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राजयोग के लिए निष्ठाओं के योग-संयोग

Posted On October - 10 - 2019

राजकुमार सिंह
प्रोफेसर संपत सिंह भी बुधवार को भाजपाई हो गये। चौधरी देवीलाल की अगुवाई में राजनीति शुरू करने वाले संपत कांग्रेसी तो बहुत पहले हो गये थे, पर अब भाजपाई हो गये। देवीलाल द्वारा गठित इनेलो छोड़ने की वजह उनके राजनीतिक वारिस-पुत्र ओमप्रकाश चौटाला से पटरी न बैठ पाना रहा तो कांग्रेस को अलविदा कहने का कारण इन विधानसभा चुनावों में टिकट न मिलना ही रहा। जाहिर है, विचारधारा-नीति-सिद्धांत का मामला न तब था, न अब है। मामला सत्ता राजनीति में भागीदारी और संभावनाओं का है। कांग्रेस में रहते हुए विधायक ही नहीं, बल्कि राज्य के मंत्री तक रहे संपत सिंह को गिला है कि जिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा की वजह से वह इनेलो से कांग्रेस में आये थे, उन्होंने ही इस बार टिकट वितरण में साथ छोड़ दिया। यह अलग बात है कि अपने विशुद्ध स्वार्थ और सत्ता प्रेरित आचरण को भी विचारधारा और राष्ट्रहित का जामा पहनाने में राजनेता माहिर होते हैं।
संपत के भाजपा में जाने की चर्चा तो एक पखवाड़े से चल रही थी। अटकलें थी कि भाजपा उन्हें आदमपुर से कांग्रेस उम्मीदवार कुलदीप बिश्नाई के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतार सकती है, जिन्होंने संपत की विधानसभा सीट नलवा से अपने करीबी रणधीर पनिहार को कांग्रेस उम्मीदवार बनवा दिया, पर इस दलबदल में इतना समय लग गया कि भाजपा ने एक टिक-टॉक स्टार सोनाली फौगाट को आदमपुर से अपना प्रत्याशी बना दिया। बेशक यह भाजपा के अलग तरह की राजनीतिक संस्कृति की वाहक होने के दावे के साथ-साथ भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र पर भी एक गंभीर टिप्प्णी है। हरियाणा के विशिष्ट विधानसभा क्षेत्रों में शुमार रहे आदमपुर से उम्मीदवारी के लिए भाजपा एक अच्छा राजनीतिक कार्यकर्ता-नेता नहीं ढूंढ़ पाये तो हैरत भी होती है, और सवाल-संदेह उठना भी स्वाभाविक है। सोनाली की उम्मीदवारी के बावजूद संपत भाजपाई हो गये तो दो ही कारण हो सकते हैं। अपने धुर राजनीतिक विरोधी रहे कुलदीप बिश्नोई को हराना ही मकसद बताकर एक कारण का खुलासा उन्होंने कर दिया है। दूसरा कारण वही है, जो बिना टिकट की गारंटी के भी कांग्रेस-इनेलो छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले ज्यादातर नेताओं का रहा है। विधायक न भी बन पायें, पर सत्तारूढ़ दल का नेता तो बने रहेंगे, और कौन जानता है कि किसी बोर्ड-निगम की चेयरमैनी की लॉटरी भी खुल जाये। फिर प्रबुद्ध और शालीन होने के बावजूद संपत हरियाणा के उन नेताओं में भी शुमार हैं, जो समय रहते अपने बेटे को राजनीति में स्थापित कर देना चाहते हैं।
चुनावी मौसम कई चीजों के लिए अनुकूल माना जाता है, जिनमें लोकलुभावन घोषणाएं और दलबदल प्रमुख हैं। ये प्रवृत्तियां देशव्यापी हैं, तो हरियाणा भला कैसे पीछे रह सकता है। दिल्ली के तीन ओर बसे हरियाणा में विधानसभा की 90 सीटें हैं। यह आंकड़ा किसी आश्चर्य से कम नहीं कि इस बार टिकट के लिए दो-चार नहीं, 50 से भी अधिक नेताओं ने अपने दलों को अलविदा कह दिया। उनमें से दो दर्जन से भी ज्यादा तो दूसरे दल से उम्मीदवार बन गये, जिनकी कहीं दाल नहीं गली, वे निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गये। बेशक साफ-सुथरी और सिद्धांत की राजनीति करने का दम भरने वाली भाजपा में भी बगावत हुई है, कुछ बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव भी लड़ रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा भगदड़ मची, पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी इनेलो में। राजनीति की सामान्य समझ के मुताबिक मुख्य विपक्षी दल को परिवर्तन की संभावना होने पर सत्ता का प्रमुख दावेदार माना जाता है, लेकिन ओमप्रकाश चौटाला परिवार का झगड़ा और बंटवारा पार्टी को भी ले डूबा। संभव है कि अजय सिंह चौटाला के परिवार द्वारा गठित जजपा, इन विधानसभा चुनावों में अपने मूल दल इनेलो से बेहतर प्रदर्शन करे, लेकिन छोटा हो या बड़ा—शून्य तो शून्य ही रहता है। चौटाला परिवार और इनेलो ने जिस तरह इस अंतर्कलह को पारिवारिक संकट मान कर सुलझाना चाहा, वह दरअसल उन लाखों मतदाताओं-कार्यकर्ताओं का अपमान ही है, जो पहले देवीलाल और फिर ओमप्रकाश चौटाला के राजनीतिक नेतृत्व को मानते रहे। अगर पारिवारिक झगड़े के बजाय इसे सामाजिक-राजनीतिक जिम्मेदारी-जवाबदेही की भावना से सुलझाने की कोशिश की गयी होती तो शायद परिणाम भी अलग हो सकता था।

