बारी से सजा भुगतने का निर्देश देने के लिये दायर याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई के लिये सहमत हो गया। अमेरिका जैसे देशों में अपराधी को विभिन्न अपराधों के लिये सुनायी गयी सजा एक साथ नहीं बल्कि अलग-अलग चलती है। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ ने भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की इस दलील पर विचार किया कि उनकी याचिका पर शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता है। उपाध्याय ने कहा कि र्केन्द्र का जवाब आ चुका है और अब मामला सुनवाई के लिये तैयार है, इसे शीघ्र सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा, ‘मामले को चार हफ्ते बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।’
याचिका में कहा गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के एक प्रावधान के तहत दोषी व्यक्ति अलग-अलग अपराधों के लिए मिली सजा को एक साथ काट सकता है लेकिन यह प्रावधान नृशंस अपराधों के लिए लागू नहीं होना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 31 गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून (यूएपीए), भ्रष्टाचार रोकथाम कानून (पीसीए), बेनामी संपत्ति लेन-देन निषेध कानून, धनशोधन निवारण कानून (पीएमएलए), विदेशी योगदान (विनिमय) कानून (एफसीआरए), काला धन एवं कर चोरी कानून और भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून जैसे विशेष अधिनियमों पर लागू नहीं होनी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि आतंकवाद फैलाकर धन वसूलना ही संगठित अपराध का मकसद है। याचिका के अनुसार यह धन किसी न्यायोचित कार्य पर खर्च नहीं होता बल्कि इसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने के लिये होता है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे अपराध के लिये कठोर दण्ड के प्रावधान किये जाएं। याचिका में कहा गया है कि मकोका के तहत तीन साल से दस साल तक की सजा का प्रावधान है जिसे उम्र कैद में बदला जा सकता है।
विधि विभाग को निर्देश देने का अनुरोध
याचिका में विधि आयोग को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इजराइल और स्पेन के भ्रष्टाचार निरोधक, कानूनों पर विचार करके तीन महीने के भीतर रिपोर्ट तैयार करे। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सफेदपोश अपराधों के लिये कानून में सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं है।


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