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‘मर्यादा पुरुष’ बनने के संकल्प का दिन

Posted On October - 8 - 2019

दशहरा

लक्ष्मीकांता चावला
रामराज्य की ओर अग्रसर होने का संकल्प दिवस बना विजयादशमी भारत का राष्ट्रीय पर्व है। अत्याचार, अनाचार और अधर्म के प्रतीक रावण पर श्रीरामचंद्र जी की विजय का स्मृति दिवस है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सत्य, न्याय एवं सद्चरित्र के प्रतीक हैं। युगों-युगों से भारतवासी इस दिवस को गौरव से मनाते आ रहे हैं। कोई किसी भी धर्म, संप्रदाय में आस्था रखने वाला हो, पर श्रीराम जी को जीवन में आदर्श के रूप में स्वीकार करता है। वे आदर्श राजा हैं, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई एवं आदर्श पति भी हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है—जब जब होहि धर्म की हानि, बाढ़हिं असुर महा अभिमानी, तब-तब धरि प्रभु मनुज शरीरा, हरहिं सकल सज्जन भव पीरा। इसके साथ ही भगवान श्रीराम के इस संसार में अवतरण का उद्देश्य बताते हुए भी तुलसीदास जी ने कहा है—विप्र धेनु सुर संत हित लीन मनुज अवतार। आज जब देश में प्रतिदिन महिलाओं के साथ यौन अपराध की घटनाएं सुनने को मिलती हैं, ऐसे समय में भगवान श्रीराम के वे शब्द, जो बाली को तीर मारने के बाद बाली के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहे थे, समाज के लिए ज्योतिपुंज और मार्गदर्शक हैं। बाली ने श्रीराम से यह प्रश्न किया—मैं वैरी सुग्रीव पियारा, कारण कवन नाथ मोहि मारा। उसी समय भगवान श्रीराम ने उत्तर दिया—अनुज वधु, भगिनि सुत नारी, सुन सठ कन्या सम ए चारि, इनहिं कुदृष्टि विलोकहि जोई, ताहि वधे कछु पाप न होई। यह वाक्य आज के युग की विषमताओं का समाधान देने वाला है।
भगवान श्रीरामजी का सारा जीवन अधर्म और अत्याचार से संघर्ष करते हुए जन-जन के लिए कल्याणकारी, श्रेष्ठ राज्य की स्थापना करने में लगा। राज्याभिषेक की तैयारियों के समय उन्हें पता चला कि पिता ने तो उन्हें 14 वर्ष का वनवास दिया है। मां कौशल्या से भी उन्होंने यही कहा—पिता दीन मोहि कानन राज्य। पिता की आज्ञा का पालन कर श्रीरामचंद्र जी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित जंगल के लिए चल पड़े। उनका तो जन्म ही अत्याचारियों और राक्षसों को समाप्त करने के लिए हुआ था। वनवास काल में जब उन्होंने रावण और अन्य राक्षसों द्वारा मारे गए निर्दोष ऋषि-मुनियों और नागरिकों की अस्थियों के बड़े-बड़े ढेर देेखे तो एक आदर्श महामानव और शासक की तरह यह संकल्प लिया—निश्चिर हीन करहूं मही, भुज उठाई प्रण कीन, सकल मुनिन्ह के आश्रमहीं जाई जाई सुख दीन। जो संकल्प भगवान श्रीराम ने लिया उसे एक आदर्श प्रजापालक राजा की तरह अधर्म के प्रतीक राक्षसों के साम्राज्य का नाश करके पूरा किया।
जिस रावण के लिए यह कहा जाता था कि काल भी उसके घर में बंधक है और सभी देवता अर्थात‍् प्राकृतिक शक्तियां उसके अधीन हैं, उसी रावण को इस तरह वंश सहित नष्ट कर दिया। कवि ने लिखा है—इक लाख पूत, सवा लाख नाती, ता रावण कर दीया न बाती। रावण की मृत्यु रामजी के हाथों धर्म को मिटाकर सुशासन की स्थापना के लिए हुई थी। रावण के भाई विभीषण को लंका का राज्य सौंपकर स्वयं 14 वर्ष के वनवास की अवधि पूरी होने के साथ ही वे अयोध्या वापस पहुंचने के लिए वचनबद्ध थे। रावण रहित लंका में एक दिन रहने का निमंत्रण मिलने पर भी उन्होंने कहा—लक्ष्मण! लंका चाहे सोने की है पर मुझे यहां रहना स्वीकार नहीं, क्योंकि मां और मातृभूमि तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ होती है। आज जो लोग अपने देश के प्रति पूर्ण कर्तव्य का पालन नहीं करते और देश छोड़कर दूसरे देशों में सुख-आराम की खोज में चले जाते हैं, उनके लिए यह बहुत बड़ा संदेश है।
जब भारत परतंत्र हो गया, महिला और पुरुष दोनों ही शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में पीछे रह गए। स्वतंत्रता के बाद भी बहुत से लोग महिलाओं के साथ भेदभाव रखते हुए उन्हें शिक्षा से वंचित रखना ही अपनी शान समझते थे। उस समय भगवान श्रीराम का यह उदाहरण कि रामराज्य में महिलाएं और पुरुष सभी शिक्षित, चतुर और गुणी थे, हमें आगे का रास्ता दिखाने वाला आदर्श वाक्य मिला। आज विजयादशमी के दिन केवल कागजी रावण जलाना, पटाखे चलाकर ढोल बजाना और मिठाइयां बांटना ही पर्याप्त नहीं। समाज का यह कर्तव्य है कि हम उसी रास्ते पर चलें जो धर्म, सत्य और सदाचार का रास्ता भगवान श्रीरामचंद्र जी ने दिखाया था। आज भी हर माता राम जैसा पुत्र, प्रजा राम जैसा राजा, बेटियां रामजी जैसा पति और भाई भरत और लक्ष्मण भी श्रीराम जैसे अग्रज की ही आशा करते हैं। आइए, हम संकल्प लें कि विजयादशमी का त्योहार इस संकल्प के साथ ही मनाएं कि जो सन्मार्ग, मर्यादापूर्ण जीवन का रास्ता भगवान श्रीरामचंद्र जी ने इस संसार को दिखाया था, हम उसी रास्ते पर चलें। मर्यादा पुरुषोत्तम न भी बन पाए तो भी मर्यादा मानव तो बनें।
हम भारतीयों को यह गौरव प्राप्त हुआ है कि भगवान श्रीराम ने भारत में ही अवतार लिया और उनके कारण ही भारत विश्व में एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर रहा है जो भावी असंख्य पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत और श्रद्धापुंज बना रहेगा। आज के भारतीय समाज में कानून द्वारा भी जिस सहजीवन अर्थात लिव-इन-रिलेशनशिप को संरक्षण और मान्यता दी जा रही है, इसके साथ ही विवाहेत्तर संबंधों को भी अपराध न मानने की बात की गई है, ऐसी व्यवस्था तो रावण के राज्य में भी नहीं थी। हम श्रीराम जी के उत्तराधिकारी रामराज्य की स्थापना करने के लिए प्रयत्नशील, समाज के लिए तो यह सोचने का विषय है कि रामराज्य की स्थापना करनी है तो समाज के लिए वैसे ही कानून होने चाहिए, जिस प्रकार का सामाजिक और राजनीतिक ढांचा, कानून और नीति निर्देशक नियम भगवान श्रीराम जी के राज्य में थे।


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