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सत्ता का महाभारत

Posted On October - 21 - 2019

राजकुमार सिंह

संदीप जोशी

वह घड़ी आ गयी, जिसका इंतजार था। नेताओं के दावे-वादे बहुत सुन लिये, अब मतदाताओं के फैसले की बारी है। हरियाणा के मतदाता आज नयी विधानसभा और भावी सरकार की बाबत फैसला करेंगे। बेशक जनादेश का खुलासा 24 अक्तूबर को मतगणना से हो पायेगा, लेकिन मतदाता पसंदीदा बटन दबाकर भावी विधायकों, और उनके जरिये अंतत: भावी सरकार का भाग्य भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में आज ही बंद कर देंगे। हर चुनाव दिलचस्प होता है और महत्वपूर्ण भी, लेकिन महाभारतकाल में धर्मयुद्ध कुरुक्षेत्र की साक्षी बनी हरियाणा की पावन धरती की राजनीति के लिए यह चुनाव संभवत: निर्णायक साबित होने जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के तीन ओर बसे हरियाणा की राजनीतिक दशा-दिशा प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक दशा-दिशा भी तय करेगी। बीते 5 साल का अनुभव भी यही बताता है कि जब सत्ता राजनीति की दिशा बदलती है तो बहुत कुछ बदलता है। गुण-दोष पर बहस को बाद के लिए छोड़ दें तो भी इस सच से मुंह चुरा पाना मुश्किल है कि वर्ष 2014 से 2019 के बीच हरियाणा की राजनीतिक दशा-दिशा पूरी तरह बदल चुकी है। इस दौरान हुए सामाजिक-आर्थिक बदलाव भी स्पष्ट नजर आ रहे हैं।
हरियाणा में दक्षिणपंथी राजनीति की जड़ें जनसंघ के काल से ही रही हैं। भाजपा बनने के बाद तो उसे कभी बंसीलाल, कभी देवीलाल और कभी ओमप्रकाश चौटाला की सरकार में हिस्सेदारी भी मिलती रही है। हां, उसकी हैसियत हमेशा दूसरे नंबर की रही। यह हैसियत बदली अक्तूबर, 2014 में, जब चंद महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों से ही चली मोदी लहर में भाजपा को अकेलेदम हरियाणा विधानसभा चुनाव में बहुमत मिल गया। लोकसभा चुनाव परिणाम के आलोक में भले ही कुछ लोगों को वह जनादेश स्वाभाविक लगा हो, लेकिन सच यही है कि वह था पूरी तरह अप्रत्याशित। इसलिए नहीं कि हरियाणा की राजनीति में अकसर जाट समुदाय का दबदबा रहा है, जबकि भाजपा का परंपरागत जनाधार ब्राह्मण-वैश्य-राजपूत समुदाय और शहरों तक ही सीमित माना जाता रहा। आखिर इससे पहले भजनलाल लंबे समय तक गैर जाट मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना ही चुके थे। अक्तूबर, 2014 का जनादेश अप्रत्याशित इसलिए था, क्योंकि भाजपा को तो लोकसभा की 10 में से भी आधी सीटों के लिए दूसरे दलों से प्रत्याशी आयात करने पड़े थे, फिर भला 90 विधानसभा सीटों के लिए जिताऊ प्रत्याशी कहां से लाती‌?
भले ही ज्यादातर राजनीतिक प्रेक्षक डेरा सच्चा सौदा के समर्थन को भाजपाई बहुमत में निर्णायक मोड़ मानते हों, लेकिन हरियाणा के इतिहास में पहली बार भाजपा को सत्ता मिली थी। और कटु सत्य यह भी है कि मोदी लहर और डेरे के समर्थन के बावजूद यह सत्ता मात्र दो विधायकों के बहुमत पर ही टिकी थी, क्योंकि 90 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के मात्र 47 विधायक ही चुन कर आये। भले ही अपने चरित्र के मुताबिक बाद में कुछ निर्दलीय भी भाजपा के निकट चले गये, लेकिन मुख्य विपक्षी दल के रूप में इनेलो को मिलीं 18 सीटें और 10 साल के शासन के बाद कांग्रेस को मिलीं 15 सीटें इस बात का प्रमाण थीं कि पहली बार