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परिणामों पर विचार के बाद दें फैसला

Posted On October - 22 - 2019

नयी दिल्ली, 21 अक्तूबर (एजेंसी)
सुप्रीमकोर्ट ने सोमवार को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड सहित मुस्लिम पक्षकारों को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में अपने लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति दे दी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष मुस्लिम पक्षकारों के एक वकील ने कहा कि उन्हें राहत में बदलाव के बारे में लिखित नोट रिकार्ड पर लाने की अनुमति दी जाये ताकि संविधान पीठ इस पर विचार कर सके।
हालांकि, पीठ ने इस लिखित नोट के विवरण के बारे में कहा कि सीलबंद लिफाफे में दाखिल यह नोट पहले मीडिया के एक वर्ग में खबर बन चुका है। संविधान पीठ के समक्ष लिखित नोट दाखिल करने वाले मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने एक नोट तैयार किया। इसमें कहा गया, ‘मुस्लिम पक्ष यह कहना चाहता है कि इस न्यायालय का निर्णय चाहें जो भी हो, उसका भावी पीढ़ी पर असर होगा। … शीर्ष अदालत के निर्णय के दूरगामी असर होंगे, इसलिए न्यायालय को अपने ऐतिहासिक फैसले में इसके परिणामों पर विचार करते हुए राहत में ऐसा बदलाव करना चाहिए जो हमारे सांविधानिक मूल्यों में परिलक्षित हो।
बता दें कि चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने छह अगस्त से इस मामले में 40 दिन सुनवाई करने के बाद 16 अक्तूबर को कहा था कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जायेगा।
रामलला विराजमान ने दिया पूजा का हवाला
हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों ने शनिवार को शीर्ष अदालत में अपने अपने लिखित नोट दाखिल किये थे। राम लला विराजमान के वकील ने जोर देकर कहा है कि इस विवादित स्थल पर हिंदू आदिकाल से पूजा अर्चना कर रहे हैं और भगवान राम के जन्म स्थान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला- के बीच बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर 16 अक्तूबर को सुनवाई पूरी की थी। संविधान पीठ ने सभी पक्षकारों से कहा था कि वे राहत में बदलाव करने संबंधी लिखित नोट तीन दिन के भीतर दाखिल करें।


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