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साहसिक आर्थिक सुधारों का वक्त

Posted On October - 12 - 2019

हाल ही में 10 अक्तूबर को अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडिज ने वर्ष 2019-20 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.20 से घटाकर 5.80 फीसदी कर दिया है। इसके पहले 4 अक्तूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वर्ष 2019-20 के लिए विकास दर का अनुमान 6.9 फीसदी से घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया है। इसी प्रकार विगत 30 सितम्बर को इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2019-20 में भारत की विकास दर 5.2 फीसदी रहेगी। ईआईयू ने कहा कि कारोबारी भरोसा डगमगाने और वित्तीय क्षेत्र को लेकर चिंता के कारण विकास दर गिर रही है। इसी प्रकार 25 सितम्बर को एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.50 फीसदी कर दिया। यकीनन इस समय देश में बढ़ती हुई आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए कुछ और बड़े वास्तविक और साहसिक आर्थिक सुधारों की जरूरत है। वर्ष 2019-20 के लिए एक के बाद एक विकास दर घटने की रिपोर्टों के बाद नए समुचित आर्थिक कदमों की जरूरत और अधिक बन गई है।
निश्चित रूप से सरकार ने आर्थिक सुस्ती के मद्देनजर अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए विगत 23 अगस्त के बाद से एक के बाद एक आर्थिक और वित्तीय कदम उठाए हैं, जिनसे देश के उद्योग-कारोबार को कुछ राहत अवश्य मिली है। लेकिन अब अर्थव्यवस्था को गतिशील करने और विकास दर बढ़ाने के लिए मांग का निर्माण करना जरूरी दिखाई दे रहा है। उल्लेखनीय है कि देश की अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए पहला बड़ा कदम 23 अगस्त को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा कई वित्तीय घोषणाओं के रूप में सामने आया। अर्थव्यवस्था की सुस्ती और पूंजी बाजारों के संकट को दूर करने के लिए वित्तमंत्री ने कई उपायों की घोषणा की।
सरकार द्वारा बैंकों में नकदी बढ़ाने, सूक्ष्म, लघु एवं मझोली कंपनियों के लिए जीएसटी रिफंड को आसान बनाने, संकट से जूझ रहे वाहन क्षेत्र को राहत देने और सभी पात्र स्टार्टअप कंपनियों तथा उनके निवेशकों को एंजल टैक्स से छूट देने की भी घोषणा की गई। सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए 32 नए उपायों की घोषणा की गई। खासतौर से बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा हुई। उल्लेखनीय है कि 26 अगस्त को अपने 84 साल के इतिहास में पहली बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के द्वारा लाभांश और अधिशेष कोष के मद से 1.76 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार को ट्रांसफर करने का निर्णय लिया गया। आरबीआई के पास संरक्षित 9.6 लाख करोड़ रुपए का अधिशेष कोष है, जिसमें से 1.76 लाख करोड़ रुपए केंद्र सरकार को दिए गए। इस नई पूंजी से सरकार अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने की डगर पर आगे बढ़ी है।
इसी तरह 14 सितंबर को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने निर्यात क्षेत्र में तेजी लाने के लिए कई अहम घोषणाएं कीं। निर्यात बढ़ाने के लिए 50 हजार करोड़ रुपए का फंड बनाया गया। निर्यातकों के लिए ऋण प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए ऋण आवंटन के संशोधित नियम सुनिश्चित किए गए। निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अंतर-मंत्रालयी कार्यसमूह बनाया गया। मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम की जगह निर्यात उत्पाद पर कर की छूट दी गई। बंदरगाहों, हवाई अड्डों पर सामान की आवाजाही सुगम करने के लिए प्रौद्योगिकी के जरिए निर्यात के समय में सरकार कटौती सुनिश्चित की गई। मार्च, 2020 तक एक वार्षिक मेगा शॉपिंग फेस्टिवल आयोजित करने की बात कही गई, जिससे कपड़ा, हस्तशिल्प, चमड़ा आदि क्षेत्रों को लाभ मिल सके।
