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मंदी की आहट से लुढ़कते बैंक

Posted On October - 12 - 2019

तिरछी नज़र

सहीराम
मंदी की पहचान करना आसान नहीं होता जी। वैसे तो जब बाजार की चहल-पहल खत्म हो जाए, रौनक गायब हो जाए, खरीददारी घट जाए, बाजार सूना और उजाड़ नजर आने लगे तो अंदाजा लग जाता है कि मंदी है। एक निशानी यह भी होती है कि मंदी में पैसे वाले हाय-तौबा मचाने लगते हैं और गरीब सुन्न पड़ जाता है, उसे कुछ सुझाई नहीं देता। मंदी में उद्योगपति छाती पीटने लगते हैं कि हाय हमारा तो माल ही नहीं बिक रहा और सरकार उन्हें दिलासा देने लगती है कि नहीं यार कोई मंदी नहीं है, हम खड़े हैं न तुम्हारे पीछे चिंता क्यों करते हो।
जैसे रोजगार घटने लगें और सरकार कहने लगे कि रोजगार अब आए कि तब आए, तब यह समझ लेना चाहिए कि मंदी है। फिर भी मंदी की पहचान करना आसान नहीं होता, वैसे ही जैसे बीमारी की पहचान करना आसान नहीं होता। बीमारी की पहचान के लिए नब्ज देखनी पड़ती है, लक्षण देखने पड़ते हैं, डॉक्टर को मरीज से तरह-तरह की जानकारियां लेनी पड़ती हैं, एक्सरे से लेकर टेस्ट तक न जाने क्या-क्या करना पड़ता है तब जाकर बीमारी पकड़ में आती है। इसी तरह मंदी के बारे में अर्थशास्त्री बताने लगते हैं कि देखो यह जो लक्षण दिखाई दे रहे हैं, ये मंदी के ही हैं। जब सरकार उनका खंडन करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि मंदी है। फिर भी मंदी की पहचान करना आसान नहीं होता।
इधर जानकारों को मंदी का एक और लक्षण नजर आ गया। थॉमस कुक बैंक दिवालिया हो गया। थॉमस कुक वह बैंक था, जिस पर दुनिया भर के पर्यटक निर्भर थे। जिसने पर्यटन नहीं किया, वह थॉमस कुक को नहीं जानता। इसके दिवालिया होने से लाखों पर्यटक दुनिया भर में फंस गए। जाहिर है सरकार तो यही कहेगी कि चिंता क्यों करते हो, वह कोई रिजर्व बैंक थोड़े ही था, कोई स्टेट बैंक थोड़े ही था, कोई ग्रामीण या सहकारिता बैंक थोड़े ही था। सो दिवालिया हो गया तो हो गया, हमें क्या फर्क पड़ रहा है। पर जनाब, जब दो हजार आठ की मंदी आई थी तब उसकी शुरुआत लेहमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने से ही हुई थी और फिर उसने दुनिया भर को अपनी चपेट में ले लिया था। तब भारत इसलिए बच गया था कि उसके फंडामेंटल्स मजबूत थे अर्थात बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं सरकारी नियंत्रण में थे।
खैर, वे अभी भी सरकारी नियंत्रण में ही हैं। अगर नहीं होते तो रिजर्व बैंक के पौने दो लाख करोड़ सरकार को कैसे मिलते और सरकार बैंकों में हजारों करोड़ की नकदी क्यों डालती। फिर भी खबर यह है कि पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक दिवालिया हो गया। पर अब यह फैसला कौन करे कि यह मंदी की निशानी है या फिर घोटाला है। लेकिन अगर मंदी है तो भी और घोटाला है तो भी सरकार के लिए तो परेशानी का सबब है ही।


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