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फिर भी दोस्ती

Posted On October - 14 - 2019

मतभेदों के बावजूद साथ चलने की कवायद
आखिरकार वुहान से शुरू हुआ अनौपचारिक वार्ताओं का सिलसिला तमिलनाडु के महाबलीपुरम तक सौहार्दपूर्ण वातावरण में पहुंचा। भारत ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आवभगत में कोई कमी नहीं रखी। यह जानते हुए भी कि हाल ही में इमरान खान की चीन यात्रा के दौरान शी जिनपिंग कश्मीर पर क्या बोले थे। यह भी कि भारत यात्रा के बाद वे हमारे पुराने मित्र देश नेपाल जा रहे हैं। भारत ने दिखाने का प्रयास किया कि तमाम असहमतियों व मतभेदों के बावजूद संवाद कायम रहेगा। भारत ने विदेश नीति में एक परिपक्व सोच का परिचय दिया है। अनौपचारिक बातचीत के लिये महाबलीपुरम का चयन करके संकेत दिया गया कि हम दुिनया के शीर्ष नेताओं को भारत की विविधतापूर्ण संास्कृतिक विरासत से रूबरू करा रहे हैं। वार्ता के बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत व चीन प्रगति के नये आयाम स्थापित कर रहे हैं। हमने निर्णय लिया है कि हम मतभेदों को दूर करेंगे और विवादों को बढ़ावा नहीं दिया जायेगा। इसमें दो राय नहीं कि भारत व चीन के बीच तमाम तरह के मतभेद हैं। सीमा विवाद अभी सुलझा नहीं है। पाकिस्तान को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चीन का रवैया भारतीय हितों के अनुकूल नहीं रहा है। इसके बावजूद भारत आगे बढ़ा है और विकास व कारोबार से जुड़े रिश्तों को प्राथमिकता दी है। नि:संदेह चीन आज भारत का सबसे बड़ा कारोबार सहयोगी देश है। दोनों के बीच कारोबार सौ बिलियन डॉलर के करीब पहुंच रहा है।
इस दो दिवसीय यात्रा के दौरान शनिवार को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच चालीस मिनट की औपचारिक बातचीत हुई। फिर विदेश मंत्री वांग यी के साथ आए प्रतिनिधिमंडल ने बातचीत को आगे बढ़ाया। अनौपचारिक बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भागेदारी रही। जाहिर है इन वार्ताओं के जरिये आपसी समझ बढ़ाकर समय के साथ चलने की कोशिश की जा रही है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब चीनी अर्थव्यवस्था का उफान थम रहा है। अमेरिका द्वारा लगाये गए आर्थिक अवरोधों से चीन नये बाजार की तलाश में है, जिसके लिये उसे भारत के सहयोग की जरूरत है। भारत भी तमाम असहमतियों के बावजूद रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश में है। लेकिन भारत के लिये यह चिंता का विषय होना चाहिए कि भले ही दोनों देशों के बीच आर्थिक कारोबार रिकॉर्ड स्तर तक जा पहुंचा है, मगर पलड़ा चीन के पक्ष में झुका है। भारत के नये सामान व सेवाओं के लिये चीन को अपने बाजार खोलने होंगे। चीनी मोबाइलों ने भारतीय बाजारों पर एकाधिकार जमा रखा है। सोलर ऊर्जा व थर्मल पावर में चीन की बड़ी भूमिका है। चीन भारत के मुकाबले पांच गुना ज्यादा सामान हमारे यहां बेच रहा है। निश्चय ही कारोबार का यह असंतुलन भारत की चिंता का विषय होना चाहिए। भारत चीन को दवा, आईटी सेवा तथा खाद्य पदार्थों का निर्यात बढ़ाकर इस असंतुलन को दूर कर सकता है।


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