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निज़ाम का खज़ाना 306 करोड़ 120 दावेदार

Posted On October - 13 - 2019

भारत में विलय के भय से भविष्य सुरक्षित करने के मकसद से हैदराबाद के निज़ाम ने जो खज़ाना ब्रिटेन के एक बैंक में जमा कराया था, उस पर सात दशक से पाकिस्तान की टेढ़ी नज़र लगी थी। अब जाकर रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने फैसला दिया है कि सातवें निज़ाम की संपत्ति पाकिस्तान को नहीं मिलेगी। मगर अब देश- विदेश में रह रहे निज़ाम के वंशज खज़ाने पर दावा जता रहे हैं। एक नज़र खज़ाने के बहाने इस रोचक दास्तां पर।

पुष्परंजन

2 अक्तूबर 2019 को ब्रिटेन से एक अच्छी ख़बर आई। राॅयल कोर्ट आॅफ जस्टिस के न्यायमूर्ति मार्क्स स्मिथ ने फैसला सुनाया कि हैदराबाद के सातवें निज़ाम की संपत्ति पाकिस्तान को नहीं मिलेगी। यूके हाईकोर्ट ने निर्णय किया कि पाकिस्तान, बैंक में जमा तीन करोड़ 50 लाख पौंड निज़ाम हैदराबाद के वंशजों को वापिस करे। वर्ष 2013 से पाकिस्तान सरकार ने ब्रिटिश उच्च अदालत में अर्जी डाल रखी थी कि यह संपत्ति उनकी है। अदालती प्रक्रिया का यह पार्ट-टू है। हैदराबाद रियासत का भारतीय संघ में विलय से ठीक पहले 10 लाख 7 हज़ार 940 पौंड 1948 से ब्रिटेन के नेटवेस्ट बैंक पीएलसी में जमा है जो अब बढ़कर 35 मिलियन पौंड (रुपये में लगभग 306 करोड़) हो चुका है। इस रकम के साथ-साथ निज़ाम हैदराबाद के वंशजों की संख्या भी बढ़कर 120 हो गई है। इन सबको इस धन में से अपना शेयर चाहिए। हिस्सा नहीं मिला तो क़ानूनी जंग लड़ने की धमकी दी जा रही है।
मगर, रुकिये। ‘शहर बसा नहीं कि कंगले आ गये’ वाली फिकरेबाज़ी यहां नहीं चलनी है। कोई भरोसा नहीं, इस फैसले के विरुद्ध पाकिस्तान ब्रिटिश सुप्रीमकोर्ट का दरवाज़ा खटखटा दे, फिर सारे अरमान धरे के धरे रह जाएंगे। यों, पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से अपना रुख़ स्पष्ट नहीं किया है कि वह इस फैसले के विरुद्ध ब्रिटिश सुप्रीमकोर्ट में जा रहा है या नहीं। पाक विदेश मंत्रालय ने बस इतना कहा है कि हम फैसले का अध्ययन कर रहे हैं।
जब से ख़बरों की दुनिया में टीवी मीडिया का वर्चस्व बढ़ा है, अति उत्साह की गति राकेट को पीछे छोड़ने लगी है। ‘मिल गया-पा लिया’ का शोर करते सेकेंड नहीं लगता। चाहे ख़बर विजय माल्या के प्रत्यर्पण से जुड़ी हो, या निज़ाम की संपत्ति से। बजाय इसके कि ब्रिटिश न्याय प्रणाली को समझ लें, खबरों की होड़ में इतना फ्लैश कर देना होता है कि हम कोर्ट में केस जीत गये, हमारी फतह हो गई। लोअर-अपर व डिस्िट्रक्ट कोर्ट, फिर स्टेट एंड टेरीटरी कोर्ट, और आखि़र में सुप्रीमकोर्ट जैसी तीन चरणों वाली अदालती कार्यवाही ब्रिटेन में होती है। निज़ाम की संपत्ति का मामला ‘स्टेट एंड टेरीटरी कोर्ट’, जिसे हम अपने यहां हाईकोर्ट कहते हैं, वहीं तक पार हुआ है। अभी सुप्रीमकोर्ट में इसे चुनौती देना बाक़ी है। सिर्फ़ हाईकोर्ट तक फैसला पाने में 64 साल लगे हैं। इन सात दशकों में निज़ाम हैदराबाद की संपत्ति के 120 हकदार पैदा हो गये। निज़ाम की पूरी वंशावली की चर्चा की जाए तो अखबार को पूरा पन्ना छोटा पड़ जाएगा।

