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आत्मविश्वास की जीत

Posted On November - 10 - 2019

ललित शौर्य

स्कूल में बाल दिवस की तैयारी चल रही थी। सभी बच्चे बड़े खुश थे। सभी अपनी-अपनी तैयारियों में लगे हुए थे। बाल दिवस पर प्रत्येक वर्ष विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं होती थीं। जैसे कुर्सी दौड़, लेमन रेस, जलेबी दौड़ आदि। इस बार स्कूल में बाल दिवस पर भाषण प्रतियोगिता भी थी। भाषण प्रतियोगिता के लिए बहुत कम नाम आये थे। कुल पांच बच्चों ने ही अपने नाम लिखवाये थे। इन पांच नामों में एक नाम आदित्य का भी था। आदित्य ने इससे पहले कभी भाषण नहीं दिया था। आदित्य पढ़ने में होशियार था लेकिन एक्स्ट्रा एक्टिविटी में पीछे ही रहता था। भाषण प्रतियोगिता में आदित्य के भाग लेने की बात जब क्लास के अन्य बच्चों को लगी तो उन्होंने उसका बहुत उपहास उड़ाया। आदित्य जब बोलता था तो कभी-कभी उसकी जीभ लड़खड़ाती थी। वो बीच में ही अटक जाता था। इसलिए सभी बच्चे यही सोच रहे थे कि वो भाषण कैसे देगा। ‘अरे, आदित्य तुम पागल हो क्या। तुमने भला अपना नाम क्यों लिखवा दिया।’ विक्की ने कहा। ‘मैं भला क्यों न लिखवाऊं अपना नाम। तुम्हें क्या दिक्कत है मेरे नाम लिखवाने से।’ आदित्य ने जवाब देते हुए कहा। ‘मुझे क्या दिक्कत होगी। दिक्कत तो तुम्हें होगी जब सब तुम्हारी मजाक उड़ायेंगे। जब तुम बोल नहीं पाअोगे।’ विक्की ने कहा। ‘मेरी चिंता मत करो। तुम अपनी तैयारी करो।’ आदित्य ने कहा। छुट्टी के बाद जब आदित्य घर पहुंचा तो वो थोड़ा नर्वस हो गया था। वो सोच रहा था उसने नाम तो लिखवा लिया है पर अब वो धाराप्रवाह कैसे बोलेगा। प्रतियोगिता कैसे जीतेगा। आदित्य के दादा जी ने जब उसे कुछ परेशान देखा तो उन्होंने उससे पूछते हुए कहा, ‘आदित्य। क्या बात है बेटा। आज तुम कुछ परेशान लग रहे हो।’ ‘नहीं दादा जी ऐसी कोई बात नहीं है।’ आदित्य ने कहा। दादाजी ने जोर देते हुए पूछा, ‘कुछ तो है जो तुम मुझसे छिपा रहे हो?’
‘दादाजी, बाल दिवस के दिन हमारे स्कूल में एक भाषण प्रतियोगिता है। मैंने उसमें अपना नाम लिखवा लिया है। आप तो जानते ही हैं कभी-कभी बोलते समय मेरी जीभ लड़खड़ाती है। मैं इसी बात को लेकर परेशान हूं।’ आदित्य ने बताया।
‘बेटा! इसमें परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। अभी तुम्हारे पास तीन दिन शेष हैं। तुम आईने के सामने खड़े होकर पूर्ण आत्मविश्वास के साथ तैयारी करो। बार-बार अभ्यास करो। निश्चित ही तुम प्रतियोगिता को जीत लोगे।’ दादाजी ने बताया।
‘दादाजी, मुझे घबराहट-सी हो रही है।’ आदित्य ने कहा।
‘बेटा घबराने की कोई जरूरत नहीं है। अपने आप पर विश्वास रखो। तुम जानते हो ना कि जिनके जन्मदिवस पर बाल दिवस मनाया जाता है वो हैं चाचा नेहरू। उन्होंने देश को आजाद करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। उन्हें अनेक बार जेल भी जाना पड़ा था। उसके बावजूद भी उन्होंने आजादी का आन्दोलन नहीं छोड़ा। तुम भी प्रयास करो। प्रतियोगिता तुम्हीं जीतोगे।’ दादाजी ने कहा। ‘मैं आज से ही अभ्यास करता हूं। मुझे विश्वास है प्रतियोगिता मैं ही जीतूंगा।’ आदित्य ने पूर्ण विश्वास के साथ कहा। इसके बाद आदित्य अपने अभ्यास में लग गया। स्कूल जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद लगातार तीन दिन उसने घंटों अभ्यास किया। अब उसका आत्मविश्वास पहले से कई गुना बढ़ चुका था। बाल दिवस वाले दिन स्कूल का सभागार खचाखच भरा हुआ था। बच्चे, उनके पेरेंट्स, टीचर्स सभी आये हुए थे। इतनी भीड़ देखकर आदित्य पहले थोड़ा नर्वस हुअा लेकिन कुछ ही देर बाद उसने खुद को संभाल लिया। एक-एक कर बच्चे भाषण देने लगे। बच्चों को सुनकर आदित्य के भीतर और अधिक ऊर्जा आ रही थी। कुछ समय बाद आदित्य का नाम पुकारा गया। स्टेज पर उसने अपनी बात रखनी शुरू की। पहले दो-चार पंक्तियों में वो थोड़ा सा अटका। लेकिन उसके बाद उसने जो धाराप्रवाह बोलना शुरू किया। सबसे देखते ही रह गए। नेहरू जी का बच्चों से कितना लगाव था, यह बात भी बताई। बाल दिवस का क्या महत्व है इस पर भी प्रकाश डाला। जैसे ही आदित्य ने अपना भाषण ख़त्म किया पूरा सभागार तालियों से गूंजने लगा। अब किसी को संदेह नहीं था कि प्रतियोगिता आदित्य ने जीत ली है। बस परिणाम का इन्तजार था। थोड़ी ही देर में परिणाम भी आ गया। जैसे ही माइक से आदित्य का नाम लिया गया तो पुनः तालियों से पूरा हाल गूंज उठा। आदित्य को प्रिंसिपल सर द्वारा सम्मानित किया गया। सभी बच्चे आदित्य को बधाई देने लगे। विक्की ने भी धीरे से आदित्य को बधाई दी। विक्की बहुत शर्मिंदा लग रहा था। ‘विक्की ये प्रतियोगिता जीतने में तुम्हारा भी सहयोग है। उस दिन अगर तुम मुझे चुनौती न देते तो शायद मैं ये प्रतियोगिता जीत न पाता।’ आदित्य ने कहा। विक्की मुस्कराने लगा। उसे आदित्य की सकारात्मकता को देख कर अच्छा लग रहा था।


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