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आम आदमी की दुआ पर भारी बाजार

Posted On November - 8 - 2019

तिरछी नज़र

सौरभ जैन
दिल्ली में प्रदूषण का बढ़ता स्तर और मानवीय क्रियाकलापों का गिरता स्तर दोनों ही समान स्पीड से भागे जा रहे है। अंतर सिर्फ इतना है कि प्रदूषण बढ़ रहा है और मनुष्य के क्रियाकलापों का स्तर गिरता जा रहा है। बाकी बढ़ने और गिरने की गति समान ही है। मनुष्य अपनी मनुष्यता को जितना गिराता जाएगा, प्रदूषण उतना ही बढ़ता जाएगा।
मनुष्य का क्या है उसे तो पॉल्यूशन मास्क लगाए सेल्फी लेने में भी आनंद आता है। बात ज्ञान की है इसलिए टीवी वाले यह सब नहीं बताते। क्योंकि काम की बात बताने के दाम उन्हें कोई नहीं देता। टीआरपी की पहली शर्त ही बकवास करना और करते ही रहना है। चंद्रयान-2 के समय अंतरिक्ष यात्री का यूनिफॉर्म पहने खबर सुनाने वाले खबरवाचक महोदय से हम पूरी उम्मीद करते हैं कि वे अब पॉल्यूशन मास्क लगा कर खबरें दिखाएंगे। इस दौरान यदि स्वास्थ्य आपातकाल के साथ नेताओं की बयानबाजी पर भी एमरजेंसी लगा दी जाए तो प्रदूषण पर आधा नियंत्रण तो ऐसे ही स्थापित हो सकता है।
दिल्ली वाले इस समय सिर्फ प्रदूषण से ही दुखी नहीं है बल्कि हर उस ज्ञान से दुखी है जो दूसरे प्रान्त के लोग अपने-अपने घरों में बैठकर उन्हें दे रहे है। मुंबई में एक शख्स दिल्ली के प्रदूषण पर ट्वीट करते हुए चेम्बर में गिर गया। दूसरों की समस्यायों की इतनी चिंता है कि हम स्वयं की ही समस्याएं नजरअंदाज किये चले जा रहे है। दिल्ली में वायु प्रदूषण क्या हुआ पूरी फेसबुक पर ध्वनि प्रदूषण मच गया। खुद के घर के बाहर रोज सवेरे कचरे को दियासलाई दिखाने वाले भाईसाहब फेसबुक पर पर्यावरण प्रेमी बनने से पीछे नहीं हट रहे। उनका कहना है कि दिल्ली वाले ऐसा कर लेते, दिल्ली वाले वैसा कर लेते। उन्हें कौन समझाए कि उस दिल्ली ने 70 सालों में कुछ किया है जो वो अब करेगी?
दिल्ली के लोग दुआ कर रहे हैं कि यह सब खत्म हो। यह वहीं लोग है जो कल तक पटाखे जला कर संस्कृति को बचा रहे थे। इतने मासूम है यह लोग जो सोचते है कि संस्कृति के होने से इनसान है, इनसान के होने से संस्कृति नहीं।
परिस्थिति कैसी भी हो, बाजार अपने लिए संभावनाओं का सृजन कर ही लेता है। यहां तो अवसर खुद बाजार की चौखट पर चलकर आया है। फलस्वरूप एयर प्यूरीफायर वाले शुद्ध हवा बेचने निकल पड़े है। एक ओर आम आदमी दुआ कर रहा है कि प्रदूषण कम हो दूसरी ओर बाजार दुआ कर रहा है कि उनके उत्पादों की बिक्री खूब हो। आम आदमी की दुआ पर बाजार की दुआ भारी है। बाजार का शुद्ध पानी पी लिया अब शुद्ध हवा खाने की बारी है।


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