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नींद उड़ाती चिंताओं का समाधान हो

Posted On October - 10 - 2019

हरीश बड़थ्वाल

अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के मायने हैं मन सुचारु रूप से कार्यरत रहे, सामान्य तनाव तथा प्रतिकूल परिस्थिति में भावात्मक व व्यवहारगत संतुलन डगमगाए नहीं, निजी क्षमताओं का दोहन किया जाता रहे, अन्य व्यक्तियों से तालमेल संतुष्टिदाई हो, हालात के अनुसार स्वयं को ढाला जा सके। गुमसुमी, बुझदिली, हर वक्त चिड़चिड़ाते, खिसियाए रहना या बात-बात पर गुस्सा खाना जैसे आचरण भी दर्शाते हैं कि व्यक्ति मानसिक तौर पर अस्वस्थ है। संप्रति अमेरिका में 26.5 प्रतिशत वयस्क मानसिक विकृतियों से ग्रस्त हैं, इनमें से 6 प्रतिशत बहुत गंभीर हैं। अमेरिका की मानसिक स्वास्थ्य की शीर्ष संस्था नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ के अनुसार मानसिक विकृतियां अमेरिका व अन्य राष्ट्रों में आम हो गई हैं। ब्रिटेन में प्रतिवर्ष करीब पौने तीन लाख व्यक्तियों को मानसिक विकृति के इलाज के लिए अस्पतालों में भरती होना पड़ता है और चार हजार व्यक्ति आत्महत्या करते हैं; साथ ही 80 हजार से अधिक युवा गंभीर डिप्रेशन से ग्रस्त हैं। आकलनों की मानें तो समूची दुनिया में मानसिक विकृतियों में लगातार इजाफा जारी है और 2035 तक मानसिक और शारीरिक रोगियों की संख्या बराबर हो जाएगी।
तनाव, डिप्रेशन, सीज़ोफ्रेनिया आदि मानसिक विकृतियों से समाज का कोई वर्ग अछूता नहीं है। मानसिक रोगी स्वयं तो कष्ट भोगता ही है, परिजनों, समाज व राष्ट्र पर भी बोझ बनता है; एकाकी, बहिष्कृत-सी निम्नस्तरीय, छोटी जिंदगी गुजारने को अभिशप्त। जब इंतहा हो जाती है तो उसे मुक्ति के लिए जीवन को अलविदा कहने से इतर कुछ नहीं सूझता।
पिछले साल जुलाई में दिल्लीवासियों की जुबान में बुराड़ी परिवार के सभी 11 सदस्यों द्वारा सामूहिक खुदकुशी की चर्चा रही। चंद दिन पूर्व, 26 सितंबर को इंदौर में सामूहिक खुदकुशी का दुखद अध्याय रचा गया, अब का दृश्य एक रिसॉर्ट का था। इंदौर में अभिषेक सक्सेना द्वारा सपरिवार खुदकुशी के लिए नौकरी छूटने से उत्पन्न अथाह मानसिक यंत्रणा बताया गया। कहना होगा, नौकरी छूटना एक कारण बना, इस नृशंस कांड को एक विकृत सोच की उपज कहना अधिक उपयुक्त होगा। यह भी बताया जा रहा है कि सक्सेना परिवार के लिए भारी तंगी के बावजूद खुले हाथ खर्च करने की आदत से पिंड छुड़ाना भारी पड़ रहा था। दोनों प्रकरणों में कुछ बातें सामान्य थीं। मृतक परिवारों के सभी सदस्य तन-मन से दुरुस्त, सुलझे, शिक्षित, मिलनसार बताए गए। आसपड़ोस तथा परिजनों से उनका मेलजोल अच्छा और सौहार्दपूर्ण था! अपनी राय में, दोनों परिवारों में जो चल रहा था, सब उलट-पलट था, यानी दुनिया के सामने जो पेश था, वह सच से कोसों दूर था। उन हालातों पर ध्यान नहीं दिया जाता रहा, जिनके चलते व्यक्ति को दुनिया की सारी खुशियां दिखना बंद हो जाती हैं और जिंदगी में घुप्प अंधेरा छा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार स्वास्थ्य का कोई क्षेत्र इतना उपेक्षित नहीं है जितना मानसिक स्वास्थ्य। वर्ष 2017 में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम प्रभावी होने के बावजूद बीमा कंपनियां मानसिक बीमारियों को कवर करती भी हैं तो आनाकानी के साथ। यों मानसिक विकृतियां व्यक्ति की सोच और उसके अंदरूनी सरोकारों से ज्यादा जुड़ी हैं। आप वाकई कैसे हैं, इसके मायने नहीं हैं, अहम आपकी छवि है, चुस्त-दुरुस्त दिखनी चाहिए। कुछ लोगों ने रिटायरमेंट के बाद बाल रंगना शुरू किया; नन्ही बच्ची को भी सैंडल से लेकर छोटी हेयर पिन तक मैचिंग चाहिए। लोग आपके बारे में क्या सोचते, बोलते हैं, यह जरूरी है; आप एक पसंदीदा, धांसू व्यक्ति नहीं हैं तो आपका जीना व्यर्थ है। इसीलिए आपको सोशल मीडिया पर खूब सारे लाइक्स बटोरने हैं—मैं, मैं और सिर्फ मैं।
रुतबे-ठसके, बढ़ती पदवियां, इनाम, फीतियां, शील्ड वगैरह बड़े काम के हैं; कुछ की सांसों का दारोमदार इन्हीं बैसाखियों पर है। कुछेक अपने पैसे से शील्ड बनवा कर किसी की मार्फत स्वयं को सम्मानित करेंगे, ड्राइंग रूम की शोभा बढ़नी चाहिए। विश्वास न हो तो दस को भेजी चिट्ठियों में नाम के आगे आईएएस, आईपीएस, डाक्टर या कर्नल नहीं लिखकर पुष्टि करें, दो-तीन को अस्पताल में भर्ती होना पड़ सकता है।
बुद्ध ने कहा था, समझदारी उन बातों को समझने में है जो बाहरी रंगरूप के परे है, अन्यथा धोखा हो सकता है। आज के मुखौटाप्रिय समाज में जो दिखे उसे सत्य मान लिया जाता है। लोक व्यवहार का तकाजा है कि बातें नपी तुली, कायदे की और दूसरों को रास आने वाली हों। एक अलिखित विधान है कि नींद उड़ाती चिंताओं और कचोटते सरोकारों की भनक किसी को नहीं लगनी चाहिए। छोटी सी जिंदगी कुढ़-कुढ़ कर जीने के लिए नहीं है।


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