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सर्दी में गुनगुनी घुमक्कड़ी

Posted On October - 20 - 2019

अलका कौशिक

घुमक्कड़ी के लिए अच्छे दिन शुरू होते हैं अब! पसीना छुड़ाती गर्मी विदा ले चुकी है और बारिश भी थक चुकी है। शरद के खुशनुमा मौसम ने दस्तक दे दी है। अगले कुछ महीनों में त्योहारों की रेलमपेल, मौसम की नरममिज़ाजी, कुहासे वाली सर्दी, कोहरे की सफेद झालर के उस पार का रोमांस साकार होने को है। कैसे मना रहे हैं साल के इस नए मौसम का जश्न? कैसे करेंगे सर्दियों का आगाज़? बहुत से टूरिस्ट डेस्टिनेशन हैं जो आपको आवाज़ दे रहे हैं….
गुजरात है पर्यटन का संपूर्ण पैकेज
केरल और गोवा जैसे राज्यों ने खुद को ट्रैवलर्स के बीच खूब अच्छी तरह लोकप्रिय बना लिया है और देसी ही नहीं, विदेशी टूरिस्टों की बकेट लिस्ट में भी ये दोनों ठिकाने शुमार रहते हैं। वहीं गुजरात जैसी मंजि़लें भी हैं जो हौले से कह जाती हैं –कुछ दिन तो गुज़ारो गुजरात में। पश्चिम भारत के इस राज्य में ही है देश की पहली यूनेस्को–वर्ल्डज हेरिटेज सिटी यानी अहमदाबाद। शहर में हेरिटेज वॉक के बहाने प्राचीन मस्जिदों, सरोवरों, बावड़ि‍यों, मंदिरों और पुराने मोहल्लों-बाज़ारों को टटोल आइये।
आसपास ही पाटन है जहां पटोला बुनाई की विरासत आज भी संभली हुई है। पटोला साड़ी के मुरीदों की मनपसंद मंजि़ल है पाटन। खरीदारी के लिए वडोदरा, राजकोट, भुज के बाज़ार हैं और नमक का चमकीला रेगिस्तान सीने पर सजाए कच्छ भी इसी गुजरात में है। 28 अक्तूबर से 3 फरवरी तक यहां रण उत्सव की धूम रहेगी। फिर मकर संक्रांति पर अहमदाबाद का काइट फेस्टिवल (पतंग उत्सव) अपने रंगबिरंगे आसमान को सिर पर धरे आपकी मेज़बानी के लिए सज जाएगा।
वेजीटेरियन हैं तो…
एक से एक गुजराती फरसाण, चाट-पकौड़ी के अलावा गुजराती थाली मुंह में पानी लाने के लिए काफी है। आपको जानकर अचरज होगा कि इस विशाल राज्य के अलग-अलग भागों का खानपान भी अलग हैं, मसलन सौराष्ट्र में अलग किस्म के व्यंजन अपने खास अंदाज़ में पकाए जाते हैं तो क‍ाठियावाड़ी थाली का मिज़ाज अलग होता है।
मौका लगे तो गांधी की विरासत से मिल आइये। अगर बच्चों के संग पर्यटन पर निकलना हो तो गांधी ट्रेल के लिए गुजरात से बेहतर कुछ नहीं है। साबरमती आश्रम से दांडी तट और पोरबंदर के समंदर तक हो आइये। शुरुआत गांधीनगर के महात्मा मंदिर से की जा सकती है। गुजरात में लोथल, धौलावीरा, रंगपुर में हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यहीं महमूद बेगड़ा का बसाया चांपानेर शहर है जो पावागढ़ पहाड़ी की तलहटी में बसा है। पहाड़ी पर स्थित है कलिका माता का मंदिर जो शक्तिपीठ भी है। चांपानेर-पावागढ़ को यूनेस्को ने 2004 में विश्व विरासत स्थल घोषित किया था।
इतिहास और पुरातत्वी में रुचि रखने वालों के लिए ये मंजि़लें महत्वपूर्ण हैं। गिर वन में एशियाई शेर या लिटल रन में जंगली गधों के बहाने ऐसे वन्य जीवन के दर्शन होते हैं जो देश में अन्य नहीं मिलते। एकाध दिन के लिए गुजरात के इकलौते हिल स्टेशन सापूतारा भी आया जा सकता है और राजसी वैभव देखना हो तो वडोदरा का लक्ष्मी विलास पैलेस, राजकोट में गोंडल पैलेस, नवलखा पैलेस और रिवरसाइड पैलेस, भावनगर का विजय विलास पैलेस तो कच्छ का आईना पैलेस और प्राग महल बीते दौर की विलासिता को बखूबी प्रदर्शित करने वाले राजमहल हैं और यहां आना बनता है।
क्या नहीं है गुजरात में!
