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फ्लैशबैक

Posted On October - 19 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म

शारा

गीत गाया पत्थरों ने

‘गीत गाया पत्थरों ने’ साठ के दशक की फिल्मों का नायाब नमूना थी। बॉलीवुड में जितेन्द्र की असली शुरुआत ‘गीत गाया पत्थरों ने’ फिल्म से ही हुई। व्ही शांताराम ने उन्हें अपनी बेटी राजश्री के साथ लॉन्च किया था । खूबसूरत राजश्री और युवा जीतेन्द्र के बीच इस फिल्म में शानदार कैमिस्ट्री दिखती है। इस फिल्म के बाद जीतेन्द्र ने बॉलीवुड में फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। व्ही शांताराम की इस फिल्म में संगीत दिया था रामलाल ने और गीत लिखे थे हसरत जयपुरी और विश्वमित्र ने।
यह कूवत सिर्फ वी. शांताराम और गुलज़ार सरीखे निर्देशकों में ही हो सकती है जो जीतेंद्र जैसे जम्पिंग जैक से ‘गीत गाया पत्थरों ने’ सरीखी विशुद्ध कलात्मक फिल्म में अभिनय करवा लें। गुलज़ार ने जीतेंद्र को फिल्म ‘परिचय’ व ‘खुशबू’ में बतौर हीरो एक्टिंग कराई थी। ये दोनों फिल्में दर्शकों ने पसंद भी की थीं। राजश्री की भी यह डेब्यू फिल्म थी लेकिन वी. शांताराम की पुत्री होने के कारण अभिनय उन्हें विरासत में मिला था। वह वी. शांताराम की दूसरी पत्नी जयश्री की बेटी थीं तो ज़ाहिर है कि नृत्य भी उन्हें घुट्टी में मिला। वह बला की खूबसूरत भी थीं। सौंदर्य-शास्त्र में जो खूबसूरती के मापदंड निर्धारित किए गए हैं, उनमें वे खूब खरी उतरती थीं। दरअसल, फिल्मीस्तान से अलग होकर उन्होंने जिस प्रभात कंपनी का वाडिया बंधुओं व अन्य हिस्सेदारों के साथ मिलकर निर्माण किया था, राजकमल कला मंदिर के नाम से उन्होंने अपनी निजी कंपनी बनायी, जिसने बॉलीवुड को नवरंग, दो आंखें बारह हाथ जैसी फिल्में दीं। दरअसल, राजकमल कला मंदिर के निर्माण के पीछे भी दिलचस्प कहानी है, सोचा, फ्लैश बैक के पाठकों से शेयर करती चलूं। दरअसल अपनी फिल्मों की हीरोइन जयश्री से शादी करने के बाद न तो हीरोइन और न ही हीरो फिल्मों में कोई काम कर सकते थे क्योंकि प्रभात कंपनी की शर्तों में यही सब लिखा था। लिहाजा जयश्री से वैवाहिक संबंध बनाए रखने के लिए उन्होंने राजकमल कला मंदिर की स्थापना की। जयश्री से उनकी तीन संतानें किरण, जयश्री और तनुश्री हुईं। प्रभात उनकी पहली पत्नी के बेटे का नाम था, जिसके नाम से उन्होंने प्रथम प्रोडक्शन हाउस बनाया था। नृत्य में सिद्धहस्त जयश्री से उनकी नहीं बनी, लिहाज़ा उन्होंने उस ज़माने की मशहूर नृत्यांगना संध्या से शादी कर ली। वी. शांताराम की पृष्ठभूमि पर बात करना इसीलिए भी ज़रूरी था क्योंकि यह फिल्म हीरो-हीरोइन के नाम से नहीं, बल्कि वी. शांताराम के नाम से ज्यादा जानी जाती है। क्या बढ़िया पीस बनाया है। यह फिल्म इसलिए भी याद रखी जाएगी कि अमर गायक सी.एच. आत्मा ने इसमें ‘प्रीतम आन मिलो’ जैसे गीत गाए हैं। सी.एच. आत्मा 50-60 के दशक की वह आवाज थे, जिनके मोहब्बत भरे गीत गाकर तब के प्रेमीजन हंसते-हंसते फना हो जाया करते थे—अपनी महबूबा को यकीन दिलाने के लिए। उनकी आवाज में वह जादू था कि उदासी का लबादा ओढ़े युवा वर्ग मरता नहीं बल्कि जीकर दिखाता था। कुंदनलाल सहगल के पक्के चेले थे सी.एच. आत्मा। वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने विदेशी धरती नैरोबी में कन्सर्ट करके भारतीय संगीत की स्वर-लहरियां बिखेरी थीं। मदन मोहन सरीखे संगीत निर्देशक उन्हीं के ही तराशे हुए चेले हैं। ‘गीत गाया पत्थरों ने’ उनकी अंतिम फिल्म थी। उसके बाद उनकी आवाज फिल्मों में सुनने को नहीं मिली, बल्कि संगीत निर्देशन के नोट्स भी शायद ही मिलें। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया था। बहरहाल, 1965 में इसे तीसरी सर्वोत्तम निर्देशित फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। और मुकाबला था देवानंद की गाइड से। सर्वोत्तम सिनेमैटोग्राफी के लिए कृष्णराव को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसे अलावा भी उन पर छोटे-मोटे पुरस्कारों की बारिश होती रही। मगर यह दीगर बात है कि वी. शांताकुमार की फिल्में किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं।
