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विश्वास के रिश्ते

Posted On October - 8 - 2019

भारत-बांग्लादेश और करीब
कहा जा सकता है कि भारत और बांग्लादेश की रिश्ते सबसे बेहतर दौर में हैं। हालांकि, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना तीस्ता नदी जल बंटवारे तथा एन.आर.सी. मुद्दे पर अपने देश की चिंताओं के बीच भारत आईं, मगर इसके बावजूद बेहतर माहौल में सात समझौते हुए। दोनों ही प्रधानमंत्री चुनाव के बाद बनी नई सरकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति से मुलाकात के साथ ही सात समझौते हुए। उल्लेखनीय है कि पिछले एक साल में वीडियो कॉनफ्रेंसिंग के जरिये बांग्लादेश के साथ साझा परियोजनाओं के नौ समझौते हो चुके हैं। इस बार जहां पूर्वोत्तर के लिये रसोई गैस आपूर्ति व त्रिपुरा के लिये पेयजल आपूर्ति पर समझौता हुआ, वहीं सीमा सुरक्षा के लिये कंटीली बाढ़ लगाने के काम में तेजी लाने पर सहमति बनी जो दोनों देशों के बीच गहरे होते संबंधों का ही परिचायक है। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के मुद्दे पर बांग्लादेश ने दो टूक शब्दों में इसे भारत का अंदरूनी मामला बताकर हमारे रुख का समर्थन ही किया था। पहले ही लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों का दबाव झेल रहे बांग्लादेश में इस बात को लेकर चिंता जरूर व्यक्त की जा रही थी कि यदि एन.आर.सी. लागू होने के बाद बांग्लादेशियों को सीमा पार भेजा जाता है तो यह देश और शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा पायेगा। बताया जाता है कि इस बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के बीच संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान अलग से बातचीत हुई। इसमें मोदी ने हसीना को आश्वस्त किया कि यह प्रक्रिया सुप्रीमकोर्ट के निर्देशानुसार हो रही है। ऐसे में इस मुद्दे पर दोनों देशों में किसी तरह का टकराव देखने में नहीं आया। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दोनों देशों के संबंध बेहतरीन दोस्ती का उदाहरण हैं।
नि:संदेह बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता में लौटने के बाद दोनों देशों के संबंधों में सकारात्मक बदलाव आया है। खासतौर पर बांग्लादेश की धरती में पूर्वोत्तर के अलगाववादियों की गतिविधियों पर रोक लगी है। यह बात अलग है कि तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे का मुद्दा अधर में लटका है, जिसके मूल में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अड़ियल रवैया रहा है। बांग्लादेश भारत का विश्वसनीय मित्र बना रहे, इस समस्या का समय रहते समाधान निकाला ही जाना चाहिए। बहरहाल, पूर्वोत्तर को एलपीजी की आपूर्ति, जल संसाधन, संस्कृति, युवा मामलों, शिक्षा व तटीय निगरानी के लिये दो दर्जन रडार प्रणाली लगाने जैसे महत्वपूर्ण समझौतों का होना दोनों देशों के बेहतर होते रिश्तों का ही परिचायक हैं। एक साल में एक दर्जन संयुक्त परियोजनाओं की शुरुआत इन संबंधों का विस्तार ही है। दोनों ही देशों ने शांति और सुरक्षा के मुद्दों पर प्रतिबद्धता जाहिर की है। साथ ही रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सहमति बनी कि इनकी म्यांमार स्थित रखाइन प्रांत में वापसी होनी चाहिए। व्यापारिक समझौते के तहत चटगांव व मंगला बंदरगाह को भारतीय जहाजों के माल ढुलाई के लिये खोलना भी बड़ी उपलब्धि है, जिससे पूर्वोत्तर भारत में सामान की आपूर्ति की लागत कम होगी। नि:संदेह आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिये दोनों देशों में हुआ समझौता शांति व सुरक्षा के नजरिये से महत्वपूर्ण है। इसमें बांग्लादेश से लगी समुद्री सीमा की निगरानी भी शामिल है, जिससे पाक समर्थित आतंकवादियों के मंसूबों को नाकाम करने में मदद मिलेगी। नि:संदेह पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाइयां हुई हैं। इस मुद्दे पर दोनों देशों में सहमति होना दोनों देशों की सुरक्षा के लिहाज से बड़ी बात है। बहरहाल, बांग्लादेश में चीन द्वारा प्रभाव के विस्तार के मुकाबले के लिये दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते बनाना वक्त की जरूरत भी है। चीन न केवल बांग्लादेश में बड़ा निवेश कर रहा है बल्कि उसकी बंदरगाहों के इस्तेमाल से अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने की कोशिश में है।


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