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सुनवाई से न्यायाधीशों के अलग होने की तार्किकता

Posted On October - 9 - 2019

गौतम नवलखा मामला

अनूप भटनागर
कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा की अपील पर सुनवाई से प्रधान न्यायाधीश सहित कम से कम तीन न्यायाधीशों के अलग होने की घटना को इस तरह से पेश किया जा रहा है, मानो यह कोई अप्रत्याशित घटना हो गयी है। न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाये रखने के लिये अक्सर उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश किसी मामले विशेष की सुनवाई से खुद को अलग करते रहे हैं। इस तरह के मामलों में अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, सीबीआई में अंतरिम निदेशक का नियुक्ति प्रकरण, महाराष्ट्र में गोमांस पर प्रतिबंध से संबंधित विवाद, कर्नाटक के विधायकों को अयोग्य घोषित करने संबंधी विवाद और ऐसे ही अनेक मामले हैं, जिनमें किसी न किसी वजह से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सुनवाई से अलग हो गये थे।
दरअसल, सुनवाई से अलग होने की अनेक वजह हो सकती हैं। मसलन, इससे संबंधित किसी मामले की पहले कभी सुनवाई की हो, वकालत के दौरान किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व किया हो या उसे सलाह दी हो, यह भी संभव है कि किसी पक्ष ने उनसे संपर्क करने का प्रयास किया हो। कभी-कभी मामले के किसी पक्षकार की ओर से इसके लिये आवेदन किये जाने पर भी न्यायाधीश मुकदमे की निष्पक्षता और न्यापालिका के प्रति आस्था की खातिर सुनवाई से अलग हो जाते हैं।
यह सही है कि बंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ गौतम नवलखा की अपील पर सुनवाई करने से प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट्ट ने खुद का अलग कर लिया था। इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि ये न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई से बचने का प्रयास कर रहे थे।
इस साल के प्रारंभ में अयोध्या मामले की सुनवाई के लिये गठित संविधान पीठ से न्यायमूर्ति उदय यू. ललित ने खुद को अलग कर लिया था क्योंकि उन्होंने वकालत के दौरान न्यायालय में उ.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का प्रतिनिधित्व किया था।
इसी तरह, न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव ने भी वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में सारदा चिट फंड प्रकरण से संबंधित एक मामले में कोलकाता के पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार का न्यायालय में प्रतिनिधित्व किया था, इसलिए राजीव कुमार का मामला सुनवाई के लिये आने पर उन्होंने खुद को इससे अलग कर लिया था। कुछ ऐसा ही सीबीआई में अंतरिम निदेशक के पद पर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और इसके बाद दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश ए.के. सीकरी ने खुद को अलग किया था। न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने महाराष्ट्र में गोमांस रखने पर प्रतिबंध से संबंधित मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि उन्होंने अधिवक्ता के रूप में एक पक्ष का प्रतिनिधित्व किया था।
कर्नाटक के 17 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में दायर याचिका पर सुनवाई करने से न्यायमूर्ति एम.एम. शांतागौडार ने खुद को अलग कर लिया था। उन्होंने कहा था कि वह कर्नाटक से ही आते हैं और लंबे समय तक वहां रहे हैं, इसलिए इस मामले की वह सुनवाई नहीं करना चाहते। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने भी 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में कांग्रेस के नेता सज्जन कुमार की उम्रकैद की सजा को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया था क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय में उन्होंने इससे संबंधित मामले की सुनवाई की थी।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में भी ऐसा अक्सर होता रहता है जब किसी मामले की सुनवाई से एक या दो नहीं बल्कि इससे भी अधिक न्यायाधीश खुद को अलग कर लेते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि किसी मामले की सुनवाई से हटने का अनुरोध न्यायाधीश ठुकरा भी देते हैं। इस तरह की घटना असम के लिये राष्ट्रीय नागरिक पंजी. मामले की सुनवाई से प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को हटाने का अनुरोध मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंडेर ने किया था लेकिन प्रधान न्यायाधीश ने इसे ठुकरा दिया। अक्सर ऐसा होता है कि मामला सुनवाई के लिये आने पर पीठ अपने आदेश में कहती है कि इसे पीठ के समक्ष पेश किया जाये, जिसमे अमुक न्यायाधीश सदस्य नहीं हों।
संविधान पीठ ने कहा था कि किसी मामले की सुनवाई से यदि कोई न्यायाधीश अलग होते हैं तो उन्हें इसकी वजह बता देनी चाहिए। न्यायाधीश के लिये ऐसा करने की वजह बताना जरूरी नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि किसी न्यायाधीश द्वारा किसी मुकदमे की सुनवाई से खुद को अलग करने के संबंध में शीर्ष अदालत कोई दिशा निर्देश बनायेगी।


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