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अंतरिक्ष में आफत

Posted On November - 18 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
उम्मीद है कि इस साल की शुरुआत में मिशन शक्ति के तहत भारत ने पृथ्वी की निचली कक्षा में अपने जिस जीवित उपग्रह को अंतरिक्ष में सामरिक क्षमता हासिल करने के लिए देश में बनी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से मार गिराया था, उस सैटेलाइट का कचरा पृथ्वी के वायुमंडल में आकर जल गया होगा। असल में, इस पर अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने कड़ी टिप्पणी की थी कि भारत की यह कार्रवाई अंतरिक्ष में कचरे की समस्या को और बढ़ाने वाली है, क्योंकि पुर्जा-पुर्जा हुए उपग्रह के 400 से अधिक टुकड़े पृथ्वी की कक्षा में खतरनाक ढंग से चक्कर काट रहे हैं। नासा ने यह दावा भी किया कि इस मलबे से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) को भी खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि उपग्रह को नष्ट करने से पैदा हुए कचरे के 24 टुकड़े आईएसएस से ऊपर चले गए हैं। नासा ने साफ कहा कि भारत की यह कार्रवाई अस्वीकार्य है, क्योंकि भारतीय परीक्षण के कारण 10 दिन के अंदर आईएसएस पर खतरा 44 फीसदी बढ़ गया। हालांकि, भारत ने नासा की आपत्ति का यह कहकर विरोध किया कि ये टुकड़े अव्वल तो खतरनाक नहीं हैं और दूसरे एक महीने की अवधि में नीचे आकर पृथ्वी के वायुमंडल से घर्षण खाते हुए जलकर नष्ट हो जाएंगे। इसलिए अंतरिक्ष और आईएसएस से लेकर किसी अन्य उपग्रह के लिए खतरा नहीं बनेंगे। वैसे भी भारत ने काफी सोच-विचार कर पृथ्वी की निचली कक्षा में यह परीक्षण किया था, जिससे स्पेस जंक की गंभीर समस्या पैदा न हो। वैज्ञानिकों ने नासा के एतराज का यह कहकर भी विरोध किया कि उसकी आपत्ति नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली जैसी है, क्योंकि अमेरिका ने अब तक स्पेस में जो गतिविधियां की हैं, उनसे अंतरिक्षीय कबाड़ के 6 हजार टुकड़े वहां पैदा हुए हैं, जबकि भारतीय गतिविधियों से सिर्फ करीब 100 ऐसे टुकड़े बने। हालांकि, बाकी अन्य देशों को मिलाएं, तो कचरे के बड़े टुकड़ों की संख्या 6 हजार और 10 सेंटीमीटर से बड़े करीब 30 हजार और 10 सेंटीमीटर या इससे छोटे 6 लाख 70 हजार टुकड़े खतरनाक ढंग से वहां विचर रहे स्पेस स्टेशनों, उपग्रहों और स्पेस टेलीस्कोपों के लिए समस्या बने हुए हैं। दिक्कत सिर्फ स्पेस में मौजूद सैटेलाइटों के लिए नहीं है, बल्कि छोड़े जाने वाले नये उपग्रहों को भी इनसे समस्या हो सकती है। यह बात नोटिस की गई है कि भारत जब अपना कोई नया सैटेलाइट लॉन्च करता है, तो उसके प्रक्षेपण के वक्त को थोड़ा आगे-पीछे खिसकाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उसके स्पेस तक पहुंचने के रास्ते में कहीं कोई जंक तैरते हुए न आ जाएं। ध्यान रहे कि भारत अंतरिक्ष के मलबे को श्रीहरिकोटा में मौजूद मल्टी ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग राडार से ट्रैक करता है।

