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पड़ोसी के बच्चे से न करें तुलना

Posted On October - 6 - 2019

पेरेंटिंग

सुभाष चन्द्र
सौम्या आज सहमी-सहमी है अपने घर में। शाम को पिताजी भी घर आए। लेकिन, उनसे भी बात नहीं कर रही है। आखिर क्या हुआ उसे? पिता जी ने एक बार पूछा। कोई जवाब नहीं दिया सौम्या ने।
खाने की टेबल पर भी गुमसुम। वैसे, गुमसुम रहना सौम्या की आदत नहीं। पिताजी को कुछ गड़बड़ लगा। उसकी मां से पूछा। उसने भी कुछ नहीं बताया।
ऐसी तो नहीं है सौम्या। पिता जी को पूरी रात नींद नहीं आई। उन्होंने सवेरे पूछा तो पता चला कि कल सौम्या का रिजल्ट आया था। उसकी दोस्त और पड़ोसी प्रेरणा के उससे काफी अच्छे नंबर आए। इसी बात को लेकर मां ने खूब खरी-खोटी सुनाई। नतीजा, चुलबुली सौम्या गुमसुम हो गई।
पिताजी ने सौम्या और उसकी मां को एक साथ बिठाया। दोनों को समझाने लगे। कहने लगे कि सौम्या भले ही पढाई में प्रेरणा से कम नंबर लाए लेकिन, दूसरी एक्टिविटी में उससे कहीं आगे है। हर बच्चा अपने आप में बेहतरीन होता है। किसी से किसी की तुलना नहीं करनी चाहिए। जिस प्रकार पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, ठीक उसी प्रकार हर बच्चा अपने आप में अलग और ख़ास होता है। कई अध्ययनों से इस बात का खुलासा हुआ है कि ऐसे में आपके बच्चे का मनोबल गिरता है और वह अपने आपको कमज़ोर समझने लगता है।
तुलना से होता है बुरा असर
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि भारतीय अभिभावक हमेशा यही चाहते हैं कि उनके बच्चे हमेशा हर चीज में बेस्ट रहें। दूसरे नंबर पर अपने बच्चों को देखना उन्हें गवारा नहीं। पढ़ाई के मामले में तो बिल्कुल भी नहीं। असल में, भारत जैसे देश में लोगों की तुलना में मौके बेहद कम हैं, इसलिए माता-पिता की चिंता होती है कि उनके बच्चे पीछे न छूट जाएं। इसके अलावा कुछ लोग अपने बच्चों के जरिए अपने अधूरे सपने भी पूरे करना चाहते हैं। इस तरह के लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि भारत सबसे तनावग्रस्त लोगों में से एक है। ऐसे में कई बार कभी माता-पिता अपने बच्चों को न कोसें तो बच्चों को लगने लगता है कि सब कुछ ठीक नहीं है।
बच्चों को ना कोसें
अपने बच्चों के लिए मां-बाप ऐसी बातें कर देते हैं, जिसका बच्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कई बार जहां छात्र नकारात्मक परिस्थितियों में खुद को बचाने के लिए अपने आपको नुकसान पहुंचा देते हैं, तो कई बार उनकी हिंसक मनोवृत्ति का दूसरे शिकार बन जाते हैं। जैसा रेयान स्कूल के प्रद्युमन मर्डर केस में देखने को मिला। जहां पीटीएम से बचने के लिए 11वीं के छात्र ने अपने स्कूल के बच्चे को ही मौत के घाट उतार दिया। इसलिए आज के युग में अपने बच्चों को सही से समझने की जरूरत है, न कि उस पर अपनी राय थोपने या उसे ब्लाइंड स्पोर्ट करने की।
एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि आप कभी भी अपने बच्चों की तुलना अपने पड़ोसी के बच्चे से नहीं करें। हां, बेहतर करें। उसे अच्छी परवरिश दें। हर माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए ताकि उनके बच्चे में आत्मविश्वास की कमी न हो और उसके जीवन में खुशियां ही खुशियां रहें। कई माता-पिता अपने बच्चों की तुलना अकसर दूसरे बच्चों से करने लगते हैं, जो कि बिल्कुल गलत है।
हो सकती है गंभीर बीमारी
कई अध्ययनों से इस बात की पुष्टि हुई है कि इस तरह की बातों से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है, जिसका ठीक होना बाद में बेहद मुश्किल हो जाता है। तुलना बच्चों की सकारात्मक ऊर्जा को भी नष्ट कर देती है। वे नई-नई चीज़ों को सीखने में और चुनौतियों का सामना करने में डरने लगते हैं क्योंकि उन्हें हारने का डर सताने लगता है। उनके मन में नकारात्मकता पूरे तरीके से घर कर लेती है। ध्यान रहे कि अपने बच्चे की तुलना करके आप उसे न केवल मानसिक रूप से कमज़ोर कर रहे हैं, बल्कि वह आपसे भी दूर हो रहा है। कहीं न कहीं इससे आपके रिश्ते पर भी बुरा असर पड़ता है।
बच्चों की अच्छाई की प्रशंसा करें
समाजशास्त्री डॉ़ राकेश कुमार राजू कहते हैं कि बेहतर जीवन के लिए सकारात्मक रहना बहुत ज़रूरी होता है इसलिए हमेशा अपने बच्चों को उजले पक्ष को देखना सीखाएं और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। साथ ही उन्हें इस बात का भी एहसास दिलाएं कि वे आपके लिए कितने खास हैं। अच्छे अभिभावक को आदर्श स्थापित करना चाहिए और बच्चों की अच्छाई की सदैव प्रशंसा करनी चाहिए। उनको प्रोत्साहित करना चाहिए। हर बच्चे का स्वभाव, रासायनिक एवं जैविक रचना अलग-अलग होती है। उसकी दूसरों के साथ तुलना न करें। उसको डांट-फटकार कर हतोत्साहित न करें क्योंकि इससे वह हीनभावना और अवसाद का शिकार हो सकता है। उसकी प्रतिभा पहचान कर उसे उसी रूप में ढालने का प्रयत्न करें।


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