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फ्लैशबैक

Posted On October - 5 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म

फिल्म ‘गोदान’ मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास का फिल्मी रूपांतरण है, जिसका स्क्रीनप्ले और निर्देशन त्रिलोक जेतली का था। इस उपन्यास पर सबसे पहले 1963 में फिल्म बनी, इसमें राजकुमार और महमूद मुख्य भूमिका में थे। लीड एक्ट्रेस थीं कामिनी कौशल। गीत लिखे थे अंजान ने, फिल्म का संगीत तैयार किया था पंडित रवि शंकर ने। प्रसिद्ध गीतकार और निर्देशक गुलज़ार ने बाद में ‘गोदान’ पर एक टीवी सीरियल भी बनाया।

शारा

गोदान

हिंदी साहित्य की प्रतिनिधि कृति मुंशी प्रेमचंद कृत ‘गोदान’ को तीन घंटे की फिल्म में समेटना उतना ही मुश्किल काम है, जितना समूचे फलक को अपनी अंजुलि में भर लेना, क्योंकि इस रचना का कैनवास ही इतना बड़ा है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी कोई नामी-गिरामी निर्देशक इस पर फिल्म बनाने की नहीं सोच सका। इसे कोई हिंदी साहित्य का भक्त ही अंजाम दे सकता था, सो यह काम त्रिलोक जेतली के हिस्से ही आया। लिहाजा, उन्होंने ही इसे निर्देशित किया और प्रोड्यूस भी। उसके बाद जेतली फिल्मों के निर्माण और निर्देशन की दुनिया में नहीं दिखे। बाद में गुलज़ार ने इसी कहानी पर सीरियल भी बनाया, लेकिन वहां भी यही दिक्कत पेश आई कि उपन्यास के विस्तार को कैसे समेटा जाए? स्वयं गुलज़ार मानते थे कि ‘गोदान’ पर कम से कम 12 घंटे की मूवी बनायी जाए, तभी इसके साथ न्याय हो सकेगा। फ्लैश बैक के जिन पाठकों ने यह उपन्यास पढ़ा, वे इसके कैनवास के बारे में सोच सकते हैं। ऐसे में जेतली का प्रयास सराहनीय कहा जाएगा कि उन्होंने जब फिल्म में काम करने वाले चेहरों का सलेक्शन किया तो हीरो के रूप में उन्हें राजकुमार ही दिखे और उसकी पत्नी बनी कामिनी कौशल, अपने ज़माने की वर्सेटाइल अदाकारा। गोबर का किरदार महमूद से बेहतर तब कौन निभा सकता था? और फिर जब हम मालती के किरदार के बारे में तसव्वुर करते हैं तो शशिकला उसमें पूरी तरह फिट नज़र आती है—शहरी संस्कृति की जीती-जागती तस्वीर। फिल्म में जो भारत का गांव दिखाया गया है, वह तब का माहौल है जब देश आजाद नहीं हुआ था और गांवों में गरीब के माई-बाप साहूकार ही होते थे। उनके नाम ही ज़मीनें होती थीं, वह ग्रामीण कहलाते थे, लेकिन रहते थे शहरी माहौल में। उनकी दुनिया ही अलग थी और जो असली अन्नदाता था, वह दाने-दाने को मोहताज, साहूकारों, धर्म के ठेकेदारों द्वारा बनाए गए धार्मिक कायदे-कानूनों से बंधा हुआ। यही सब ‘गोदान’ की आत्मा है। ‘गोदान’ किसी गऊ की मौत की कहानी नहीं, बल्कि एक गरीब किसान के सपने की कहानी है जो अपने सपने को पालने के लिए ज़माने से जूझ तो जाता है, लेकिन हार जाता है। उसके अपने ही उसका सपना चूर-चूर कर देते हैं। और जब एक सपने की मौत होती है तो क्या होता है? और धार्मिक रीतियों का डर इतना कि कर्ज के बोझ तले दबे होरी का परिवार कर्ज लेकर ‘गोदान’ के लिए गऊ खरीदता है। प्यार, घृणा, बदला, लालच, गुस्सा सब कहानी में बरबस आ जाते हैं। होरी जितना ज़मीन से जुड़ा निरीह प्राणी है, उसकी पत्नी धनिया उतनी ही विपरीत, वह किसी की ऐरी-गैरी बातों को बर्दाश्त नहीं करती, चाहे वह अपनी बहू झुनिया ही क्यों न हो? सच्ची बात के लिए वह होरी हो या होरी का परिवार, उलझ जाती है। वह किसी अफसर से भी नहीं डरती। लेकिन उतनी ही दयालु भी है। दोनों में एक बात साझी है, वह