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निरंकुश राजशाही तले लोकतंत्र की कछुआ चाल

Posted On October - 11 - 2019

अरुण नैथानी

पहली नजर में तो लगता है कि सऊदी अरब के ताकतवर युवराज मोहम्मद बिन सलमान रूढ़िवादी सऊदी अरब को आधुनिक बनाने की तरफ बढ़ चले हैं। उन्होंने सऊदी अरब के बंद समाज में सिनेमाहाल खोलने की इजाजत दी, संगीत पर से प्रतिबंध हटाया है, महिलाओं को कार चलाने की अनुमति मिली है, होटलों में विदेशी अविवाहित जोड़े ठहर सकते हैं। वे अपनी कल्पनाओं का एक अद‍्भुत शहर बसाने जा रहे हैं। अरबों डालर की इस परियोजना को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सौर ऊर्जा व इंटरनेट द्वारा संचालित किया जायेगा। लेकिन वहीं बहुचर्चित पत्रकार जमाल खशोगी की रहस्यमय हत्या की सूई उनकी तरफ मुड़ी है। तमाम सुधारवादी, महिला अधिकारों के पक्षधर तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पैरोकार जेलों में ठूंसे गये हैं। दूसरी ओर यमन पर सऊदी हमले के जरिये उन्होंने एक मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है।
बावजूद इसके युवराज सलमान मोहम्मद बिन सलमान आज मध्य-पूर्व के सबसे ताकतवर शख्स के रूप में जाने जाते हैं। वे खुद को आधुनिक तथा उदारवादी दिखाने का प्रयास करते हैं। वे सुधार तो चाहते हैं मगर जन आंदोलन के जरिये नहीं। वे चाहते हैं कि सुधार के जो कदम उठाये जायें, वे राजसत्ता के जरिये ही सामने आयें। आंदोलन उन्हें स्वीकार्य नहीं है। सलमान की परवरिश सऊदी शाही परिवार के अन्य हजारों राजकुमारों की तरह ही हुई है। उनका जन्म 31 अगस्त, 1985 को हुआ। उनकी परवरिश समाज से अलग राजमहल में भोग-विलास की तमाम सुविधाओं के मध्य हुई। वे अपने पिता बादशाह सलमान की तेरह संतानों की तरह ही राजमहल में ही पले-बढ़े। जहां उनकी सेवा में जुटे हजारों लोगों की फौज तैनात थी। उनकी बचपन से ही पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी थी। अन्य राजकुमारों को जब अमेरिका, ब्रिटेन आदि पश्चिमी देशों में पढ़ने के लिये भेजा गया तो उन्होंने देश में ही पढ़ाई को प्राथमिकता दी। उन्होंने किंग सऊदी विश्वविद्यालय से कानून में डिग्री ली। वे राष्ट्रवादी तेवरों वाले देश में यह धारणा बनाने में कामयाब रहे कि वे जमीन से जुड़े राजकुमार हैं। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी। लेकिन विदेश न जाने का एक नुकसान यह रहा कि उनकी अंग्रेजी में पकड़ ढीली रही और पश्चिमी को समझने में उन्हें काफी वक्त लगा।
इसके साथ ही सलमान देश में रहते हुए अपने पिता के करीब आये और राजकाज की बातों को करीब से समझने लगे। उनके पिता जब रियाद के गवर्नर थे तो हर राजकीय कार्य में वे पिता के साथ साये की तरह रहे। उन्होंने धीरे-धीर सऊदी शासन के गुर सीखे। फिर धीरे-धीरे उन्हें महत्वपूर्ण पद दिये जाने लगे। महज 27 साल की उम्र में वे पिता के दरबार में वजीर-ए-आला नियुक्त हुए। वर्ष 2015 में कैबिनेट मंत्री बने।
कालांतर वर्ष 2015 में जब सऊदी बादशाह अब्दुल्ला का इंतकाल हुआ तो उनके सौतेले भाई सलमान बादशाह बनाये गये। कालांतर मोहम्मद बिन सलमान को रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया। इसी बीच सऊदी अरब की सीमा से लगे यमन में ईरान समर्थित हूती कबीले ने राजधानी सना पर आक्रमण कर निर्वाचित राष्ट्रपति का तख्ता पलट दिया। मोहम्मद बिन सलमान ने दस देशों का गठबंधन बनाकर यमन पर हवाई हमला बोल दिया। मकसद ईरान को सख्त संदेश देना भी था। लेकिन यह मुहिम कामयाब नहीं हुई और सऊदी अरब के लिये न भरने वाला जख्म साबित हुआ। हाल में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की तेल रिफाइनरी पर ड्रोन हमला बोलकर भारी तबाही मचायी। यमन भी बड़ी मानवीय त्रासदी का सामना कर रहा है।
इसी बीच जून, 2017 को एक बड़े ऐतिहािसक राजनीतिक घटनाक्रम में बादशाह सलमान ने युवराज मोहम्मद बिन नफे को अपने से बहुत छोटे युवराज मोहम्मद बिन सलमान के लिये वली अहद का पद छोड़ने के लिये कहा। लंबे अर्से से देश के गृहमंत्री और आतंकविरोधी अभियान के अगु‍वा रहे अनुभवी नफे की लंबे अर्से तक सत्ता में भागीदारी रही थी। कायदे से यह एक रक्तहीन तख्तापलट जैसा था। इसके बाद ताकतवर बनते ही प्रिंस सलमान ने सितंबर, 2017 में सभी मुख्य राजकुमारों, कारोबारियों और महत्वपूर्ण लोगों को गिरफ्तार कर लिया। बिना आरोप के गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल के बजाय एक आलीशान होटल में रखा गया। उन्हें चेताया गया कि अवैध तरीके से कमाये गए अरबों रियाल की संपत्ति सरकार को सौंप दें। दरअसल, भ्रष्टाचार मुहिम के नाम पर सत्ता का केंद्रीकरण किया गया। बहरहाल, इसके बावजूद उन्होंने तेल केंद्रित अर्थव्यवस्था में बदलाव लाकर निवेश जुटाकर लाखों बेरोजगार सऊदी युवाओं को रोजगार भी दिलाया। वे एक ऊर्जावान तथा बदलावकारी शासक के रूप में जाने जाते हैं, मगर निरंकुशता उसका अाधार है। दामन में कई दाग हैं मगर लाखों युवाओं के हीरो भी हैं। उनके महत्वाकांक्षी विजन 2030 की चर्चा होती है। बादशाह के बाद वेे निश्चित रूप से दशकों के लिये मध्य-पूर्व के सबसे ताकतवर शहंशाह होंगे।


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