विधायक और मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर की राह आसान नहीं होगी। कार्यकाल का पूर्वार्द्ध आसान रहा भी नहीं। खुद को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानने वाले भाजपाई दिग्गज तो खट्टर को पचा ही नहीं पा रहे थे, जाट आरक्षण आंदोलन, रामपाल प्रकरण और राम रहीम कांड भी बड़ी चुनौतियों के रूप में सामने आये। खासकर जाट आरक्षण आंदोलन हिंसा का सामाजिक सौहार्द पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसका असर राजनीति पर भी दिखा। बहरहाल भाजपा आलाकमान, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वास की बदौलत खट्टर मजबूती से सत्ता में बने रहे। बेशक इस दौरान स्थानीय निकाय एवं मेयर चुनावों तथा जींद उपचुनाव में मिली जीत से खट्टर का आत्मविश्वास भी बढ़ा और प्रतिद्वंद्वियों में उनका कद भी।
चुनावी परीक्षा में सफलता से बढ़ते आत्मविश्वास में निर्णायक भूमिका निभायी इसी साल हुए सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव ने। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 10 में से सात सीटें जीती थीं। इस बार भी उसे पिछले प्रदर्शन को ही दोहराने का भरोसा था। कांग्रेस ने भी अपने तमाम दिग्गजों को मैदान में उतार कर कड़ी चुनौती पेश करने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने सभी 10 सीटों पर जीत हासिल कर दूसरों के साथ-साथ खुद को भी चौंका दिया। राष्ट्रवाद के मुद्दे पर देशभर में चली मोदी लहर में पूरे हरियाणा में खिले कमल का ही यह परिणाम था कि मुख्यमंत्री खट्टर विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही रथ लेकर जन-आशीर्वाद यात्रा पर निकल पड़े। एक ओर चौटाला परिवार के कलह में इनेलो दोफाड़ हो चुकी थी और भूपेंद्र सिंह हुड्डा-अशोक तंवर के बीच वर्चस्व की जंग में कांग्रेस में भी टूट की आशंका गहरा रही थी तो दूसरी ओर खंडित विपक्ष से बेफिक्र मुख्यमंत्री ‘अबकी बार 75 पार’ का नारा लगाते हुए सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में रथयात्रा कर रहे थे। राजनीतिक प्रेक्षक भी मानते हैं कि अगस्त तक हालात कुछ ऐसे ही थे कि 75 प्लस सीटें भी भाजपा के लिए असंभव मिशन नहीं लग रही थीं। आखिर जींद उपचुनाव के बाद इनेलो से गठबंधन तोड़ कर राजकुमार सैनी की लोसुपा से जोड़ने वाली मायावती की बसपा लोकसभा चुनाव के बाद उसे भी झटका देकर दुष्यंत चौटाला की जजपा से हाथ मिलाकर उससे भी किनारा कर चुकी थीं। जजपा और आप की बात भी नहीं बनी थी तो हुड्डा कांग्रेस आलाकमान को प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन का अल्टीमेटम दे रहे थे, यानी लोकसभा चुनाव में चारों कोने चित्त रहा विपक्ष बिखराव के लिए अभिशप्त नजर आ रहा था तो सत्ता सिंहासन पर विराजमान भाजपा अति आत्मविश्वास की शिकार बनती दिख रही थी। विपक्षी मतों का बिखराव आखिरकार सत्ता के लिए भाजपा की राह आसान ही बनायेगा-यह समझने के लिए किसी शोध की जरूरत तो नहीं ही होनी चाहिए।
विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा तक भी हालात कमोबेश यही थे, लेकिन आज जबकि मतदान की घड़ी है, चुनाव इतना दिलचस्प हो गया है कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं और परंपरागत समर्थकों के अलावा शायद ही कोई स्पष्ट बहुमत से भाजपा की सरकार बन सकने की भविष्यवाणी करने का जोखिम मोल लेना चाहे। इसके कुछ कारण भी गोपनीय नहीं हैं। मुख्यमंत्री की जन-आशीर्वाद यात्रा के दौरान 75 प्लस के नारे को मिले समर्थन से अति आत्मविश्वास की शिकार भाजपा ने टिकट वितरण में कई रणनीतिक गलतियां की हैं, जिसका असर चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में साफ दिखने भी लगा। टिक-टॉक स्टार को टिकट को अलग तरह की साफ-सुथरी राजनीतिक संस्कृति की वाहक पार्टी कैसे तर्कसंगत ठहरा सकती है-समझ से परे है। अकेलेदम बहुमत की सरकार बनाने-चलाने के बाद, और फिर लोकसभा चुनाव में सभी 10 सीटें भी जीत लेने के बाद भाजपा को निर्दलीय और विपक्षी विधायकों को पार्टी में शामिल करने के लिए पलक-पांवड़े बिछाने की क्या जरूरत थी-समझ से बाहर है। विपरीत विचारधारा वालों के ऐसे स्वागत से भाजपा की छवि पर तो सवाल उठे ही, पुराने समर्पित कार्यकर्ता निराश भी हुए। सभी दलबदलुओं को टिकट दे पाना संभव ही नहीं था। ऐसे में टिकट से वंचित अपनों के साथ-साथ ये नये चाहवान भी बगावत और भितरघात में जुट गये, जिससे भाजपा का सिर्फ और सिर्फ चुनावी नुकसान ही हो सकता है। और यह होता दिख भी रहा है।
स्थानीय चुनावों से लेकर जींद उपचुनाव तक खट्टर सरकार की पारदर्शी नीतियों, खासकर मैरिट पर नौकरियों और ऑनलाइन ट्रांसफर का असर जन मानस में साफ दिख रहा था। ये मुद्दे हालिया लोकसभा चुनाव में भी उठाये गये, पर मान लेना चाहिए कि वे चुनाव पूरी तरह राष्ट्रवाद के मुद्दे और मोदी के नाम पर लड़े गये, जिनका कोई जवाब विपक्ष के पास नहीं था। ऐसे में परिणाम शायद वही हो सकता था, जो हुआ। पर अब विधानसभा चुनाव में मतदान की तारीख आते-आते परिदृश्य तेजी से बदलता दिख रहा है। विधानसभा चुनावों में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा प्रचार अथवा अपने ही दल की केंद्र सरकार की उपलब्धियों पर वोट मांगने में गलत तो कुछ भी नहीं है, लेकिन इससे प्रदेश नेतृत्व और सरकार की सीमाएं तो उजागर हो ही जाती हैं। अंतिम सप्ताह में भाजपा का पूरा चुनाव प्रचार राज्य सरकार की उपलब्धियों के बजाय बालाकोट, तीन तलाक और धारा 370 सरीखे केंद्र सरकार के फैसलों तथा विपक्ष की कमजोरियों तक सिमट जाने से जाहिर है कि हरियाणा में विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए वॉकओवर यानी एकतरफा नहीं रह गये, जैसे कि अगस्त-सितंबर तक नजर आ रहे थे। चुनावी संघर्ष कितना कड़ा हो गया है, इसका अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री के अलावा आज उनके किसी मंत्रिमंडलीय सहयोगी की जीत सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती।
कहना नहीं होगा कि चुनावी परिदृश्य में इस बदलाव का बड़ा कारण विपक्ष द्वारा स्थानीय मुद्दों का उभार तो है ही, कांग्रेस द्वारा प्रदेश नेतृत्व में किये गये परिवर्तन का असर भी दिख रहा है। इस परिवर्तन पर प्रतिक्रिया में अशोक तंवर कांग्रेस से इस्तीफे की हद तक चले जायेंगे—इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही होगी। यह मानना नादानी होगी कि तंवर की बगावत का कांग्रेस की संभावनाओं पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, लेकिन वह बहुत व्यापक नहीं दिखता। सैलजा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और भूपेंद्र सिंह हुड्डा को विधायक दल का नेता