है कड़ी मेहनत करने की। दोनों एक-दूसरे से बेपनाह मुहब्बत करते हैं लेकिन उनका प्यार छिछोरा नहीं। बहरहाल, बात संगीत और गीत की। वर्ष 1963 में रिलीज़ इस फिल्म के सारे गीत लिखे थे अंजान ने। गीतों में जो भदेसपन है, वही उनकी खूबसूरती है क्योंकि गांव का जो युवक प्यार करेगा, वह अपनी भाषा के गीत गाएगा और सोचेगा भी वैसा ही। जब गोबर नौकरी करके अपने गांव लौटता है तो क्या सोचता है ज़रा बानगी देखिए—‘पिपरा के पतवा सरीखा डोले मनवा कि जियरा में उठत हिलोर, अरे पुरवा के झोंकवा से आयो रे संदेसवा कि चल आज देसवा की ओर।’
और संगीत तो पहचान ही गए होंगे—पंडित रविशंकर का। इस पर टिप्पणी न ही की जाए, तभी अच्छा है। कहानी में किसानों के ग्रामीण समाज का प्रतिनिधित्व होरी महत्तो करता है, जिसमें उसकी पत्नी धनिया (कामिनी कौशल) बेटा गोबर (महमूद), गोबर की पत्नी झुनिया (शुभा खोटे) और होरी की दो बेटियां रूपा और सोना हैं। लाखों भारतीय किसानों की तरह होरी भी गाय खरीदना चाहता है। उसका यह सपना उतना ही बड़ा है जैसे शहर में मध्यवर्गीय परिवार किसी ऑडी गाड़ी खरीदने की अभिलाषा रखता हो। होरी उधार लेकर गोपालक भोला से 80 रुपये में गाय खरीद लेता है (क्योंकि कहानी का कालखण्ड विभाजन से पहले का है, इसीलिए पाठक 80 रुपये की कीमत का अंदाज़ा लगा सकते हैं)। रुपये के लेनदेन में होरी का अपने ही भाई हीरा, उसकी पत्नी से झगड़ा हो जाता है। बात पुलिस तक पहुंचती है तो हीरा पुलिस को घूस खिलाकर केस रफा-दफा कर लेता है। लेकिन घूस के लिए भी उसे कर्ज़ लेना पड़ता है। भोला जब गाय देता है तो होरी के बेटे गोबर को अपनी विधवा बेटी झुनिया के लिए रिश्ता ढूंढ़ने को कहता है, लेकिन गोबर झुनिया को ही भगाकर ले जाता है। जब झुनिया गर्भवती हो जाती है तो समाज की तानाकशी के डर से गोबर झुनिया को घर में छोड़कर भाग जाता है। भोला नहीं चाहता कि होरी उसे शरण दे लेकिन नन्ही जान को अपना लेते हैं। हालांकि, इसके लिए उन्हें पंचायत को जुर्माना भरना पड़ता है जो वह कर्ज लेकर भरता है। यहां पर दातादीन/पंडित पर धनिया जो बरसती है, वह देखते ही बनता है। होरी कर्ज से आकंठ डूबा है, वह अपनी बेटी रूपा की शादी महज 200 रुपये में इसलिए कर देता है ताकि लगान न चुका पाने के कारण उसकी ज़मीन बच जाए। लेकिन गाय पालने का सपना फिर भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। अपने पोते को दूध पिलाने के लिए वह 200 रुपये में गाय तो खरीद लेता है लेकिन रात-दिन मेहनत करने के कारण होरी अपने प्राण गवां बैठता है। जब वह मृत्युशैया पर होता है तो गोदान के लिए उसके गले में प्राण अड़ जाते हैं। तब धनिया 125 रुपये (जो उसने बचत के रूप में जमा कर रखे थे) तथा पुजारी को शेष आधे दाम उधार के वादे के साथ ही पति से गोदान करवा देती है। जीते जी न सही, मरकर तो गो मालिक बन पाया होरी। यही तब का भारतीय समाज था, जो अधिकांश गांवों में रहता था।

गीत

पिपरा के पतवा सरीखे डोले : मोहम्मद रफी
हिया जरत रहत दिन रैन : मुकेश
चली आज गोरी पी की नगरिया : लता मंगेशकर
जन्म लियो ललना : आशा भोसले
ओ बेदर्दी क्यों तड़फाए जियरा : गीता दत्त
होली खेलत नंदलाल : मोहम्मद रफी
जाने काहे जिया मोरा डोलत रे : लता मंगेशकर

निर्माण टीम

प्रोड्यूसर व निर्देशक : त्रिलोक जेतली
कथा : मुंशी प्रेमचंद
गीतकार : अंजान
संगीतकार : रवि
सितारे : राजकुमार, कामिनी कौशल, शशिकला, महमूद, शुभाखोटे, टुनटुन, मदनपुरी


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