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फ्लैशबैक

Posted On October - 26 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म

गूंज उठी शहनाई

शारा

राजेन्द्र कुमार, अमीता और अनीता गुहा के अभिनय से सजी शंकर भाई भट्ट की फिल्म थी ‘गूंज उठी शहनाई’। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने क्या शहनाई बजाई थी इस फिल्म में। राजेन्द्र कुमार को सुपरहिट इसी फिल्म ने बनाया। फिल्म की कहानी, गीत और संगीत सब कमाल का था। ये तीनों फैक्टर फिल्म की कामयाबी में मील का पत्थर साबित हुए। रही-सही कसर बिस्मिल्ला खान के शहनाई वादन ने पूरी कर दी। वसंत देसाई की बनायी सुरीली धुनों को शब्द दिये थे भरत व्यास ने।
शहनाई को ख्याति व सम्मान की ऊंचाइयों पर ले जाने वाले भारत रत्न बिस्मिल्ला खान ने बॉलीवुड की एकमात्र फिल्म में ही शहनाई बजायी थी और वही सुपरहिट साबित हुई। इतनी हिट हो गयी कि इस फिल्म ने 1959 में ही बॉक्स ऑफिस पर 1,80,00,000 रुपये की कमाई की लेकिन जिस शहनाई के कारण संगीत/गीत घर-घर लोकप्रिय हो गया, उसी वादक को दाने-दाने के लिए मोहताज होना पड़ा। सरकार ने उन्हें भारत रत्न से अलंकृत तो किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इससे बड़ा गरीबी का दूसरा कौन-सा उदाहरण हो सकता है कि लाचारी में शहनाई वादक के पोते को अपने दादा की शहनाई ही बेचनी पड़ी। देश के लिए इससे बड़ी शर्म क्या हो सकती है‍?
‘तेरे सुर और मेरे गीत’, ‘जीवन में पिया तेरा साथ रहे’, ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’, ‘कह दो कोई न करे यहां प्यार’, ‘होले-होले घूंघट पट खोले’ सरीखे गीतों ने श्रोताओं को फिल्म हॉल में जा पहुंचाया। श्रोता तब कहानी देखने कम, पर्दे पर बिस्मिल्ला खान और सितार वादक अब्दुल हलीम जाफर खान की जुगलबंदी देखने ज्यादा जाया करते थे। इसके हिट होने के कारण राजेंद्र कुमार बतौर हीरो सुपरहिट हो गए। इतने सुपरहिट कि उन्हें चार साल की पहले डेट्स देनी पड़ती थी। लब्बोलुआब यह कि यह फिल्म हीरो राजेंद्र कुमार के जीवन में भी टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। उसके बाद ही राजेंद्र कुमार के साथ जुबली स्टार का तमगा जुड़ गया। वसंत देसाई दरअसल वी. शांतराम की खोज थे। उन्होंने पहले उन्हीं की फिल्मों ‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘झनक झनक पायल बाजे’ को संगीत दिया, जिसके गाने भी खूब चले। उन्होंने बाद में गुड्डी व आशीर्वाद फिल्म में भी संगीत दिया। विजय भट्ट की ‘गूंज उठी शहनाई’ ने उन्हें चंद महान संगीतकारों की श्रेणी में रख दिया। इस फिल्म ने फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता और अन्य ढेरों इनाम भी। राजेंद्र कुमार के साथ नायिका थी अमीता, जिन्होंने ‘तुमसा नहीं देखा’ व ‘मेरे महबूब’ सरीखी फिल्मों में काम किया। उनका असली नाम कमर सुल्ताना था। उनकी बेटी सबीहा भी हीरोइन हैं, जिन्होंने खिलाड़ी जैसी फिल्मों में काम किया है। स्पोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाली अनीता गुहा ने भी इसमें अभिनय किया था। आईएस जौहर का इसमें खास रोल था। पाठकों को बता दें कि कमर सुल्ताना को अमीता नाम विजय भट्ट ने दिया था क्योंकि इस फिल्म से पूर्व उन्होंने ‘चैतन्य महाप्रभु’ बनायी थी, जिसमें उन्होंने कमर सुल्ताना को बतौर हीरोइन लिया था, चूंकि फिल्म की मुख्य नायिका को दर्शक मुस्लिम नाम होने के कारण रिजेक्ट न कर दें, इसलिए उन्होंने उसे स्क्रीन नाम दे दिया। चैतन्य महाप्रभु में एक अन्य नया चेहरा था, वह थी बाल कलाकार के रूप में आशा पारेख। बाद में उन्होंने आशा पारेख को ‘गूंज उठी शहनाई’ में नायिका का रोल देना चाहा लेकिन उन्हें आशा पारेख में नायिकाओं जैसा कुछ नहीं दिखा। फलस्वरूप उन्हें निकालकर अमीता को ले लिया क्योंकि अमीता ने तब हिट फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ दी थी, जिसके हीरो शम्मी कपूर थे। जो शिकायत विजय भट्ट को आशा पारेख से थी, वही नासिर हुसैन को अमीता से थी। इसलिए उन्होंने आशा पारेख को ‘दिल दे के