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मानसिक रोगी न बना दे तनाव

Posted On October - 5 - 2019

शादी के कुछ ही अरसे बाद तलाक, नौकरी छूट जाना, रिश्तों की कड़वाहट, किसी प्रियजन की मृत्यु जैसे जीवन के तमाम ऐसे अनुभवों के कारण याददाश्त में गिरावट आ सकती है, जिसके कारण मिडल एज आबादी खासकर महिलाओं में अल्जाइमर रोग का ख़तरा बढ़ता है। आजकल के लाइफस्टाइल में मल्टीटास्किंग को भी इसका कारक माना जा रहा है। इंटरनेशनल जनरल ऑफ जेरीएटिक साइकेट्री जरनल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक अल्ज़ाइमर के लिये स्ट्रेस हार्मोन सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार है। सामान्य तौर पर अल्ज़ाइमर या डिमेंशिया 60 या इससे अधिक उम्र के लोगों में पाया जाता है। चीज़ें याद न रख पाने की यह कमी अब युवाओं को भी अपनी चपेट में लेती दिख रही है। हाल ही में विश्व अल्ज़ाइमर दिवस पर इस बात पर चिंता जताई गई कि आज के युवाओं में डिमेंशिया के एक कॉमन प्रकार अल्ज़ाइमर का खतरा बढ़ा है। अल्जाइमर एसोसिएशन के अनुसार 60 में से 6 महिलाओं में से एक को यह रोग होता है जबकि 11 पुरुषों में से किसी एक में इस रोग के लक्षण दिखते हैं। जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, यूएस के प्रोफेसर सिंथिया मुनरो के मुताबिक ‘हम तनाव बढ़ाने वाले तत्वों से छुटकारा नहीं पा सकते लेकिन हम तनाव को किस तरह से लेते हैं, इसे समझना ज़रूरी है।’ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ए.ए. हाशमी की मानें तो युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन, शराब पीने की लत और डायबिटीज के रूप में अल्जाइमर की शुरुआत के मामले देखे गये हैं। इसमें दिमाग की कोशिकाएं डी-जनरेट होकर मरने लगती हैं, और याददाश्त प्रभावित होती है। बार-बार तनाव होने की स्थिति में ब्रेन की हालत काफी नाज़ुक हो जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में लगभग 16 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं।
अल्जाइमर के कारण
डॉक्टरों के मुताबिक इसका सबसे बड़ा कारण स्ट्रेस है। वे मानते हैं कि कुछ प्रतिशत मामलों में देखा गया है कि ये बीमारी नौजवानों को चपेट में लेती है। बीते कुछ सालों में इसका ग्राफ कुछ बढ़ा है। युवा पीढ़ी में याददाश्त प्रभावित होने की समस्या एक साथ कई काम करने से जुड़ी हो सकती है। इसके लिए नींद पूरी न ले पाना एक अहम कारण है।
डिमेंशिया का एक रूप
वेंकटेश्वर अस्पताल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ़ दिनेश सरीन कहते हैं कि वृद्धावस्था में लोगों को होने वाली डिमेंशिया की समस्या का सबसे प्रचलित प्रकार अल्जाइमर है जो 60 से 80 प्रतिशत डिमेंशिया के मामलों में होता है। धूम्रपान, शराब का सेवन आदि मोडिफियेबल कारकों पर 45 से 65 साल की उम्र में नियंत्रण करने से अल्जाइमर के मामले कम होने के आंकड़े भी सामने आये हैं।
क्यों होता है रोग
दरअसल अल्जाइमर रोग दिमाग की कोशिकाओं को नष्ट करता है। इसका सही कारण अब तक पता नहीं किया जा सका है। हालांकि पाया गया है कि यह आनुवंशिक, डिप्रेशन, सिर की चोट, उच्च रक्तचाप, मोटापे के मरीजों में अधिक होता है। शुरुआत में निदान के द्वारा मरीज के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है। एक न्यूरोलॉजिस्ट ही समय पर इसकी पहचान कर सकता है। इसके लिए पूर्ण जांच एवं न्यूरो इमेजिंग की जरूरत होती है। एक रिसर्च के मुताबिक, यदि बढ़ती उम्र में लोग अपना काम खुद करते हैं तो उन्हें अल्जाइमर रोग होने का खतरा कम होता है। खुद के काम करने से दिमाग सक्रिय होता है और स्मरण शक्ति तेज रहती है।
रोग से बचने के उपाय
हर तरह के रोग से बचाव के लिये स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की ज़रूरत है। अल्जाइमर के खतरे से बचने के लिए भरपूर नींद और संतुलित आहार लेना चाहिए और ब्लडप्रेशर नियंत्रित रखना भी ज़रूरी है।
ऐसे पहचानें लक्षण
भूलने की बीमारी होने पर पीड़ित व्यक्ति को कोई भी गेम खेलने, खाना पकाने में कठिनाई होने लगे। मरीज के व्यवहार में बदलाव आने लगे, जैसे गुस्सा, चिड़चिड़ापन, शब्दों को बार-बार दोहराना, एकाग्रता में कमी, बेवजह कहीं घूमने निकल जाना और खो जाना, रास्ता भटकना, मूड में बदलाव, अकेलापन, डिप्रेशन, हैल्यूसिनेशन या पैरानोइया भी हो सकता है।