जीतेंद्र, विजय नामक युवा बना है जो बुत-तराशी करता है। बुत-तराशी उसने अपने बाप से सीखी है जो मंदिरों में बुत-तराश है और पर्यटकों का गाइड भी है। एक दिन जब वह मंदिर देखने आयीं लड़कियों को मंदिर के बारे में बता रहा था तो वह विद्या (राजश्री) नामक युवती से मिलता है। प्रारंभिक नोकझोंक प्रेम में तबदील हो जाती है। विद्या क्लासिकल डांसर है और वह विजय के भीतर छिपे कलाकार को बुत-तराश के रूप में बाहर निकालती है। विद्या का साथ पाकर विजय रातोंरात बड़ा कलाकार बन जाता है। इसी बीच विद्या को पता चलता है कि उसकी मां उसे किसी अमीर के हाथ बेचना चाहती है। वह भागकर विजय के पास आ जाती है, जहां विजय उसे अपना लेता है। वह उससे शादी भी कर लेता है। उधर, एक अमीर सेठ अपनी खोई हुई बेटी की याद में सुंदर महल बनाना चाहता है, जिसमें पुरातन भारतीय मूर्तियां सजाना चाहता है। कई साल पूर्व उनकी बेटी को उसकी नौकरानी लेकर भाग गयी थी। उन्होंने बहुत ढूंढ़ा लेकिन मिली नहीं। वह बुत-तराशी का काम विजय को सौंपते हैं। वह पत्नी विद्या को अपने चाचा (सी.एच. आत्मा) के सुपुर्द कर बुत-तराशी करने महल में चला जाता है। जब वह साल के बाद वापस आता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी ने किसी अमीर व्यक्ति से शादी कर ली है। विजय का दिल टूट जाता है। विद्या उसे असली बात बताना चाहती है लेकिन विजय उसे अपनाने से इनकार कर देता है। यहां तक कि अपने बेटे को भी। विजय को मनाने के लिए विद्या उसी सेठ के घर में कुक की नौकरी कर लेती है और विजय से पर्दा करती है। विजय उसी को ही मॉडल बनाता है और घूंघट डाले विद्या की बड़ी प्रतिमा बनाता है। कई साल बीतने पर जब उसका प्रोजेक्ट पूरा होता है तो उसे सच्चाई का पता चलता है लेकिन वह विद्या से अभी भी नाराज है। थोड़ी देर चले फिल्मी ड्रामे में अमीर सेठ की वही नौकरानी सीन में दाखिल होती है और बताती है कि विद्या ही सेठ की खोई हुई बेटी है।
मंजे निर्देशन में जीतेंद्र अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ किरदार की भूमिका में हैं। उनके चेहरे की ताजगी व परिपक्व अभिनय ने ही उनके लिए आगे की फिल्मों का रास्ता खोला। शायद यही कारण है कि शुरुआती दिनों में उन्होंने खूब यादगार फिल्में कीं। इस फिल्म में किशोरी अमोनकर ने भी गाया है। इसके बाद उन्होंने बॉलीवुड के लिए आवाज नहीं दी।

गीत
सांसों के तार पर : (1) किशोरी अमनोकर (2) महेंद्र कपूर, आशा भोसले
हो साथ अगर, मंडवे तले गरीब के : सी.एच. आत्मा
आजा जाने जां मेरे मेहरबान : आशा भोसले
जाने वाले ओ मेरे प्यार : आशा भोसले
आइए पधारिए : महेंद्र कपूर, आशा भोसले व कोरस
रात नौजवान : आशा भोसले
एक पल जो मिला है : सी.एच आत्मा
तेरे ख्यालों में हम : आशा भोसले

प्रोड्यूसर व निर्देशक : वी. शांताराम
मूलकथा : के.ए. नारायण
पटकथा व संवाद : वी. शांताराम
गीत : हसरत जयपुरी, विश्वमित्र, आदिल
संगीतकार : रामलाल
सिनेमैटोग्राफी : कृष्णराव
सितारे : जीतेंद्र, राजश्री, सुरेद्रनाथ, सी.एच. आत्मा, नाना पल्सिकर।


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