राजकुमार सिंह

हरियाणा के प्रति कांग्रेस का आचरण भी इनेलो से कम बड़ा अपराध नहीं है। सशक्त सत्ता दल के साथ ही मजबूत विपक्ष भी लोकतंत्र की प्राणवायु है, लेकिन पांच सालों में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि इनेलो या कांग्रेस विपक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी-जवाबदेही के प्रति तनिक भी गंभीर हैं। इनेलो में अंदर-ही-अंदर पारिवारिक वर्चस्व का खेल चलता रहा तो कांग्रेस में भी खुलेआम भूपेंद्र सिंह हुड्डा और अशोक तंवर गुट एक-दूसरे के विरुद्ध ताल ठोकते रहे। इनका द्वंद्व खुलकर चल रहा था तो राज्य के बाकी दिग्गज कांग्रेसी गुपचुप दिल्ली दरबार की परिक्रमा कर अपनी गोटियां बिठा रहे थे। कहना नहीं होगा कि इनेलो के अंतर्कलह से कांग्रेस के लिए बनती बेहतर संभावनाओं को हुड्डा-तंवर के कलह ने ग्रहण लगा दिया। कार्यकर्ताओं को धैर्य और सभी को साथ लेकर चलने की नसीहत देने वाले नेताओं का अपना आचरण एकदम उलट ही रहता है। तंवर के विरोध में हुड्डा इसी साल 18 अगस्त को रोहतक में बिना कांग्रेसी झंडे-पोस्टर-बैनर के रैली की हद तक चले गये। अटकलें तो नये दल की घोषणा या फिर राकांपा की घड़ी में अपना बेहतर समय देखने तक की थी, पर अंतिम समय में दिल्ली दरबार के संकेत पर ठहर गये। ठहरते हुए भी हुड्डा धारा 370 के संदर्भ में ही सही, यह बताना नहीं भूले कि कांग्रेस भटक गयी है। कांग्रेस आलाकमान ने उनकी सुनी, पर इस अंदाज में कि बड़ी देर कर दी हुजूर आते-आते।
बेशक वर्ष 2004 और 2014 के लोकसभा चुनाव का भी सबक यही है कि चुनावी मामले में भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए। फिर भी हरियाणा में भाजपा की सत्ता में सुनिश्चित दिख रही वापसी के बावजूद कांग्रेस कम से कम अपनी दशा-दिशा तो कुछ सुधार ही सकती थी, लेकिन टिकट वितरण और उस दौरान चले तमाशे से उसने कुल्हाड़ी पर कूदने वाली कहावत को ही चरितार्थ किया है। प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये गये अशोक तंवर ने अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास पर धरना-प्रदर्शन क्यों किया—इसका खुलासा शायद आने वाले वक्त में हो पाये, लेकिन समर्थकों को टिकट न मिलने पर कांग्रेस से ही किनारा करने वाले एन.एस.यू.आई. और युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके शख्स की दलीय निष्ठा पर सवालिया निशान तो है ही। वैसे लगता नहीं कि आत्मघात पर आमादा कांग्रेस को राजनीतिक विरोधियों की जरूरत है। जिस तरह मजबूत कांग्रेसियों को दरकिनार कर ढूंढ़ कर अजीबोगरीब उम्मीदवार उतारे गये हैं, उससे तो यह भ्रम पालना भी मुश्किल है कि कांग्रेस यह विधानसभा चुनाव जीतने के लिए लड़ रही है। जब कांग्रेस जीतने के लिए चुनाव लड़ ही नहीं रही तो फिर गंभीरता से चुनाव राजनीति करने वालों के लिए उससे किनारा करने के अलावा शायद कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचता। हां, यह सवाल फिलहाल अनुत्तरित ही है कि फिर कांग्रेस यह चुनाव किसलिए लड़ रही है।

journalistrksingh@gmail.com


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