स्पेस में जंक कब तक टिकेगा
सवाल यह है कि आखिर कोई स्पेस जंक अंतरिक्ष में कब तक बना रह सकता है। इसका जवाब है कि अगर उसे वहां से वापस पृथ्वी पर न लाया जाए, तो शायद सदा के लिए। मसलन, मानव निर्मित सबसे पुराना कबाड़ अब भी अंतरिक्ष में है, यह अमेरिका का दूसरा उपग्रह वैनगार्ड-प्रथम है, जो 1958 में छोड़ा गया था। इसमें पिछले साल 7 फरवरी 2018 को अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस सेंटर से दुनिया के सबसे ताकतवर रॉकेट फॉल्कन हैवी से स्पेस में भेजी गई लाल रंग की स्पोर्ट्स कार को भी सबसे नया कचरा माना जा सकता है। मुमकिन है कि बहुत से इस कार को कबाड़ मानने से इनकार कर दें, लेकिन कार चालक के रूप में एक बुत के साथ अंतरिक्ष में विचरती यह कार आखिर इसके सिवाय और क्या है। बेशक, यह विज्ञापनबाजी का नया नमूना है कि प्राइवेट स्पेस एजेंसी-स्पेसएक्स और टेस्ला कार कंपनी के मालिक एलन मस्क ने अपनी पुरानी इलेक्ट्रिक स्पोर्ट्स कार को पूरी दुनिया की निगाह में ला दिया, लेकिन जरा इसके साथ 2001 की कोलंबिया शटल त्रासदी के बारे में भी सोचिए। हो सकता है कि दुनिया इस त्रासदी का असल कारण शायद कभी न जान पाए, लेकिन कोलंबिया दुर्घटना के वक्त एक मुद्दा यह भी उठा था कि अंतरिक्ष में फैला कचरा ही शटल दुर्घटना का कारण था, जिसमें कल्पना चावला समेत 7 प्रतिभाशाली विज्ञानियों की जान चली गई थी। कुछ रिपोर्टों में यह आशंका दावे के साथ जताई गई थी कि अंतरिक्षीय कबाड़ की चपेट में आकर ही यह दुर्घटना हुई थी।
इसी तरह पिछले साल यानी मार्च 2018 में जब चीनी स्पेस स्टेशन थियांगोंग-1 के गिरने की सूचना आई, तो उस वक्त भी अंतरिक्षीय कबाड़ की चर्चा दुनिया में हुई। दरअसल, अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में घूम रही छोटी चीजें न तो नीचे आती हैं और न ऊपर जाती हैं। ये चीजें त्रिशंकु की तरह वहीं घूमती रहती हैं और अंतरिक्षयानों, उपग्रहों, स्पेस स्टेशनों के लिए खतरे का सबब बनी रहती हैं।
पिछले 60 वर्षों में जैसे-जैसे विभिन्न देशों की अंतरिक्ष संबंधी गतिविधियां बढ़ी हैं, वहां धरती से पहुंचने वाला कचरा बढ़ता ही गया है। जुलाई 2016 में अमेरिकी स्ट्रैटिजिक कमान ने निकट अंतरिक्ष में 17,852 कृत्रिम वस्तुएं दर्ज की थीं, जिनमें 1419 कृत्रिम उपग्रह शामिल थे। मगर यह तो सिर्फ बड़े पिंडों की बात थी। इससे पहले, 2013 की एक स्टडी में एक सेंटीमीटर से कम 17 करोड़ कचरे पाए गए थे और एक से 10 सेंटीमीटर के बीच आकार वाले कचरों की संख्या 6 लाख 70 हजार पाई गयी थी। इससे बड़े आकार वाले कचरों की अनुमानित संख्या 29 हजार बताई गयी थी। अंतरिक्ष में आवारा घूमती ये चीजें किसी भी अंतरिक्ष अभियान का काल बन सकती हैं। इस मुश्किल को बेकाबू होने से रोकने का एक ही तरीका है कि हमारे द्वारा वहां भेजी गई किसी भी चीज का कोई हिस्सा अलग होकर अंतरिक्ष में न छूटे।
