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पाप का अंत

Posted On October - 6 - 2019

बाल कविता
दस शीश का दशानन
ना एक शीश बचा पाया।
राम ने जीत लंका
सत्य का परचम फहराया।
झूठ कभी जीते ना
सामने कभी सच्चाई के।
दुष्ट ही सदैव झुके
सामने यहां अच्छाई के।
जब-जब भी पाप बढ़ा
लिया ईश्वर ने अवतार।
राम और कृष्ण हुए
मिटा दुष्टों का अत्याचार।
बच्चों तुम जीवन में
भगवान राम सरीखे बनो।
राह अपनी नित्य ही
सच पर चलने वाली चुनो।
फिर न कोई रावण
इस धरती पर जिंदा रहे।
फिर न दुनिया में कभी
अत्याचारी दरिंदा रहे।
राम की जय-विजय हो
पाप का सदा ही अंत हो।
नेक रास्ते पर चलें
पावन ही अपना पंथ हो।

गोविंद भारद्वाज


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