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बेलगाम चुनाव खर्च

Posted On October - 7 - 2019

सख्त हो आयोग
आज तक खर्च से संबंधित आचार-संहिता के उल्लंघन मामले में शायद ही किसी उम्मीदवार को अयोग्य घोषित किया गया हो। निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष होना होगा। घोषणापत्र में शामिल लोकलुभावने वादों के चलते उम्मीदवारों द्वारा खैरात बांटने के अलावा पंचायत चुनाव में तो प्रत्येक वोट पर महंगा उपहार देने के मामले खर्च ही बढ़ाते हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए। खुफिया तंत्र को सतर्क बनाना होगा। मतदाताओं को अलोकतांत्रिक व्यक्तिगत हितों और देश हित के प्रति जागरूक करना होगा। जन प्रतिनिधियों की शक्तियों के साथ वेतन, पेंशन तथा मुफ्त की सुविधाओं में भारी कटौती होनी चाहिए।
राजकुमार, राजौंद

धनबलियों का कब्जा
विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चुनाव आयोग ने 28 लाख रुपये खर्च करने की सीमा तय की है। वैसे खर्च तो करोड़ों में होता है, यह बात चुनाव आयोग भी जानता है। एक आम आदमी 28 लाख पूरी जिन्दगी में नहीं कमा पाता। वह चुनाव लड़ने से वैसे भी बाहर हो जायेगा। अतः जब तक भारतीय राजनीति में शिक्षित, ईमानदार लोग अागे नहीं आयेंगे, तब तक माफियाओं का ही दबदबा रहेगा। ऐसे में धनबलियों के बेलगाम मंसूबों पर लगाम लगाना मुश्किल है। फिलहाल राजनीतिक परिदृश्य में सुधार की गुंजाइश नहीं है।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

जनता करे पहल
लोगों का राजनीति में आने का मकसद ही कुर्सी हासिल करके अपना स्वार्थ पूरा करना होता है। सवाल यह भी खड़ा होता है कि चुनाव में भारी-भरकम खर्च करने की आखिर जरूरत ही क्या है? जो राजनेता चुुुनाव में भारी खर्चा करेगा, चुनाव जीतने के बाद उसकी भरपाई किसी न किसी रूप में तो करेगा। आज छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व में आने का कारण न तो लोकसेवा है, न देश सेवा है, बल्कि कालेधन को सफेद करना है। आज तक किसी भी पार्टी ने चंदे के धंधे पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की। ऐसे में धनबलियों के बेलगाम मंसूबों पर लगाम लगाना मुश्किल कार्य है। इसके लिए चुनाव आयोग या जागरूक जनता पहल कर सकती है।
राजेश कुमार चौहान, जालंधर

चंदे में पारदर्शिता
जब तक कॉरपोरेट जगत से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई जाती है या पूरी पारदर्शिता नहीं अपनाई जाती है, तब तक चुनाव खर्च पर लगाम लगाने की बात करना बेमानी होगा। जनता जानती है कि चुनाव में बेहताशा काले धन का दुरुपयोग होता है, लेकिन रोकेगा कौन? आज तक सीमा से ज्यादा खर्च करने वालों पर कार्रवाई तक नहीं हुई। जब तक जन प्रतिनिधित्व कानूनों में व्यापक बदलाव नहीं लाया जाता, तब तक खर्चों पर लगाम नहीं लग सकती। जनप्रतिनिधित्व कानूनों में संशोधन जरूरी है।
रूप सिंह नेगी, सोलन

आयोग सतर्क रहे
एक प्रतिनिधि, जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनाव में खड़ा होता है तो उसे एक ही बार प्रचार करना चाहिए। इसके लिए चुनाव आयोग को जरूरी कदम उठाने होंगे। इससे चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित तय खर्च कम होगा। वैसे देश के लोकतंत्र का ढांचा इस प्रकार बन चुका है कि धनबलियों के अतिरिक्त दूसरा चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता। चुनाव में ईमानदारी से पैसा खर्च करना बहुत दूर की बात है। चुनाव आयोग को ही प्रत्येक प्रतिनिधि पर चुनाव के समय पैनी नजर रखने की जरूरत है। वहीं जनता से प्राप्त चुनावी संबंधी खर्चों की शिकायतों को चुनाव आयोग भी गंभीरता से ले।
जानवी बिट्ठल, जालंधर

काले धन का खेल
चुनाव प्रचार में बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाने के लिए चुनाव आयोग हर बार कोशिश करता है। लेकिन इस खर्च में काले धन के चलन में आने और उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों से रकम लेकर चुनाव लड़ने और जीतने पर उन्हें फायदा पहुंचाने के आसार भी बढ़ जाते हैं। कुल मिलाकर यदि कहें तो यह चलन भ्रष्टाचार को जन्म देता है। ऐसे में आम उम्मीदवार को बराबर का मौका नहीं मिल पाता। वहीं धन के इस्तेमाल से कोई भी नेता बलशाली बन जाता है। अगर पार्टियां अपने स्तर पर चुनाव खर्च सीमा के अंदर रहकर ही करती हैं तो इससे चुनावी नियमों के उल्लंघन से बच सकेगी। इससे जनता के बीच भी उनकी छवि बेहतर होगी।
अमन सिंह, प्रेमनगर, बरेली, उ.प्र.

पुरस्कृत पत्र
निगरानी और जागरूकता
जागरूक मतदाता और चुनाव आयोग सख्ती से कानून लागू कर चुनाव खर्च पर लगाम लगा सकते हैं। मतदाताओं को अनाप-शनाप खर्च करने वाले नेताओं की शिकायत करने के लिए प्रेरित किया जाए। जिस तरह तकनीक का सहारा लेकर आयकर विभाग हमारी हर हरकत पर नजर रखे हुए है, उसी तरह चुनाव आयोग भी वित्तीय निगरानी के माध्यम से हर उम्मीदवार पर नज़र रख सकता है। मीडिया भी इसमें बड़ा रोल निभा सकता है। खोजी पत्रकारिता द्वारा जनता से मिली शिकायतों पर ऐसे लोगों को बेनक़ाब कर सकता है। आम जनता के लिए किसी भी सरकारी माध्यम के मुकाबले मीडिया के जरिए आवाज उठाना ज्यादा आसान और सुरक्षित है।
बृजेश माथुर, बृज विहार, गाज़ियाबाद


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