सातवें निज़ाम से शुरू हुआ रकम का किस्सा

रकम का यह किस्सा सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के समय से शुरू होता है। उस समय देश का विभाजन हो चुका था और उन्हें अपनी रियासत के विलय का डर सताने लगा था। उस डर की वजह से निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान पाकिस्तान से असलहे मंगाने लगे। दूसरा डर संपत्ति के छीने जाने का था, उसी सिलसिले में रियासत के वित्त व विदेश मंत्री नवाब मोइन नवाज़ जंग ने लंदन स्थित पाक उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहीमतुल्ला के माध्यम से 10 लाख 7 हज़ार 940 स्टर्लिंग पौंड ब्रिटेन के नेटवेस्ट बैंक पीएलसी में जमा करा दिये। बैंक में यह दर्ज कराया गया था कि यह रकम निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान की ओर से जमा कराई जा रही है। उसके कुछ महीनों बाद 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद का विलय भारतीय गणराज्य में हो चुका था।
कुछ साल गुज़रने के बाद निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने बयान दिया कि ब्रिटिश बैंक में वह रकम बिना उनकी सहमति के जमा की गयी थी। 1954 में सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने दावा किया कि उनकी संपत्ति बैंक वापिस करे। मामला लोअर-अपर व डिस्िट्रक्ट कोर्ट में पहुंचा। निचली अदालत को लगा कि पाकिस्तान संप्रभु देश है और उसे साॅवरिन इम्युनिटी (संप्रभु उन्मुक्ति) मिलनी चाहिए। उस आधार पर रकम को बैंक में फ्रीज कर देने का कोर्ट का आदेश हुआ। बैंक में जमा रकम पाकिस्तान को भी नहीं मिली। 2013 तक यह केस मृत जैसा ही था।

कोर्ट के बाहर समझौते की कोशिशें

कुछ लोग यह बताते हैं कि निज़ाम के वंशजों से पाकिस्तानी उच्चायुक्त की लंदन में कोई सीक्रेट डील हुई थी। सातवें निज़ाम के पोते नवाब नज़फ अली ने स्वीकार किया था कि 2008 में पाकिस्तान से ‘आउट आॅफ कोर्ट सेटलमेंट’ का प्रयास हमने किया था। इससे अलग, हैदराबाद के स्वयं घोषित आठवें निज़ाम मुकर्रम जाह और उनके छोटे भाई मुफ्फ़खम जाह ने 2009 के शुरू में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उस समय के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी से इस विषय पर सहयोग चाहा था।
कई बार विनाश काले विपरीत बुद्धि वाली स्थिति हो जाती है। पाकिस्तान की समझ में पता नहीं क्या आया कि रकम को पाने की कोशिश फिर से शुरू हुई। 2013 में पाकिस्तान, नेटवेस्ट बैंक पीएलसी के विरुद्ध उच्च न्यायालय, ‘राॅयल कोर्ट आॅफ जस्टिस’ में गया, ताकि कोर्ट के आदेश से बैंक उस रकम को रिलीज़ करे। पाकिस्तान ने दलील दी कि हैदराबाद का विलय भारतीय स्वतंत्रता क़ानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं था, इसलिए हैदराबाद को भारत का हिस्सा न मानते हुए फंड का हकदार पाकिस्तान को माना जाए।