4 साल पहले यानी वर्ष 2015 की बात है। एक मानवरहित रूसी स्पेसक्राफ्ट प्रोगेस एम-27 एम पर वैज्ञानिकों ने पूरी तरह नियंत्रण खो दिया और यह खतरनाक ढंग से धरती की ओर बढ़ने लगा। रूसी स्पेस एजेंसी के अधिकारी ने अप्रैल, 2015 माह के अंत में यह जानकारी दी थी कि इस स्पेसक्राफ्ट ने छोड़ने के कुछ समय बाद धरती की ओर गिरना शुरू कर दिया। हालांकि, वैज्ञानिकों ने बाद में यह भी बताया कि पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर घर्षण होने से इसका ज्यादातर हिस्सा जलकर नष्ट हो गया, फिर भी इसके कुछ टुकड़ों के बच जाने और समुद्र में उनके गिरने की आशंका से इनकार नहीं किया गया था। असल में, यह यान एक तरह से अंतरिक्षीय कचरे में तब्दील हो गया था, जिसकी समस्या से हमारी आधुनिक सभ्यता बुरी तरह त्रस्त है।
कुछ समय पहले ही यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन के शोधकर्ताओं ने गूगल और स्पेस एक्स जैसी निजी कंपनियों के भावी स्पेस कार्यक्रमों पर नजर डालते हुए अंतरिक्ष में कबाड़ पैदा होने की नयी आशंकाओं का आकलन किया था। इन शोधकर्ताओं के मुताबिक एक तरफ गूगल दुनिया में वायरलेस इंटरनेट का तेज विस्तार करने के लिए सैकड़ों उपग्रह अगले कुछ साल में अंतरिक्ष में भेजने में लगी है, तो दूसरी तरफ पर्यटकों को स्पेस की सैर कराने की योजना को मूर्त रूप देने में तल्लीन निजी कंपनी स्पेस एक्स भी दर्जनों रॉकेट और सैटेलाइट भेजने वाली है। इन योजनाओं के आधार पर आकलन है कि अगले कुछ वर्षों में इन सैटेलाइटों के अंतरिक्ष में पहुंचने से इनके बीच होने वाली टक्करों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाएगी। फिलहाल उपग्रहों और उनके टुकड़ों के बीच छोटी-मोटी टकराहट की हर साल करीब 250 घटनाएं होती हैं, जो अनुमानतः 375 से 400 तक हो सकती हैं। यह खतरा वास्तविक है, क्योंकि वर्ष 2009 में ही पृथ्वी की कक्षा में मौजूद इरीडियम टेलीकॉम सैटेलाइट और रूसी कॉसमॉस 2251 सैन्य सैटेलाइट के बीच ऐसी ही एक टक्कर हो चुकी है। इसके अलावा, वर्ष 2007 में चीन ने मिसाइल दागकर स्पेस में मौजूद अपने सैटेलाइट फेंग्यून को नष्ट किया था, जिससे कचरा पैदा हुआ था। अभी पृथ्वी की कक्षा में 1300 सक्रिय उपग्रह मौजूद हैं, इसके अलावा नष्ट हो चुके उपग्रहों का विशाल कचरा वहां पहले से उपस्थित है।

खतरे का रिंगरोड

आसान नहीं साफ करना
वर्ष 1999 के अनुसार मनुष्य ने पृथ्वी से बाहर जो कचरा फेंका है, वह लगभग 10.82 लाख किलोग्राम है। इसमें धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों के जरिए फैले कचरे को और जोड़ा जाए तो हमें पृथ्वी के चारों ओर एक भीड़-भरे खतरनाक ‘रिंग रोड’ के दर्शन होंगे। यह अंतरिक्ष में भ्रमण करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बड़ा खतरा हैं। दिसंबर, 2001 में साबित हो चुका है कि विभीषिका का यह अकेला चेहरा नहीं है, क्योंकि तब स्पेस शटल- एनडेवर की सहायता से 17 मंजिले इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को खींचकर उच्च कक्षा में ले जाना पड़ा था, जिससे परिक्रमा पथ में आए 6 मीटर लंबे सोवियत रॉकेट बूस्टर से उसे बचाया जा सके। कबाड़ में 1965 में जेमनी-4 मिशन के एक अंतरिक्षयात्री एडवर्ड व्हाइट का दस्ताना भी शामिल था, जो स्पेस-वाक के दौरान उनके हाथ से निकल गया था। वायुमंडल में रगड़ खाकर जल जाने से यह दस्ताना पहले चार महीने तक 28 हजार किमी प्रति घंटा की रफ्तार से कक्षा में चक्कर काटता रहा। अनुमान है कि पृथ्वी से 1200 मील की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में मानव के हाथ से निर्मित और उससे वहां छूटी हुई एक लाख 10 हजार चीजें हैं, जो आकार में एक सेंटीमीटर या उससे भी बड़ी हैं। इस कबाड़ की गति ही इसे किसी भीषण हथियार में बदल देती है। आकलन के अनुसार, यह कचरा करीब 600 मील की ऊंचाई पर 18 हजार मील प्रति घंटा या इससे अधिक गति से चक्कर काट सकता है। खतरा यह है कि कोई नन्ही सी वस्तु भी उपग्रहों की सुरक्षा परत को ध्वस्त कर सकती है या स्पेस-वाक कर रहे अंतरिक्ष यात्री की पोशाक को काट सकती है, जिससे उसका जीवन खतरे में पड़ सकता है। खगोल वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अब जिस तरह उपग्रह छोड़ने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है, उससे स्पेस-जंक भी बढ़ता ही जाएगा।
इसकी सफाई जरूरी : इस समस्या का हल क्या है? इसके जवाब में लियो और जॉनसन का कहना है कि अंतरिक्ष से यह कबाड़ बटोरकर वापस पृथ्वी पर लाना ही इसका समाधान है। वैज्ञानिकों ने यह भी उम्मीद जताई है कि भविष्य प्रक्षेपित होने वाले उपग्रहों और बूस्टर रॉकेटों के इंजनों में ऐसी तकनीक कायम की जा सकती है कि इस्तेमाल के बाद वे अंतरिक्ष में न ठहरें, बल्कि वापस पृथ्वी पर आ गिरें। अंतरिक्ष से कचरा वापस लाना सस्ता काम नहीं है। कुछ वर्ष पहले अमेरिकी रॉकेट कंपनी ऑरबिटल डेवलपमेंट ने प्रस्ताव रखा था कि यदि उसे चांद को बुहारने का काम दिया जाता है तो वह इसे लगभग 60 लाख डॉलर में करने को तैयार है। लेकिन जहां तक पृथ्वी की कक्षा में मौजूद कबाड़ को साफ करने की बात है तो यह मुश्किल काम है। बाह्य अंतरिक्ष मामलों (आउटर स्पेस अफेयर्स) के संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के प्रो. हैंस हाउबोल्ड के मतानुसार, एक अंतरिक्षयान भेजकर ऐसा कुछ कचरा एकत्र कर पृथ्वी पर वापस लाया जा सकता है, लेकिन यह काम इतना खर्चीला है कि इस बारे में सोचना फिजूल है। सस्ता विकल्प यह हो सकता है कि अपना मिशन पूर्ण कर लौट रहा कोई शटल थोड़ा-बहुत कचरा भी बटोर कर अपने साथ लेता आए। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस बारे में एक रूपरेखा तैयार की है। इसके मुताबिक एक ऐसा उपग्रह बनाया जाए, जो ऐसे कबाड़ को अंतरिक्ष में एक स्थान पर जमा करके उसे पृथ्वी की ओर धकेल दे। यह कबाड़ या तो वायुमंडल में प्रवेश करते समय जलकर खाक हो जाए या फिर इसे ऐसी दिशा दी जाए कि वह बिना कोई नुकसान पहुंचाए समुद्र में समा जाए। बेशक, इसमें भी खासा खर्च है। नासा ने अंतरिक्ष में मौजूद मानव निर्मित कबाड़ से जूझने से जो योजना बनाई है, उसमें पृथ्वी से लेज़र किरणें भेजकर अंतरिक्षीय कचरे को या तो बाहरी कक्षाओं की ओर धकेल दिया जाएगा या फिर नष्ट कर दिया जाएगा।