बनाये जाने का बड़ा असर तो यही हुआ है कि अंतर्कलह से हताश हो कर बैठ गये कार्यकर्ता फिर से मैदान में आ गये हैं। जब कांग्रेस सक्रिय दिख रही है तो भाजपा से असंतुष्ट मतदाताओं को एक विकल्प भी नजर आ ही रहा है। यही कारण है कि अगस्त तक दो अंकों में भी न पहुंचती दिख रही कांग्रेस आज निवर्तमान विधानसभा से बेहतर प्रदर्शन की आस जगा रही है। कारण तो कांग्रेस ही बेहतर जानती होगी, पर टिकट वितरण में गलतियां उसने भी कम नहीं कीं। जनाधार वाले कांग्रेसियों को भी टिकट देने से इनकार दरअसल कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर संदेह और सवाल ही उठाता है। फिर भी अगर कांग्रेस आधी से भी ज्यादा विधानसभा सीटों पर भाजपा को टक्कर देती नजर आ रही है तो जमीनी राजनीतिक हकीकत का अंदाजा लगा पाना मुश्किल नहीं रह जाता।
दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों के अलावा प्रदेश स्तर पर यह चुनाव इनेलो, जजपा और लोसुपा के लिए महत्वपूर्ण है। चौटाला परिवार में कलह के बाद इनेलो से अलग होकर अजय सिंह चौटाला परिवार द्वारा बनायी गयी जजपा जींद उपचुनाव में दूसरे नंबर पर रहने के अलावा अपनी चुनावी छाप छोड़ने में नाकाम रही है। विधानसभा चुनाव यह तय करेगा कि चौधरी देवीलाल का असली राजनीतिक वारिस उनके अनुयायी-समर्थक किसे मानते हैं। इसमें दो राय नहीं कि इनेलो का कॉडर, खासकर युवा जजपा के साथ नजर आ रहे हैं, पर यह साथ लंबा तभी चलेगा, जब दुष्यंत चौटाला अपने बेहतर राजनीतिक भविष्य का कोई ठोस संकेत इन चुनावों में दे पायेंगे। तमाम हाथ-पैर मारने के बावजूद जजपा कोई प्रभावी गठबंधन इन चुनावों में नहीं कर पायी। इसके बावजूद दुष्यंत ने भाजपा और कांग्रेस के संभावनाशील बागियों पर दांव लगाकर राजनीतिक चतुराई का परिचय तो दिया है। अंतिम क्षणों में अशोक तंवर द्वारा भी जजपा का समर्थन करने से भी शायद उन्हें कुछ लाभ मिल पाये। जनादेश मतदाताओं को देना है, और उसका खुलासा 24 अक्तूबर को मतगणना से होना है, लेकिन चुनावी परिदृश्य इतना संकेत अवश्य दे रहा है कि सत्ता का यह महाभारत एकतरफा नहीं रहा। कांग्रेस और जजपा ने अपनी-अपनी तरह से सत्तारूढ़ भाजपा को कड़ी चुनौती देने की कोशिश की है, पर बहुत देर से की गयी ये कोशिशें बहुत सीमित प्रभाव-परिणाम की ही उम्मीद जगाती हैं यानी भाजपा, कांग्रेस, जजपा क्रमश: पहले, दूसरे, तीसरे स्थान पर भी रहें, पर उनमें फासला अच्छा-खासा रहने वाला है। ध्यान रहे द्वापर युग में हुआ महाभारत धर्म और सत्य के लिए था, जबकि कलयुग में हुआ यह महाभारत सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए है।

 

दांव पर परिवारों की साख

 

इस बार विधानसभा चुनाव में हरियाणा के दिग्गज सियासी परिवारों की साख दांव पर है। प्रदेश के तीनों लाल परिवारों के कई सदस्य चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। देवीलाल के पुत्र, पौत्र, पौत्रवधु और परपौत्र, बंसीलाल के बेटे और बहू तथा भजनलाल के दोनाें बेटे चुनाव लड़ रहे हैं।

देवीलाल परिवार

 

 

 

आदित्य देवीलाल (पौत्र)
देवीलाल के पौत्र आदित्य भाजपा के टिकट पर डबवाली से चुनाव लड़ रहे हैं। वे देवीलाल के बेटे जगदीश के बेटे हैं। आदित्य अपने नाम के पीछे देवीलाल लगाते हैं।

 

 

बंसीलाल परिवार

 


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