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बहुत पुराना है दीयों का इतिहास

Posted On October - 27 - 2019

योगेश कुमार गोयल

भारतीय संस्कृति की शाश्वतता के प्रतीक माने जाते रहे दीये का महत्व दीपोत्सव पर ठीक उतना ही है, जितना लक्ष्मी पूजन का। हालांकि यह अलग बात है कि आधुनिकता की दौड़ में आज मिट्टी के बने साधारण दीयों की जगह अति सुंदर कलात्मक दीयों, मोम के विभिन्न रंग-रूपों के दीयों तथा तरह-तरह के आकर्षक डिज़ाइनों की रंग-बिरंगी मोमबत्तियों ने ले ली है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मिट्टी के दीयों का चलन सर्वाधिक है।
पवित्रता का प्रतीक
दरअसल दीया प्राचीन काल से ही बहुत पवित्र माना जाता रहा है। दीये को महज ज्योति का नहीं बल्कि ईश्वर का प्रतीक माना गया है। माटी के इस छोटे से दीये को न सिर्फ दुनिया से बल्कि अपने मन से भी अंधकार को दूर भगाने का प्रतीक माना गया है। माना गया है कि सहस्रों दीयेों का प्रकाश आत्मिक एवं भौतिक अंधकार को दूर भगाता है। प्राचीन काल से ही शुभ कार्यों की शुरुआत दीये जलाकर की जाती रही है।
महाकाव्यों में दीप का उल्लेख
रामायण व महाभारत के विभिन्न प्रसंगों में भी दीप जलाने का उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि दीप जलाने की प्रथा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। हालांकि इस बात की कोई स्पष्ट एवं सटीक जानकारी कहीं नहीं मिलती कि दीयों की खोज कैसे और कब हुई थी।
माना जाता है कि आदिकाल में जब मानव ने आग जलाना सीखा था तो उसके इस आविष्कार ने उसके समूचे जीवन की कायापलट करके रख दी थी और अपने इस आविष्कार से अभिभूत होकर तब उसने आग के समक्ष नतमस्तक होकर हाथ जोड़ लिए थे और आगे चलकर अग्नि के समक्ष मानव द्वारा जोड़े गए दोनों हाथों की आकृति से ही दीये का जन्म हुआ।
दीये जलाने की शुरुआत
ऐसी मान्यता है कि शुरुआत में मनुष्य ने मिट्टी का दीये बनाकर उसमें जानवरों की चर्बी पिघलाकर तेल के रूप में इस्तेमाल किया और पेड़ों की पतली छाल का बाती के रूप में इस्तेमाल कर दीये जलाया। तब से लेकर आज तक दीये के स्वरूप में बहुत परिवर्तन आया है। प्राचीन काल में नाव की आकृति वाले दीयेों का उल्लेख मिलता है, जो यूनानी शैली से प्रभावित थे। सिंधु घाटी सभ्यता में मिट्टी से तरह-तरह के आकार के दीये बनाए जाने के प्रमाण भी मिले हैं। मिट्टी के दीयों के बाद पत्थर और सीपियों से भी दीये बनाए गए लेकिन कुछ समय बाद इनके मुकाबले मिट्टी के ही दीये पुनः लोकप्रिय होने लगे।
शुरूआत में दीये हाथ से बनाए जाते थे और उनमें बाती रखने के लिए हाथ से दबाकर स्थान बनाया जाता था। हाथ से बनाए जाने वाले ये दीये बड़े बेढंगे होते थे। समय बीतने के साथ जहां इनके स्वरूप में काफी बदलाव आया, वहीं इनमें जानवरों की चर्बी और पेड़ों की छाल का उपयोग करने के बजाय सरसों, अरंडी, जैतून अथवा शीशम का तेल तथा रूई की बाती डालकर जलाने का प्रचलन शुरू हुआ जबकि पूजन के अवसरों पर दीयों में तेल के बजाय शुद्ध घी डालकर जलाया जाने लगे।
धातु से बने दीये
ताम्रयुग व धातु प्रचलन काल में मिट्टी के दीये तो उपयोग किए ही जाते थे, साथ ही सोने, चांदी व पीतल के आकर्षक दीये भी बनाए जाने लगे। ऐसे ही दीये मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में भी मिले हैं। पांचवीं सदी में प्याले के आकार के दीये बनाए जाने लगे। तक्षशिला, पाटलीपुत्र, उज्जैन आदि कई स्थानों से खुदाई के दौरान पाषाण युग के मिट्टी के दीये मिले हैं। इसके अलावा बिहार में खुदाई के दौरान कमल की आकृति के दीये भी मिले हैं, जिन पर खुदी लिपि से पता चलता है कि बौद्ध भिक्षुओं ने इन्हें दान में दिया था।
दरबार में जलने वाले दीये
उसके बाद विभिन्न हिन्दू राजाओं के शासनकाल में दीयों का और भी परिष्कृत रूप सामने आया। मंदिरों में पूजा के लिए तरह-तरह के कलात्मक दीये बनाए जाने लगे। मुगल काल में भी कई मुगल शासकों के दीये प्रेम का वर्णन मिलता रहा है। मुगलकाल में कई फुट ऊंचे ऐसे दीपस्तंभ इस्तेमाल किए जाने लगे, जिन पर दर्जनों दीये एक साथ रखे जाते थे और इन्हीं दीयों की रोशनी में सारी-सारी रात दरबार में महफिलें चला करती थीं। इन ऊंचे दीप स्तंभों को ‘चिरागदान’ कहा जाता था।
मंदिरों, पूजास्थलों व महलों में जलाने के लिए छतों पर लटकाए जाने वाले दीये भी विभिन्न आकृतियों में बनाए गए। लटकाने वाले दीयों के अलावा ‘दीपवृक्ष’ भी बनाए गए, जो वृक्ष की भांति काफी ऊंचे आकार के होते थे और इनके चारों ओर पेड़ की अनेक शाखाओं की भांति कई शाखाएं निकली होती थीं।
इस तरह इन दीपवृक्षों पर एक साथ सैकड़ों दीये जलाए जाते थे। कई जगहों पर मंदिरों के मुख्य द्वार पर तथा देवी-देवताओं की मूर्तियों के दोनों ओर विशाल आकार के दीये, जिन्हें ‘विशाल स्तंभ’ कहा जाता था, रखने का प्रचलन भी था। इस प्रकार के विशाल दीये भी दक्षिण भारत के मंदिरों में आज भी स्थापित हैं।
18वीं शताब्दी में दीयों के स्वरूप में काफी परिवर्तन आया और मोर, तोता, बत्तख, कोयल, नाग, बैल, घोड़ा इत्यादि विभिन्न पशु-पक्षियों की आकृतियों वाले दीये बनाए जाने लगे।


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