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बाढ़ झेल सकने वाली फसल की खोज

Posted On October - 14 - 2019

बाढ़ और अतिवृष्टि से फसलें बर्बाद हो जाती हैं। प्रमुख फसलों में सिर्फ धान की ही फसल बाढ़ को झेल पाती है। लेकिन एक नई रिसर्च से यह स्थिति बदल सकती है। यह दुनिया के लिए एक अच्छी खबर है कि जहां कई जगह वर्षा की अवधि और तीव्रता में वृद्धि हो रही है वहीं साइंस पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च में यह जानने की कोशिश की गई कि जलमग्न होने के बाद धान की तुलना में दूसरी फसलों की क्या स्थिति होती है। धान की फसल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगने वाली जंगली प्रजातियों से तैयार की गई थी, जहां उसने मानसून और जलमग्न खेतों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। इस अनुकूलन के लिए जिम्मेदार जीन दूसरे पौधों में भी मौजूद होते हैं लेकिन इन जीनों ने जड़ों के जलमग्न होने की स्थिति में सक्रिय होने के लिए खुद को विकसित नहीं किया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया रिवरसाइड में आनुवंशिकी की प्रोफेसर और इस अध्ययन की प्रमुख लेखक जूलिया बेली-सेरेस ने कहा कि हम चावल के बारे में अर्जित जानकारी का लाभ उठा कर दूसरे पौधों में भी जीनों को सक्रिय करना चाहते हैं ताकि ये पौधे जलमग्न स्थिति को झेलने में समर्थ हो सकें। अपने अध्ययन में रिसर्चरों ने उन कोशिकाओं की जांच की जो जड़ों के छोर में वास करते हैं। बाढ़ आने पर सबसे पहले प्रतिक्रिया जड़ों की तरफ से होती है। जड़ों के छोर और टहनी के बड (कली) ऐसे अंग हैं जहां पौधे का विकसित होने का सामर्थ्य मौजूद रहता है। इन हिस्सों में ऐसी कोशिकाएं विद्यमान रहती हैं जो पौधे को बाढ़ की स्थिति झेलने में मदद कर सकती हैं।
अधिक गहराई से जांच करते हुए रिसर्चरों ने जड़ों के छोर की कोशिकाओं के जीनों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसका मकसद यह पता लगाने का था कि पानी से ढके होने तथा ऑक्सीजन से वंचित होने पर क्या ये जीन सक्रिय होते हैं और यदि होते हैं तो कैसे होते हैं। एक प्रमुख रिसर्चर मॉरिसियो रेनोसो ने कहा कि हमने यह जानने की कोशिश की कि अप्रत्याशित स्थिति का सामना करने के लिए डीएनए कोशिका को क्या निर्देश देता है। एक अन्य रिसर्चर सियोभान ब्रॉडी ने कहा कि यह पहला अवसर है जब बाढ़ के खिलाफ पौधे की प्रतिक्रिया को बारीकी से समझा गया है। बाढ़ अनुकूलन में शामिल जीनों को ‘सबमर्जेंस अप-रेगुलेटेड फैमिलीज’ (एसयूआरएफ) कहा जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया रिवरसाइड के रिसर्चरों ने चावल के जीन-समूहों का विश्लेषण किया और जलमग्न स्थिति में जीनों के व्यवहार पर प्रयोग किए जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया डेविस के रिसर्चरों ने यही प्रयोग टमाटर की प्रजातियों के साथ किए। जलमग्नता के प्रयोगों में टमाटर की सभी प्रजातियों में एसयूआरएफ जीन सक्रिय जरूर हुए लेकिन उनकी आनुवंशिक प्रतिक्रिया चावल की भांति कारगर नहीं थी। रेगिस्तानी जमीन में उगने वाले जंगली टमाटर जलमग्नता को बर्दाश्त नहीं कर पाए।
जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक सूखे की स्थितियां भी उत्पन्न होती हैं। ऐसी स्थितियों का सामना करने वाली फसलों पर अलग से अध्ययन हो रहा है। लेकिन बेली-सेरेस का कहना है कि सूखे की तुलना में पौधों की बाढ़ प्रतिक्रिया पर बहुत कम अध्ययन हुआ है। अतः यह रिसर्च ज्यादा अहमियत रखती है।
रिसर्चर ऐसे पौधों के टिकने की दर में सुधार करना चाहते हैं जो इस समय अत्यधिक पानी से मुरझाने लगते हैं या सड़ने लगते हैं। इसके लिए वे अतिरिक्त अध्ययन की तैयारी कर रहे हैं। यह पहला साल नहीं है जब अतिवृष्टि के कारण किसान फसलों की रोपाई नहीं कर पा रहे हैं। बाढ़ ने उन फसलों की गुणवत्ता को भी नुकसान पहुंचाया है, जिन्हें किसान उगा सकते थे। यह प्रवृत्ति आगे भी बनी रहेगी क्योंकि जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है। यदि हमने फसलों को विषम परिस्थितियों में उगने के लायक बनाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए तो विश्व की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। बेली-सेरेस ने कहा कि जरा ऐसी दुनिया के बारे में सोचिए जहां बच्चों को विकसित होने के लिए समुचित कैलोरी की कमी हो जाए। अतः वैज्ञानिकों के समक्ष यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वे पौधों को बाढ़ की स्थितियों को झेलने के लायक बनाएं और भविष्य के लिए खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करें।
इस बीच, एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से हमारी बहुमूल्य मिट्टी प्रभावित हो सकती है। अमेरिका की रट्गर्ज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से दुनिया के कई इलाकों में मिट्टी की पानी को सोखने की क्षमता कम हो सकती है। इसका भूजल आपूर्ति, खाद्य उत्पादन, जैव विविधता और पर्यावरण प्रणालियों पर गंभीर असर पड़ सकता है। साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकशित अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया में वर्षा के पैटर्न और पर्यावरणीय परिस्थितियों में बदलाव हो रहा है। रट्गर्ज यूनिवर्सिटी के मृदा वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक डेनियल गिमेनेज ने कहा कि हमारे नतीजे बताते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में मिट्टी के साथ जल की क्रिया में तेजी से परिवर्तन हो सकता है। हम चाहते हैं कि इस परिवर्तन की दर और उसके परिमाण को नापा जाए और इसे जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों में समाहित किया जाए।

मुकुल व्यास

गिमेनेज के अनुसार कार्बन के भंडारण के लिए मिट्टी में पानी की मौजूदगी की अहम भूमिका होती है और मिट्टी में होने वाले परिवर्तन से हवा में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर पर अप्रत्याशित प्रभाव पड़ सकता है। ध्यान रहे कि कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, जिसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। अध्ययनों से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अवधि में वृद्धि से मिट्टी में पानी की प्रविष्टि की दर बदल सकती है। अमेरिका के कैनसस में एक 25 वर्षीय प्रयोग के दौरान रट्गर्ज के वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि वर्षा में 35 प्रतिशत वृद्धि से मिट्टी में पानी की प्रविष्टि दर में 21 से लेकर 30 प्रतिशत की कमी आ जाती है जबकि मिट्टी में पानी के टिकने की दर में बहुत मामूली वृद्धि होती है। सबसे अधिक परिवर्तन मिट्टी में बड़े छिद्रों या खाली जगहों की स्थिति बदलने की वजह से हुए। बड़े छिद्रों द्वारा ग्रहण किया गया पानी पौधों और जीवाणुओं की जैविक गतिविधियों तथा मिट्टी में पौष्टिक तत्वों की साइक्लिंग के लिए काम आता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


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