फर्राटा दौड़ती सड़कों पर रोड ट्रिप का मज़ा लेने से लेकर खानपान और खरीदारी का लुत्फ यहां जमकर उठाया जा सकता है। धार्मिक पर्यटन के लिए अंबाजी, द्वारकाधीश और सोमनाथ का ऐतिहासिक मंदिर भी है।
दीव-अरब सागर के किनारे
हिंदुस्तान के पश्चिमी तट पर खंभात की खाड़ी से सटा है दीव। अरब सागर को तकते इस खूबसूरत शहर को 15वीं सदी में पुर्तगालियों ने बसाया था।
पुराने पुर्तगाली किले के अलावा इसके समुद्र तट आपको लुभाएंगे। अक्तूबर से मार्च तक के महीने दीव की सैर के लिए बेहतर हैं। दीव की सैर के लिए 2 दिन काफी हैं।
दक्षिण भारत में मंज़िलों की सैर
भूमध्य रेखा पर और उसके पार गर्मियों का प्रकोप सर्दी की ठिठुरन में कम पड़ जाता है। यानी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पांडिचेरी, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक में अब सुकून से वैकेशन प्लानिंग हो सकती है। ये राज्य देश की सांस्कृतिक झांकी पेश करने के लिहाज़ से भी आगे हैं।
हंपी नहीं देखा तो क्या देखा!
14वीं सदी का यह शहर कभी का खंडहर हो चुका है मगर आज भी उसकी जीर्णशीर्ण दीवारें, मंदिर, बावलियां, बाज़ार, मीनारें, चौबारे, फव्वारे और राजमहल उसके वैभव का बयान करते हैं। करीब 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हंपी 14वीं से 16वीं सदी में बसे विजयनगर साम्राज्य की राजधानी है। इतिहास प्रेमी हैं तो इसे तसल्ली से देखने के लिए 2 से 3 दिन यहां बिताइये क्योंकि हंपी की सैर का वक़्त शुरू होता है अब यानी अक्तूबर से फरवरी तक। हंपी और आसपास ठहरने के लिए लग्ज़री होटलों से लेकर बैकपैकर हॉस्टअल्सू और मिडरेंज होटल, होम स्टे उपलब्ध हैं। आप अपना सफर विरुपाक्ष मंदिर से शुरू कर सकते हैं जो न सिर्फ इसके प्रमुख आकर्षणों में से एक है बल्कि हंपी का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां आज भी पूजा होती है। हंपी के पुराने बाज़ार से होते हुए इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है और फिर कृष्णा, विट्ठल, हजारा राम मंदिर, राजा का तराजू, टकसाल, लक्ष्मी-नरसिम्हा की प्रतिमा और शिव मंदिरों को देखते हुए मकुटा की पहाड़ियों से ढलते दिन का सूर्यास्त अपनी यादों में उतारना मत भूलना।

तमिलनाडु और आंध्र में आध्यात्मिक खुराक
टैम्पल ट्रेल यानी मंदिरों के दर्शन के लिए तमिलनाडु देसी-विदेशी सैलानियों को मंत्रमुग्ध करता आया है। चेन्नई के नज़दीक सागर तट पर स्थित महाबलिपुरम तो खास है ही, इसके अलावा आप ‘महान जीवित चोल मंदिरों’-तंजावुर में वृहदेश्वर मंदिर, दारासुरम में ऐरावतेश्वर और गंगईकोंडा चोलीश्वरम मंदिरों को देख सकते हैं। नज़दीक ही त्रिची का श्रीरंगम मंदिर है तो चेन्नई से 3 घंटे की दूरी पर चिदंबरम नटराज मंदिर में शिव नर्तक मुद्रा-नटराज रूप में स्थित है। आंध्र प्रदेश में तिरुपति और श्रीशैलम मल्लिकार्जुन जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा अक्तूबर से फरवरी के महीनों में सुखद होती है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ ही आप हैदराबाद का ट्रिप भी जोड़ सकते हैं।