‘चक्रव्यूह’ में पाकिस्तान

पाकिस्तान उस चक्रव्यूह में ख़ुद -ब-ख़ुद फंसा, जिसकी बिना पर छह दशकों से फ्रीज़ हुई संपत्ति स्वाभाविक रूप से साॅवरिन इम्युनिटी (संप्रभु उन्मुक्ति ) से बाहर हो गई। इस बार की अदालती लड़ाई में भारत सरकार भी एक पार्टी के रूप में शामिल थी। उसे समझने के लिए एक बार फिर भारत में क्या हुआ था, उसे जानना आवश्यक है। भारत में निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने जन कल्याण के वास्ते ‘हैदराबाद फंड’ नामक एक ट्रस्ट की स्थापना 10 मई 1950 को की थी। इसके अलावा कई और ट्रस्ट निज़ाम हैदराबाद ने बनवाये। 1960 में निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने ‘हैदराबाद फंड’ का ट्रस्टी अपने पोतों को बनाया और भारत के राष्ट्रपति को उसकी निगरानी का अधिकार दिया। फिर 24 फरवरी 1967 को सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान की मृत्यु हो गई। ब्रिटेन में जमा रकम का मामला कई दशकों तक ठंडा पड़ा रहा।
पाकिस्तान ने समय-समय पर बयान भी बदले। 2016 में कोर्ट में दलील पेश करते समय पाकिस्तान ने कहा था कि 1947-48 के बीच हमारे यहां से बहुत सारे हथियार हैदराबाद भेजे गये थे, 10 लाख पाउंड उसी के एवज़ में भेजे गये थे। उससे और पहले पाकिस्तान ने उस रकम को ‘निज़ाम का तोहफा’ कहा था। पाकिस्तान को ब्रिटिश हाईकोर्ट के फैसले में दोहरा नुकसान हुआ है। न्यायमूर्ति मार्क्स स्मिथ ने अपने फैसले में दो महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक, हैदराबाद रियासत के विलय के वास्ते तत्कालीन सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान स्वयं राष्ट्रपति से सेटलमेंट कर गये थे। दूसरा, ब्रिटिश सरकार हैदराबाद रियासत के विलय को मान्यता देती है। पाकिस्तान को ब्रिटिश हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से करारा कूटनीतिक तमाचा लगा है। आठवें निज़ाम मुकर्रम जाह इन दिनों इस्तांबुल में रह रहे हैं और उनके छोटे भाई मुफ्फ़खम जाह लंदन में। क़ानूनी लड़ाई ब्रिटिश सुप्रीमकोर्ट की चौखट तक पहुंचती है तो दोनों लड़ने को तैयार हैं, ऐसा उनके बयानों से ज़ाहिर हुआ है।

निज़ाम कुनबे में अविश्वास

सबसे बड़ी मुश्किल निज़ाम कुनबे में फैला अविश्वास है। बाहर की लड़ाई तो लड़ ली, अब घर के अंदर संपत्ति में हिस्से को लेकर तलवारें खिंचेंगी, इस तरह के बयान आने लगे हैं। सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के पोते नवाब नज़फ अली ने ख़ानदान के दूसरे वारिसों को तैयार किया है। उन्होंने दावा किया, ‘ख़ानदान के 120 लोग मेरे साथ हैं। इस संपत्ति को पाने के वास्ते मैंने भी क़ानूनी लड़ाई लड़ी थी। लंदन में बाकायदा वकील किये थे। 2016 तक इस लड़ाई में फ्रंट लाइन पर मैं था। भारत सरकार, निज़ाम स्टेट के साथ मिलकर संयुक्त लड़ाई लड़े, इस वास्ते जो सहमति बनी, उसका एक पक्षकार मैं भी था। इन दोनों भाइयों मुकर्रम जाह और मुफ्फ़खम जाह ने 2013 तक तो चुप्पी साध रखी थी, अब ये चोबदार बन गये। हमें भरोसा दिलाया गया था कि धन का बंटवारा निज़ाम हैदराबाद के सभी क़ानूनी वारिसों के बीच होगी। यदि कोई उस अहद के आड़े आता है तो एक बार फिर अदालत का मुंह देखने को तैयार रहे।’ सातवें निज़ाम, मीर उस्मान अली ख़ान के पोते नवाब नज़फ अली के इस बयान से स्पष्ट है कि कुनबे में ब्रिटिश बैंक से मिलने वाली संपत्ति को लेकर अविश्वास और खलबली मची हुई है।