  • अल्जाइमर रोग से पीड़ित व्यक्ति को बोलने में दिक्कतें आने लगती हैं। वह साधारण वाक्य या शब्द तक नहीं बोल पाता। लिखने का अंदाज़ बदल जाता है।
  • अपना घर का पता भूलना, अपने आसपास के माहौल तक को व्यक्ति भूल जाता है।
  • कोई भी निर्णय लेने में दिक्कत आना।
  • हिसाब-किताब करने में परेशानी होने लगती है।
  • अपनी चीजों को रखकर भूल जाना भी एक बड़ी समस्या बन जाती है।
  • अचानक मूड में बदलाव आ जाना, बिना वजह गुस्सा करना, बिना वजह घंटों किसी काम में उलझे रहना, सभी अल्जाइमर रोग के लक्षण हैं।

अल्जाइमर का इलाज : डॉ. जयदीप बंसल
किसी व्यक्ति में अल्जाइमर होना केवल अकेले व्यक्ति को प्रभावित नहीं करता है, बल्कि पूरे परिवार के सदस्यों के रहन-सहन के तरीके को भी बदल देता है। अल्जाइमर रोग सबसे आम प्रकार का डिमेंशिया है, जो कि मस्तिष्क के यथोचित रूप में काम न कर पाने की स्थिति में होने वाली परिस्थितियों के लिए समग्रता में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। अल्जाइमर याददाश्त, सोचने और व्यवहार संबंधी समस्याएं पैदा करता है। लक्षणों को शुरुआती चरण में न पहचान पाना एक आम समस्या है। अगर वक्त रहते रोग के लक्षण पहचान लिये जाएं तो इलाज भी संभव है। समस्या बिगड़ने पर इलाज नहीं हो पाता। परिवार वाले व्यक्ति को डॉक्टर के पास तभी ले जाते हैं जब अल्जाइमर मध्य या अग्रिम अवस्था में होता है और इसके लक्षणों के कारण इतनी तकलीफ होने लगती है कि उन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

– एच ओ डी, सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, सरोज सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नई दिल्ली

क्या खाएं

  • खानपान में फलों, सब्जियों, साबुत अनाजों, बीन्स की मात्रा कम न होने दें। इनसे न केवल दिल संबंधी खतरे कम होते हैं बल्कि डिमेंशिया के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
  • बादाम और ड्राई फ्रूट तो दिमाग तेज़ करने और याददाश्त बढ़ाने के लिए रामबाण हैं ही, इसके अलावा भी कई और सुपरफूड हैं जो इस रोग से दूर रख सकते हैं।
  • एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाना लाभदायक है। विटामिन ई से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाने से न सिर्फ तनाव कम होगा बल्कि मानसिक समस्‍याओं से भी निजात मिल सकती है।
  • ब्रोकली का सेवन करने से लाभ होता है। ब्रोकली में मैग्नीशियम, कैल्शियम, जिंक और फास्फोरस अच्‍छी मात्रा में पाया जाता है।
  • दिमाग में बढ़ने वाले जहरीले बीटा-एमिलॉयड नामक प्रोटीन के प्रभाव को कम करने के लिये ग्रीन टी पीना फायदेमंद माना जाता है।
  • हरी पत्तेदार सब्जियां, बींस, साबुत अनाज, जैतून का तेल अल्जाइमर रोग से लड़ने में मदद करते हैं।

क्या ना खाएं

  • अतिरिक्त कॉपर को डाइट में कम कर देना चाहिए। अगर कॉपर डाइट में अधिक होगा तो इस रोग का खतरा बढ़ जाता है। कॉपरयुक्त खाद्य पदार्थों जैसे-तिल, काजू, सूखे टमाटर, कद्दू, तुलसी, मक्खन, चीज़, फ्राइड फूड, जंक फूड, रेड मीट, पेस्ट्रीज और मीठे का सेवन करने से बचें।
  • रोजाना व्यायाम और योग करके रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • मेडिटेशन करने से समस्या को कम किया जा सकता है।
  • याददाश्त तेज़ करने के लिए सर्वांगासन करें। याददाश्त बनाए रखनी हो तो भुजंगासन करें। कपालभाति प्राणायाम करें।

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