बच्चे साथ हैं तो हैदराबाद से 42 किलोमीटर दूर स्थित रामोजी फिल्मसिटी जाना न भूलें जहां पूरे परिवार के लिए एंटरटेनमेंट की भरपूर खुराक मिलती है। फिल्मसिटी में बजट, मीडियम और लग्ज़री होटल भी उपलब्ध है। यहां ओवरनाइट स्टे काफी है। हैदराबाद से लगभग 125 किलोमीटर दूर वारंगल भी जा सकते हैं जहां वारंगल फोर्ट और हज़ार स्तंभों वाला ऐतिहासिक मंदिर दर्शनीय है। इसके लिए एक दिन काफी है। यानी आप हैदराबाद को बेस बनाकर इन जगहों की सैर कर सकते हैं।
नॉर्थ-ईस्ट में खो जाइये
मणिपुर का संगई फेस्टिवल (21-30 नवंबर) और नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल (1-10 दिसंबर) बस आने को है। इन लोकल फेस्टिवल्स के बहाने पूर्वोत्तर में सुदूर बसे इन दो राज्यों को नज़दीक से देखा-समझा जा सकता है। यहां का पहनावा, खानपान तो शेष भारत से जुदा है ही, उनका फैशन, रहन-सहन, संस्कृति में भी बहुत फर्क है। अपने ही देश के इस हिस्से से वाकफियत बढ़ाने इस बार चले आइये। और हां, इन आदिवासी समाजों की मोहिनी मुस्कान, मासूम अदाएं और बिंदास तबीयत आपको वाकई अचंभित कर डालेगी। इंफाल और दीमापुर हवाई अड्डे देश के अन्य भागों से क्रमश: मणिपुर तथा नागालैंड तक हवाई संपर्क की सुविधा देते हैं।
वाइज़ैग से अरकू वैली
समंदर की लहरों से आशना होने का दिल है लेकिन मुंबई, गोवा, चेन्नई, केरल के रटे-रटाए बीच, रेसोर्ट या कोस्टली टाउन से दूर रहना है तो इस बार नए समुद्री तटों का रुख करें। आंध्र प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर वाइजैग (विशाखापत्तनम) देश के रेल-हवाई नेटवर्क से जुड़ा है और कमोबेश कम टूरिस्ट इस तरफ आते हैं। शहर के बीचोंबीच रामकृष्‍ण या आरके बीच है जो स्थानीय लोगों के बीच खासा लोकप्रिय है। तट के उस पार लहरें हिलोरें लेती हैं और इस ओर शहर मचलता है। देश का पहला पनडुब्बी संग्रहालय-आईएनएस कुर्सुरा इसी तट पर है। और वाइज़ैग में यॉटिंग फेस्टिवल भी तो इसी तट पर आयोजित किया जाता है। एडवेंचर और मौज-मस्ती की इस खुराक को लेने चले आइये इस तरफ।
एक शाम इस तट के नाम कर रुशिकोंडा बीच, भीमली बीच देखने निकल जाएं। समुद्र की खारी हवा से जी भर जाए तो करीब तीन घंटे दूर बसी अरकू घाटी के सफर का ख्याल बुरा नहीं है। धुंध में लिपटी इस घाटी के रोमांस को और बढ़ाने हर साल जनवरी में यहां हॉट एयर बैलून फेस्टिवल भी आयोजित किया जाता है।
पुणे से शिलॉन्ग तक पर्यटन