देखो’ में लिया था। हालांकि, ‘गूंज उठी शहनाई’ से अमीता रातों-रात स्टार बन गयी लेकिन उसके बाद वह गुमनामी के अंधेरों में डूब गयी जबकि आशा पारेख ने उसके बाद स्टारडम को छुआ। अब बात फिल्म के निर्देशक पर। विजय भट्ट शंकर भट्ट के भाई और फिल्म निर्देशक व प्रोड्यूसर विक्रम भट्ट के दादा हैं जबकि सिनेमैटोग्राफर प्रवीण भट्ट व निर्देशक अरुण भट्ट के पिता हैं। इस परिवार का नानाभाई भट्ट के कुनबे से कोई ताल्लुक नहीं है। बहरहाल, रोमांस जोनर की यह फिल्म 1959 रिलीज़ हुई थी, जिसमें शहनाई वादक के जीवन-संघर्ष, उसका प्रेम और प्रेम के रास्ते में आये समाज, रोज़गार होने पर शहनाई वादन को अपनी आमदनी का ज़रिया बनाने के लिए आंतरिक द्वंद्व से जूझते हीरो को दिखाया गया है। गोपी और किशन बाल-सखा है। धीरे-धीरे वे लड़कपन में प्रवेश करते हैं। युवा होने पर दोनों को लगता है कि वे एक-दूसरे को दिलो-जां से चाहते हैं और दोनों को शादी कर लेनी चाहिए लेकिन किशन तो बेकार है। अब समाज और हीरो के बीच संघर्ष शुरू हो जाता है। हीरो चूंकि राजेंद्र कुमार बना है और नायिका गोपी है, जिसका किरदार निभाया है अमीता ने। चूंकि गोपी जवान हो चुकी है, इसलिए उसकी मां जमना चाहती है कि वह शेखर (प्रताप) से शादी कर ले जो ऑल इंडिया रेडियो में काम करता है। अब समस्या यह है कि किशन जिस गुरु (रघुनाथ महाराज) से शहनाई बजाना सीखता है उसी गुरु की बेटी (अनीता गुहा) रामकली भी किशन से अथाह प्यार करती है। जबकि किशन गोपी को, लेकिन किशन की गरीबी आड़े आती है। समाज के तानों से तंग आकर वह घर छोड़ देता है लेकिन भरी दुनिया में किशन अकेला न भटके, इसलिए रामकली भी उसके साथ जाती है। लखनऊ रेडियो स्टेशन पर किशन की मुलाकात शेखर से होती है, वही उसे शहनाई वादक के तौर पर रेडियो स्टेशन में परिचय कराता है। देखते ही देखते किशन की शहनाई के लाखों दीवाने हो जाते हैं।
लोकप्रियता किशन को धन से मालामाल कर देती है। आत्मविश्वास से लबरेज़ जब किशन गोपी का हाथ मांगने के लिए गांव जाता है, वह देखता है कि गोपी का विवाह शेखर से हो रहा है। उसका दिल टूट जाता है और अपने गंतव्य पर लौट आता है। जिस दिन से गोपी की शादी हुई थी, वह बीमार रहती थी, बौराई-सी, कभी-कभी बेहोश भी हो जाती थी, इसलिए घर वाले उसे ससुराल से मायके ले आये थे।
उधर, रामकली गोपी के टूटे दिल पर मरहम लगाती है। रेडियो पर शहनाई बजते ही गोपी ठीक होकर नृत्य करने लगती है। वह जैसे ही ठीक होती है, उसमें भारतीय नारी के संस्कार जागते हैं और वह पति के पास जाने को तैयार हो जाती है। वह पति के पास पहुंचती है लेकिन एक लाश के रूप में। ऐसा क्या हुआ होगा जो वह दम तोड़ देती है। फ्लैश बैक के पाठक इस फिल्म को स्वयं देखें तो उन्हें आनंद आयेगा। यह उस वक्त की बनी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी जो रोमांस ज़ोनर की आज की फिल्मों से भी आगे है। निर्देशक ने गोपी कृष्ण और रामकली के माध्यम से राधा-कृष्ण और मीरा के प्रेम की व्याख्या करनी चाही है। फिल्म में इतने गीत होने के बावजूद अटपटे नहीं लगते। ऐसा नहीं लगता कि उन्हें ठूंसा गया है।
ये फिल्म 1959 में सालभर में कमाई करने वाली फिल्मों में चौथे नंबर पर थी।

निर्माण टीम

प्रोड्यूसर : शंकर भाई भट्ट
निर्देशक : विजय भट्ट
पटकथा : जी.डी. मडगुलकर
संवाद रचना : कमर जलालाबादी, शिव कुमार
गीतकार : भरत व्यास
संगीतकार : वसंत देसाई
सिनेमैटोग्राफी : विपिन गुज्जर
सितारे : राजेंद्र कुमार, अमीता, अनीता गुहा, आई.एस. जौहर आदि।

गीत
तेरी शहनाई बोले : मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर
तेरे सुर और मेरे गीत : लता मंगेशकर
मैंने पीना सीख लिया : मोहम्मद रफी
जीवन में पिया तेरा साथ रहे : मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर
होले-होले घूंघट पट खोले : लता और मोहम्मद रफी
अखियां भूल गयी हैं सोना : गीता दत्त, लता मंगेशकर
मुझको अगर भूल जाओगे : लता मंगेशकर
कह दो कोई न करे यहां प्यार : मोहम्मद रफी
दिल का खिलौना हाय : लता मंगेशकर


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