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धर्मनगरी में दो पंजाबी उम्मीदवारों के बीच कांटे का मुकाबला

Posted On October - 16 - 2019

दिनेश भारद्वाज/ट्रिन्यू
थानेसर, 15 अक्तूबर
हजारों वर्ष पहले इसी जमीन पर महाभारत लड़ा गया था। अब एक बार फिर लड़ाई छिड़ी है। यह सियासत और सत्ता की लड़ाई है। महाभारत की तरह ही यहां भी मुकाबला बिल्कुल आमने-सामने का है। एक ओर सत्तासीन भाजपा के सुभाष सुधा हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस के सेनापति के तौर पर अशोक अरोड़ा मैदान में डटे हैं। लम्बे समय तक इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष रहे अरोड़ा अब कांग्रेस में आ चुके हैं।
कुरुक्षेत्र के थानेसर हलके में इन दोनों पंजाबी नेताओं के बीच आर-पार का संघर्ष होता दिख रहा है। भाजपाई इस सियासी जंग को जितना आसान मानकर चल रहे थे, उतनी आसान लग नहीं रही। अरोड़ा का रसूख उनके काम आ रहा है। कैबिनेट मंत्री रहते हुए इलाके में कराए गए काम भी बोल रहे हैं। हलके में एंटी-इंकम्बेंसी भी देखने को मिल रही है। भाजपा से बेशक नाराजगी न हो लेकिन उम्मीदवारों के प्रति दूसरे हलकों की तरह थानेसर में भी समीकरण डांवाडोल हैं। बनियों के वर्चस्व वाले थानेसर हलके में पिछले कुछ वर्षों से पंजाबियों का कब्जा है। इस बार मुकाबला इसलिए रोचक है, क्योंकि दोनों ही प्रमुख दलों – कांग्रेस व भाजपा के उम्मीदवार पंजाबी समाज से हैं। चुनाव में हार-जीत का फैसला बनिया, जाट, सैनी, एससी और रोड़ करेंगे। इस बार चुनावी रण में कुल 15 उम्मीदवार डटे हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही दिख रहा है। लोकसभा चुनाव में चुप्पी साधकर रखने वाले यहां के मतदाता इस बार मुखर हैं।

सुभाष सुधा

इलाके में ब्राह्मणों की आबादी पंजाबी और वैश्यों से ज्यादा है। इसी को ध्यान में रखते हुए जजपा ने योगेश शर्मा पर दांव लगाया लेकिन वे कोई करिश्मा कर पाएंगे, इसकी संभावना नहीं दिखती। जिला परिषद के चेयरमैन रहे रोड़ समाज के प्रवीन चौधरी जरूर खेल बिगाड़ते नजर आ रहे हैं। रोड़ वोट बैंक में वे सेंध लगा सकते हैं, इसका सीधे तौर पर भाजपा को नुकसान भी हो सकता है। लोकसभा चुनाव तक भाजपा के सुर में मिलाते रहे ब्राह्मणों के तेवर इस बार बदले दिख रहे हैं। एससी वोट बैंक हार-जीत में सबसे निर्णायक रहेगा। यही नहीं, शहर के अलावा आउटर गांवों में बसे जाट वोटर ‘करंट’ भी दे सकते हैं।
पुराने शहर के चक्रवर्ती मोहल्ला के अनुज का कहना है कि सरकार ने गीता जयंती अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के नाम पर पैसा तो खूब बहाया, लेकिन शहर में विकास नहीं हुआ। दर्रा खेड़ा के राममेहर कहते हैं, अरोड़ा के आने के बाद मुकाबला रोचक हो गया है। विकास के मुद्दे पर तो वे कुछ नहीं बोले, लेकिन यह जरूर कह दिया कि थानेसर में कुछ भी हो सकता है। एक पुराने संघी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सुधा के व्यवहार को लेकर अंदरखाने नाराजगी है। रिपोर्ट सरकार तक भी भेजी थी लेकिन सुनवाई नहीं हुई। न्यू कालोनी के ईश्वर सिंह सुभाष सुधा के कामकाज से खुश हैं। वे कहते हैं कि कई बड़े प्रोजेक्ट सुधा की वजह से शहर को मिले हैं। सेक्टर में रहने वाले लोगों में सुधा को लेकर अच्छा माहौल देखने को मिला। जोगनाखेड़ा गांव के हरभगवान कहते हैं, शहर में कुछ हुआ हो तो हमें पता नहीं, गांवों में विकास नहीं हुआ। वहीं किरमच के रवि का कहना है कि बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। सरकारी नौकरी मिलती नहीं और प्राइवेट सेक्टर में रोजगार के अवसर कम हो गये हैं।

अशोक अरोड़ा


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