निरंकुश निज़ाम

इंग्लैंड, स्काॅटलैंड और वेल्स को मिला दीजिए तो कुल क्षेत्रफल है 80 हज़ार 823 वर्ग मील। विलय से पहले अकेले हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल था 82 हज़ार 698 वर्ग मील! 1893 में प्रकाशित सर रोपर लेथब्रिज़ की पुस्तक, ‘द गोल्डन बुक आॅफ इंडिया’ में जानकारी मिली कि आसिफ जाही डायनेस्टी की जड़ें तुर्की में थी। सेंट्रल एशिया में सूफी संत शिहाबुद्दीन सोहरावर्दी इन्हीं के पूर्वजों में से एक थे। आबिद ख़ान इनके आदि पुरुष थे, जो समरकंद होते हुए 17वीं सदी में हिन्दुस्तान आये थे। दक्कन में प्रभाव जमाये रखने के लिए औरंगज़ेब ने आबिद ख़ान का इस्तेमाल किया था। 1714 में मुग़ल बादशाह फारूखस्यार ने आबिद ख़ान की चौथी पीढ़ी आसफ जाह को हैदराबाद-दक्कन का पहला निज़ाम नियुक्त किया।
1769 में हैदराबाद निज़ाम की राजधानी बनी। उससे पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक समझौते के तहत मछलीपट्टम समेत आंध्र के तटीय इलाके पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। 1798 तक सिकंदराबाद अंग्रेजों के हाथों में था। उसकी रक्षा के वास्ते ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी निज़ाम से रकम वसूलने लगी। 1941 में जो जनगणना हुई, उस समय हैदराबाद-दक्कन रियासत की आबादी थी 1 करोड़ 63 लाख 40 हज़ार। उस आबादी में हिंदुओं की संख्या थी 85 प्रतिशत। बावज़ूद इसके, रियासत की सेना और पुलिस में मुसलमान अफसरों की संख्या 1765 थी और 421 हिंदू अफसर थे। 121 अफसरों में ईसाई, सिख, पारसी सभी शामिल थे। सबसे टाॅप लेवल पर 59 मुस्लिम, 5 हिंदू और 38 दूसरे धर्मों के अफसरान तैनात थे। लगभग सारे कोतवाल, कमिश्नर मुसलमान थे। हैदराबाद रियासत की अपनी टेली कम्युनिकेशंस, पोस्टल सेवा, रेल, करेंसी, ब्राडकाॅस्टिंग सर्विस तक थी। निज़ाम ने जिन जागीरदारों को ज़मीनें दे रखी थीं, उनमें 40 फीसद मुसलमान थे। रियासत की सालाना आय नौ करोड़ से ऊपर थी।

ऑपरेशन पोलो

निज़ामशाही का सूर्य सामान्य प्रकिया से अस्त नहीं हुआ था। 1947 में देश आज़ाद होने के आगे-पीछे 565 रजवाड़ों में से मात्र तीन थे, जो न भारत में मिलना चाहते थे, न पाकिस्तान में। ये तीन थे गुजरात का जूनागढ़, कश्मीर, और हैदराबाद। सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने बाकायदा हैदराबाद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया, जिसे भारत सरकार ने स्वीकार करने से मना कर दिया था। हैदराबाद को हासिल करने के लिए सरकार ने ‘ऑपरेशन पोलो’ नामक एक ऑपरेशन तैयार किया। उन दिनों पोलो के खेल के वास्ते यह रियासत प्रसिद्ध थी। खेल के मैदान भी सैकड़ों की संख्या में थे। उसे ध्यान में रखकर इस सैन्य अभियान का नाम ‘ऑपरेशन पोलो’ रखा गया। केंद्र सरकार के प्रशिक्षित सैनिकों को इस रियासत पर कब्ज़ा करने में सिर्फ पांच दिन लगे थे। हैदराबाद निज़ाम की सेना के अलावा उस समय दो लाख की संख्या में रज़ाकार इस रियासत में थे। इस आॅपरेशन से पहले हुए दंगों में इन रजाकारों द्वारा सितम की कहानियां भी चर्चा में थी।
पंडित नेहरू के समय इसकी जांच के लिए ‘सुंदरलाल कमेटी’ बनी थी। 2014 में ‘सुंदरलाल कमेटी’ की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, जिसमें पता चला कि ‘ऑपरेशन पोलो’ में 30 से 40 हज़ार जानें गई थीं। कुछ जानकार मरने वालों की संख्या दो लाख तक बताते हैं। हैदराबाद रियासत के जो भी निज़ाम फौत हुए, समय-समय पर सभी को चारमीनार के पास मक्का मस्जिद में दफन किया गया, सिवा आखि़री निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के, जिनकी मृत्यु 24 फरवरी 1967 को हुई। मीर उस्मान अली ख़ान को उनकी इच्छा के अनुरूप हैदराबाद के किंग कोठी पैलेस की जुदी मस्जि़द में उनकी मां की कब्र की बगल में दफन किया गया!


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