इतना ही नहीं, बढ़ते आर्थिक संकट को थामने के लिए 20 सितम्बर को वित्तमंत्री सीतारमण ने कॉरपोरेट टैक्स 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी कर दिया। साथ ही नई कंपनियों पर कॉरपोरेट टैक्स 25 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी कर दिया। इससे कंपनियों को करीब 1.45 लाख करोड़ की छूट मिली। इससे निवेश बढ़ाने और छंटनी रुकने की बात कही गई। अब भारत सबसे कम कारपोरेट टैक्स दरों वाले देशों में शामिल हो गया है। इस प्रकार सरकार ने आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए विभिन्न आर्थिक, वित्तीय, बैंकिंग और कार्पोरेट टैक्स संबंधी राहतें दी हैं। रिजर्व बैंक के द्वारा इस साल 7 फरवरी, 4 अप्रैल, 6 जून, 7 अगस्त और 4 अक्तूबर को रेपोरेट में कमी की जा चुकी है।
लेकिन अब देश में घटती हुई मांग को फिर से बढ़ाने के लिए एक ओर मध्यम वर्ग तथा आयकरदाताओं को राहत दी जाना जरूरी है वहीं दूसरी ओर सरकार के द्वारा वर्ष 2019-20 के बजट में जो पूंजीगत व्यय निर्धारित किए गए हैं, वे लक्ष्य के अनुरूप व्यय किए जाएं। सरकार द्वारा छोटे उद्योग-कारोबार के बकाया बिलों का शीघ्र भुगतान किया जाए, साथ ही शीघ्रतापूर्वक नौकरियों के रिक्त पदों को भरने के लिए कदम उठाए जाएं। इससे लोगों की क्रय-शक्ति बढ़ेगी तथा मांग का निर्माण होगा। निश्चित रूप से कारपोरेट टैक्स घटाने के बाद अब पूरा देश नए डायरेक्ट टैक्स कोड और नए इनकम टैक्स कानून को शीघ्र आकार दिए जाने की प्रतीक्षा कर रहा है।
गौरतलब है कि विगत 19 अगस्त को नई प्रत्यक्ष कर संहिता (डायरेक्ट टैक्स कोड-डीटीसी) का मसौदा तैयार करने के लिए गठित टास्क फोर्स के अध्यक्ष अखिलेश रंजन ने अपनी रिपोर्ट वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को सौंप दी। इस रिपोर्ट के अनुसार 5 लाख तक की आय पर जो मौजूदा आयकर छूट है, वह आगे भी जारी रखी जाए। 5 से 10 लाख रुपए तक की वार्षिक आय पर जो मौजूदा 20 फीसदी की दर से आयकर है, उसे घटाकर 10 फीसदी किया जाए। 10 से 20 लाख रुपए तक की वार्षिक आय पर जो मौजूदा 30 फीसदी आयकर की दर है, उसे घटाकर 20 फीसदी किया जाए। इससे मध्यम वर्ग के लोग बड़ी संख्या में लाभान्वित होंगे।

जयंतीलाल भंडारी

चूंकि इस समय देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है, साथ ही अर्थव्यवस्था का संकट अब करों में कमी और प्रोत्साहनों से आगे निकल चुका है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए कुछ बड़े साहसिक और वास्तविक आर्थिक सुधारों की जरूरत है। हम आशा करें कि सरकार शीघ्र ही नए आयकर कानून को आकार देगी, जिससे बड़ी संख्या में आयकरदाता और मध्यम वर्ग के लोग लाभान्वित होंगे और उनकी क्रय शक्ति बढ़ने से अर्थव्यवस्था की सुस्ती कम होगी। हम आशा करें कि सरकार वर्ष 2019-20 के बजट में घोषित पूंजीगत व्यय का लक्ष्य पूरा करेगी। साथ ही हम आशा करें कि सरकार विनिवेश का शत प्रतिशत लक्ष्य पूरा करेगी। इन सबसे ही आर्थिक संकट के समाप्त होने की उम्मीद बढ़ेगी तथा देश की विकास दर बढ़ेगी।

लेखक ख्यात अर्थशास्त्री हैं।


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