हसरतों के रास्ते में बाधा
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के खगोल वैज्ञानिक अमोस स्ट्रोकी ने एक बार कहा था कि सितारों से भरे जिस आकाश की ओर हम रात को हसरत से ताकते हैं,, वहां कबाड़ के हजारों टुकड़े और एस्टेरॉयड (खगोलिय पिंड) खतरनाक ढंग से हमारी ओर रुख किए हुए हैं। इस चिंता के बारे में विज्ञान जर्नल- साइंस में नासा के विज्ञानियों जेसी लियो और एनएल जॉनसन ने लिखा है कि अंतरिक्ष में 9 हजार से ज्यादा ऐसे टुकड़े पृथ्वी की कक्षा में तैर रहे हैं, जो आने वाले वक्त में भयावह दृश्य उपस्थित कर सकते हैं। उनका आकलन है कि इनमें 4 इंच और इससे ज्यादा आकार के टुकड़ों का कुल वजन साढ़े पांच हजार टन हो सकता है। इन वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में यह भी साफ लिखा है कि अगर जारी अंतरिक्ष अभियानों को बिल्कुल रोक दिया जाता है (जोकि असंभव है) तो भी अंतरिक्ष में इतने उपग्रह मौजूद हैं कि उनसे वहां कबाड़ की मात्रा में इजाफा होता ही रहेगा। इस रिपोर्ट से पहले नासा ने उन देशों की एक सूची तैयार की थी, जो अंतरिक्ष में इस कबाड़ के लिए जिम्मेदार है। इनमें पहला नाम रूस का है। इसके बाद अमेरिका, फ्रांस, चीन, भारत, जापान और यूरोपीय स्पेस एजेंसियों का नंबर आता है। सबसे ज्यादा कबाड़ पृथ्वी से ऊपर 550 मील से 625 मील के बीच में पसरा हुआ है। हालांकि, यह स्पेस जंक धरती पर उड़ने वाले यात्री विमानों और 250 मील की ऊंचाई पर स्थित अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं पैदा करता, लेकिन अंतरिक्ष में ऊपर तक पहुंचने वाले व्यावसायिक व शोधपरक उपग्रहों और अन्य प्रकार की अंतरिक्षीय गतिविधियों को संकट में डाल सकता है। यह वास्तव में एक भयावह विचार है कि पृथ्वी की कक्षा के ठीक बाहर के अंतरिक्ष में अलग-अलग आकृतियों और आकार का प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित कचरा चक्कर काट रहा है। अंतरिक्ष में पहली बार स्पुतनिक-1 उपग्रह भेजे जाने के बाद से मनुष्य हजारों टन हाइटेक कचरा पृथ्वी से बाहर अपने करीबी अंतरिक्ष में फेंक चुका है। पिछले करीब 60 वर्षों के दौरान अंतरिक्ष में भेजे गए संचार उपग्रहों, अंतरिक्षीय प्रयोगशालाओं, मानवरहित कैप्सूलों, कार्गो यानों और मानव-मिशनों की बदौलत पृथ्वी से बाहर एक विशाल जंकयार्ड बन गया है। इसके अलावा प्रकृति ने भी अंतरिक्ष में हमारी पृथ्वी के नजदीक ही ऐसे हजारों छोटे-बड़े पिंड तैनात कर रखे हैं, जो किसी भी वक्त पृथ्वी के वायुमंडल में घुसकर मानव सभ्यता के संपूर्ण विनाश का खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे ‘नियर अर्थ ऑब्जेक्ट ऑब्ज़रवेशन प्रोग्राम’ के विशेषज्ञों ने बताया है कि 1998 में आधिकारिक रूप से इन पिंडों की मौजूदगी के संबंध में सर्वेक्षण शुरू किए जाने के बाद से अनुमानित 1100 बड़े पिंडों में 700 का पता लगाया जा चुका है।


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