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आत्मज्ञान की डगर

Posted On November - 17 - 2019

अम्मा अमृतानंदमयी
आत्मज्ञान कहीं बाहर बैठा हुआ नहीं है, जिसे जाकर पाया जा सके। भगवान कृष्ण कहते हैं– ‘चित्त की समता ही योग है।’ हमें हर वस्तु में दिव्य चेतना दिखनी चाहिये, तभी हम पूर्णता पा सकेंगे। हमें हर वस्तु में अच्छाई ही देखनी चाहिये। एक मधुमक्खी, फूल में केवल रस पर केंद्रित होती है और उसकी मिठास का आनंद लेती है। जो सदा हर वस्तु का केवल अच्छा पक्ष देखते हैं, वे ही आत्मज्ञान पाने के अधिकारी हैं।
अगर हम आत्मज्ञान पाना चाहते हैं, तो शरीर को पूरी तरह भूलना होगा। हमें पूर्णरूप से आश्वस्त होना होगा कि हम आत्मा ही हैं। प्रभु का कोई विशिष्ट निवास स्थान नहीं है, वे हमारे हृदय में बसते हैं। सभी आसक्तियों और देहभाव से मुक्त होना आवश्यक है। तब हममें एक गहरी समझ पैदा होगी, कि आत्मा का कोई जन्म मृत्यु नहीं है, न कोई सुख-दुःख है। हमारा मृत्यु भय मिट जायेगा और हम आनंद से भर जायेंगे।
एक जिज्ञासु साधक को, हर परिस्थिति को धैर्यपूर्वक स्वीकार करना सीखना चाहिये। यदि शहद में कुछ नमक मिल गया है, तो लगातार शहद डालते जाने से नमकीन स्वाद हट जायेगा। इसी तरीके से हमें द्वेष भाव तथा मैं भाव से, पूरी तरह छुटकारा पाना चाहिये। अच्छे विचारों के सतत चिंतन से इसे प्राप्त करो। जब मन इस तरीके से निर्मल हो जायेगा, तो हम किसी भी स्थिति को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर सकेंगे। इस तरह हम आध्यात्मिक उन्नति अवश्य प्राप्त करेंगे, चाहे हमें तत्काल इसका पता न भी चले।
आत्मज्ञान की अवस्था में, हम दूसरों को अपना ही आत्मरूप मानते हैं। चलते हुए यदि हम गिर जाते हैं और पैर को चोट पहुंचती है, तो हम आंखों को दोष देकर, उन्हें दंडित नहीं करते, चोटग्रस्त पैर को आराम देने की कोशिश करते हैं। यदि हमारे एक हाथ को चोट लगती है, तो दूसरा हाथ फौरन मदद के लिये आगे आता है। उसी तरह आत्मज्ञान का अर्थ है, दूसरों में अपनी आत्मा का अनुभव करना।
आत्मज्ञानी के लिये, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है, परन्तु उस अवस्था का अनुभव पाने के पूर्व, आत्मज्ञान की सब बातें, कोरे शब्द हैं। उन शब्दों में अनुभव की शक्ति नहीं होती। और सद्‌गुरु की सहायता के बिना, चेतना के उस स्तर तक पहुंचना भी असंभव है। एक साधक के लिए सद्‌गुरु के उपदेशानुसार, आचरण परम आवश्यक है। आत्मज्ञान पाने के लिये केवल दृष्टिकोण बदलने की ज़रूरत है—बस!
भ्रमव्य लोग यह सोचते हैं कि उनके सांसारिक बंधन वास्तविक हैं। एक गाय की कहानी है, जो रोज़ एक शेड में खूंटे से बांधी जाती थी। एक दिन उसे खूंटे से नहीं बांधा गया। उसे केवल शेड के अंदर करके, दरवाज़ा बंदकर दिया गया। गले की रस्सी का दूसरा सिरा ज़मीन पर पड़ा रहा। दूसरे दिन जब गाय को शेड से बाहर करने के लिये दरवाजा खोला गया तो गाय अपने स्थान से नहीं हिली। गाय को धक्का दिया गया, पर गाय टस से मस नहीं हुई। तब उसके मालिक ने सोचा कि रोज मैं इसे बाहर करने से पूर्व, खूंटे से रस्सी खोलता हूं, अगर इसे खूंटे से खोलने का नाटक करूं तो? उसने वही किया। बस, गाय चल पड़ी।
लोगों की भी ऐसी दशा है। वे बंधे हुए नहीं है, पर सोचते हैं कि बंधे हुए हैं। यह भ्रम दूर करना ज़रूरी है। यह ठीक से समझ लेना है, कि तुम किसी बंधन में नहीं हो। पर यह भ्रम, सद्‌गुरु की सहायता के बिना दूर नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि सद्‌गुरु तुममें आत्मज्ञान डालतें हैं। सद्‌गुरु की जिम्मेदारी इतनी ही है कि तुम्हें बंधन से परे होने का निश्चयात्मक विश्वास दिला दे। लहरों के शांत होने पर ही, हम सूर्य का स्पष्ट प्रतिबिंब देख पाते हैं। इसी तरह मन की तरंगों के शांत होने पर ही, हम आत्मा को देख पायेंगे। हमें आत्मा को रूप नहीं देना है— केवल मन की तरंगों को शांत करना है और आत्मा स्वतः प्रकट हो जायेगी। स्वच्छ पारदर्शी कांच पर परावर्तन नहीं होगा— एक तरफ पेन्ट करने पर ही प्रतिबिंब दिखेगा। इसी तरह जब हमारे अंदर नि:स्वार्थ का पेन्ट लग जायेगा, तब हम मन के दर्पण में परमात्मा को देख पायेंगे। जब तक अहंकार शेष रहेगा, हम नि:स्वार्थी नहीं बन सकते। सद्‌गुरु, शिष्य को ऐसी परिस्थितियों में से गुजारते हैं, जिससे शिष्य अपने अहंकार को स्पष्ट रूप से देख लेता है तथा उसे काट-छांट कर, दूर करना सीखता है।
(amrita.in से साभार)


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