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लड़ाके, धमाके और वोटर की भड़ास

Posted On October - 10 - 2019

शमीम शर्मा

मोदी हाल ही में अमेरिका क्या गये कि उनका हाथ ट्रम्प के हाथों में देखकर एक भाई से कहे बिना नहीं रहा गया—न्यूं दीखै अक ईबकै अमेरिका मैं भी मोदी सरकार आवैगी। पर हरियाणा की राजनीति में हाथ पकड़ने की बजाय नेता मरखनी गाय की तरह हाथ छुड़ा-छुड़ा कर भाग रहे हैं। यूं तो राजनीति में बगावत के धमाके होेते ही रहते हैं पर इस बार तो ऐसा आभास हुआ मानो सारे ही नेता लड़ाके हो चुके हैं और बिना धमाके के कोई बात ही नहीं कर रहा है। तभी तो चुनावों से पहले ही अधिकांश नेता आपस में ही लड़े। लड़े ही नहीं बल्कि बुरी तरह भिड़ भी गये। दोफाड़ तो दुनिया होती आई है पर हमारे नेता तो कई-कई फाड़ हो गये और पार्टियां टुकड़े-टुकड़े।
चुनाव लड़ने की तैयारियों की तो इस बार नेताओं को फुर्सत ही नहीं मिली और वे टिकटों के लिये आपस में ही लट्ठम-लट्ठा होते रहे। कुछ सफाई दे-देकर लड़ते-भिड़ते रहे, कुछ तर्क देकर, कुछ धमकियां देकर। कोई अपनी लहर का हवाला देता रहा है तो कोई नहर का। पर कइयों का टैम तो इसा माड़ा चाल रह्या है अक सारे नुकते फेल हो गये और बेचारे बैठे के बैठे रह गये। जिन्हें टिकट नहीं मिली, वे रेलवे और बस की टिकट लेते दिखे।
अब राजनीतिक गलियारों में एक दावा यह है कि युवा वोटरों की संख्या ज़्यादा है। इसी बात का फायदा उठाकर एक-एक युवा यही कह रहा है कि चपड़ासी की भर्ती के लिये जानलेवा टेस्ट लेने वालों का भी 21 अक्तूबर को एग्ज़ाम है। पीएच.डी. पास को माली-चपड़ासी लगाये जाने के सवाल पर नेताओं का जवाब है कि जिस तरह से पीएच.डी. हो रही है तो उसी हिसाब से नौकरी मिल रही है। पर चुनावी वेला में छोटे-बड़े सभी नेताओं का एक-एक उत्तर उनके वोटों की सानी सी काट देगा।
मतदाता मतदान की वेला में हर चीज़ को तोल रहे हैं और बेधड़क होकर बोल रहे हैं। या यूं कहें कि अपनी पूरी भड़ास निकाल रहे हैं। एक-एक माणस ठाडे पंचायती की मुद्रा में खड़ा है। पुराने ज़माने के उस मास्टर की तरह जो हर पल हाथ में डंडा रखा करता था। पर अब वह डंडा गुम हो चुका है। मास्टर की क्या मजाल कि किसी बालक को एकाध ठोक सके। यही अवस्था वोटर की है। वह बोल तो सकता है पर कुछ कर नहीं सकता।
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एक बर की बात है अक नत्थू कै सांप काट ग्या तो उसकी मां ज़हर कढाणे एक मोड्डे धोरै लेगी। फेर बूझण लाग्गी—मेरा छोरा बच तो ज्यैगा ना, कितनाक जहर होवै है सांप मैं। मोड्डा बोल्या—न्यूं समझ ले अक नेता तै तो घाट ए होवै।


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