जितने यात्री, उतनी ही या‍त्राओं की वजहें। किसी को पहाड़ चाहिए, किसी की ख्वाहिशों में बसा है समंदर, या दिलफरेब शहर, या कोई नायाब मेला, उत्सव, समारोह, इवेंट, फेस्टिवल। तो अब आ रहे हैं ऐसे ढेर सारे म्यूजि़क फेस्टवल जिनके बहाने देश का कोई नया शहर आपकी अगली यायावरी मंजि़ल बन सकता है। मसलन, वाराणसी में 22 से 24 नवंबर के दौरान गंगा किनारे कबीरा फेस्टिवल के बहाने घाटों पर जमेगा सुरताल का मेला। पुणे में 29 नवंबर से 1 दिसंबर तक एनएच 7 वीकेंडर म्यूजि़क फेस्टिवल की धूम रहेगी। फेस्टिवल डायरेक्टर सुप्रीत कौर ने बताया कि इस बार इस संगीत समारोह का यह 10वां संस्करण है जो पुणे, शिलांग, हैदराबाद, बेंगलुरु जैसे शहरों में अपार सफलता बटोरने के बाद एक बार फिर युवा दिलों से लेकर प्रौढ़ों को सम्मोहित करने आ रहा है। इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी तो रहती ही है, साथ ही दूरदराज़ के शहरों से भी अपने मनपसंद कलाकारों को देखने-सुनने के लिए संगीत के कद्रदान इन फेस्टिवल्स में पहुंचते हैं। लोग महीनों पहले टिकट खरीदने, होटल-ट्रैवल बुकिंग कराते हैं और बाकायदा किसी त्योहार की तरह फेस्टिवल्स में शिरकत करते हैं।
देर शाम से रात तक म्यूजि़क फेस्टिवल में शिरकत करना और दिनभर शहर के दूसरे आकर्षणों में खो जाना, फूड वॉक या हेरिटेज वॉक पर निकल पड़ना आपके सफर को नया अंदाज़ देगा। गोवा में सनबर्न फेस्टिवल (27 से 29 दिसंबर या सेरेन्डिपिटी आर्ट्स फेस्टिवल (15 से 22 दिसंबर), नासिक में सुला विनियार्ड्स में सुला फैस्टल (1-3 फरवरी, 2020) का हिस्सा बनकर नई मंजि़लों को टटोलने का ख्याल बुरा नहीं है।
औली में स्कीइंग का लुत्फ
सर्दी और बर्फबारी जिन्हें रोमांटिक लगती है, उनके लिए भी देश में कई मंजि़लें हैं। साथ में एडवेंचर भी जोड़ना चाहें तो उत्तराखंड में औली की बर्फीली ढलानों पर स्कीइंग का आइडिया ज़ोरदार है। पहले से ही जीएमवीएन (गढ़वाल मंडल विकास निगम) में बुकिंग करवा लें ताकि स्कीइंग कोर्स में सीट और औली में ठहरने का पुख्ता इंतज़ाम रहे।
दिल्ली की सैर का मुफीद समय
देश की राजधानी दिल्ली घूमने का भी यही समय सबसे बेहतरीन होता है। इसकी रौनकों, बाज़ारों, पार्कों, स्मा‍रकों और गलियों के साथ-साथ खानपान का लुत्फ‍ लेने चले आइये। चकाचौंध वाली दिल्ली ने अपने सीने में ही भव्य अतीत के कितने राज़ छिपा रखे हैं, उन्हें जानने के लिए किसी हेरिटेज वॉक से जुड़ जाना न भूलें। पुराने किले में साउंड एंड लाइट शो–इश्क-ए-दिल्ली से लेकर अक्षरधाम मंदिर, गार्डन ऑफ फाइव सैन्सेज़ में गार्डन फेस्टिवल, आईजीएनसीए में नॉर्थ ईस्ट फेस्टिवल या साहित्य उत्सवों के अलावा नेहरू पार्क में ‘म्यूजि़क इन द पार्क’ जैसे आयोजनों में शिरकत कर पर्यटन के नए मुहावरे गढ़िए। वाकई मौसम का भरपूर आनंद उठाने, आउटडोर एडवेंचर का हिस्सा बन जाने और अपने देश को जानने-समझने का यही सही वक्त है। तो लीजिए विंटर टूरिज़्म का भरपूर आनंद।


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